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राजनीति: अंतरिक्ष पर्यटन और चुनौतियां

जैसे-जैसे सरकारी एजेंसियां खर्चीले अभियानों से अपने हाथ खींच रही हैं, वैसे-वैसे निजी एजेंसियां मौके को भुनाने की कोशिशें कर रही हैं। उन्हें लग रहा है कि अंतरिक्ष को अब पर्यटन का केंद्र बनाया जा सकता है और दुनिया भर के अमीरों को इस रोमांचक यात्रा पर ले जाकर पैसे कमाए जा सकते हैं।

ISROअंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की प्रगति से पर्यटन की संभावना बढ़ गई है।

अभिषेक कुमार सिंह

अंतरिक्ष हमें सभी दायरों से आजाद कर देता है। हालांकि कई अन्य संदर्भों में जात-पांत, रंगभेद, धर्म-संप्रदाय आदि से ऊपर उठने का संदेश देने वाले अंतरिक्ष का आकर्षण इससे अलग भी है। एक आकर्षण इसके रहस्यों को लेकर है। सौरमंडल की थाह लेने वाले मानव निर्मित उपग्रहों और चांद के अलावा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आइएसएस) तक की यात्राओं से अंतरिक्ष के ढेरों रहस्य खुले हैं। लेकिन यह ब्रह्मांड अनंत है और इसे जानने की हमारी जिज्ञासाएं इतनी ज्यादा हैं, जिससे लगता है कि यह अन्वेषण कभी रुकेगा वाला नहीं है।

अंतरिक्ष को जानने-समझने और उसके आकर्षण में बंधने एक नया अवसर इधर तब पैदा हुआ, जब कोरोना काल के कठिन समय में इसी महीने की पंद्रह तारीख को एक निजी कंपनी के रॉकेट से चार अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पहुंचाया गया। अरसे से यह सपना एक सवाल के रूप में शायद हजारों आंखों में पल रहा है कि अगर लोग पैसे चुका सकें, तो क्या उन्हें कभी निजी तौर पर अंतरिक्ष की सैर का मौका मिल सकता है।

निजी कंपनी- स्पेसएक्स के रॉकेट फॉल्कन-9 से अमेरिकी स्पेस एजेंसी- नासा के इस ताजा अभियान ने इन उम्मीदों को एक नया आधार दिया है। ध्यान रहे, इस साल स्पेसएक्स की ओर से आयोजित यह दूसरी उड़ान है, जिससे नासा को रूसी रॉकेटों पर से अपनी निर्भरता खत्म करने का मौका मिला है। इससे पहले इसी साल मई में ऐसी ही एक निजी उड़ान से नासा के ‘क्रू डेमो-2’ के तहत दो अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेज कर उन्हें सुरक्षित वापस लाया जा चुका है।

स्पेस एक्स के क्रू ड्रैगन कैप्सूल ‘रेजिलिएंस’ को करीब सत्ताईस घंटे की पूरी तरह स्वचालित उड़ान के बाद आइएसएस तक ले जाने वाले ताजा अभियान को मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक ‘महान’ उपलब्धि बताया और अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस के अनुसार यह उपलब्धि अमेरिका में समानव अंतरिक्ष अन्वेषण में नए युग की शुरुआत है। अमेरिका के लिए ऐसी उड़ानों का महत्त्व यह है कि इससे रूस के रॉकेटों पर से उसकी निर्भरता खत्म होगी।

बीते करीब नौ वर्षों से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा आइएसएस पर अपने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने के लिए रूसी रॉकट सोयूज की सेवाएं लेती रही है और इसके लिए वह प्रति सीट नौ करोड़ डॉलर की भारी-भरकम रकम चुकाती रही है। जाहिए है, निजी अंतरिक्ष कंपनी स्पेसएक्स ने उसे फॉल्कन-9 रॉकेट के रूप में एक नया विकल्प भी दे दिया है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले नासा ने जुलाई, 2011 में अपने रॉकेटों का इस्तेमाल किया था। लेकिन बाद में बढ़ते खर्च और दुर्घटनाओं के कारण उसने 2014 में स्पेसएक्स और एक अन्य कंपनी बोइंग के साथ यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने का करार किया।

एक ही साल में ये दो अवसर ऐसे बने हैं, जब निजी उड़ानों से इंसान को अंतरिक्ष में ले जाया गया है। निश्चित तौर पर यह अंतरिक्ष में एक नए युग की शुरुआत है, लेकिन इसके जरिए एक तीर से कई निशाने साधे जा सकेंगे। इस कामयाबी से भविष्य में अंतरिक्ष कार्यक्रमों के अब निजी हाथों में पहुंचने से उनमें नई गति आने की संभावना बनती है। साथ ही, बढ़ते खर्च के कारण सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियों के अंतरिक्ष अनुसंधान से हाथ खींच लेने की स्थितियों में निजी एजेंसियां एक नया संबल दे सकती हैं, क्योंकि ये अंतरिक्ष की सैर के मुरीद अमीरों से इसके लिए अच्छी-खासी रकम बना सकती हैं। हालांकि इस पूरे मामले में कुछ सवाल भी हैं। जैसे निजी एजेंसियों की मदद लेने पर अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा का मामला कहीं हाशिये पर न चला जाए। या फिर अब स्पेस एजेंसियां कमाई का जरिया मानते हुए अंतरिक्ष को सिर्फ पर्यटन स्थल में ही न बदल डालें और लंबी अंतरिक्ष यात्राओं व अंतरिक्ष अन्वेषण का काम ठंडे बस्ते में न चला जाए।

सदियों से इंसान की चाहत रही है कि वह रात में टिमटिमाते तारों के जरा नजदीक पहुंचे और उस अनंत आकाश की टोह ले सके जिसका हम एक बेहद छोटा हिस्सा हैं। कॉपरनिकस से लेकर गैलीलियो तक ने अंतरिक्ष की संरचनाओं और सौरमंडल के गठन के बारे में जो व्याख्याएं दी थीं, उन्हें परखने का काम तभी हो सकता था जब कोई इंसान पृथ्वी की कक्षा को पार कर अंतरिक्ष कहलाने वाले दायरे में कदम रखे। इस मायने में 1961 में सोवियत संघ के यूरी गागरिन पहले अंतरिक्ष यात्री थे, जिन्होंने अंतरिक्ष में पांव रखे थे। इसके आठ साल बाद अमेरिका के नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन के चांद पर पदार्पण के साथ धरती से बाहर किसी अंतरिक्षीय पिंड पर इंसान के पहुंचने का सपना पूरा हो गया था।

हालांकि 1969 के अपोलो-11 मिशन के बाद कोई इंसान चंद्रमा पर नहीं भेजा जा सका है, लेकिन बाद के चंद्र अभियानों के अलावा अंतरिक्ष स्टेशन मीर, आइएसएस के निर्माण और चीन व भारत के अंतरिक्ष अभियानों ने साबित किया कि अंतरिक्ष ऐसी दुरुह जगह नहीं है, जहां पहुंचा न जा सके। पर समस्या एक तो यह है कि अभी तक के सारे अंतरिक्ष अभियान सरकारी संगठनों की देन रहे हैं। दूसरे, अब सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियां बढ़ते खर्च और कमाई के नगण्य अवसरों के मद्देजनर इन अभियानों पर पैसा नहीं फूंकना चाहती हैं। रूस-अमेरिका भी अब ज्यादातर मिशन गर्व की अनुभूति की बजाय सिर्फ कमाई के लिए चलाना चाहते हैं।

जैसे-जैसे सरकारी एजेंसियां खर्चीले अभियानों से अपने हाथ खींच रही हैं, वैसे-वैसे निजी एजेंसियां मौके को भुनाने की कोशिशें कर रही हैं। उन्हें लग रहा है कि अंतरिक्ष को अब पर्यटन का केंद्र बनाया जा सकता है और दुनिया भर के अमीरों को इस रोमांचक यात्रा पर ले जाकर पैसे कमाए जा सकते हैं। तीन देशों के नागरिक और एजेंसी स्पेस एक्स के संस्थापक एलन मस्क उन्हीं अरबपतियों में से हैं जो अंतरिक्ष पर्यटन को साकार करते हुए अपनी भारी कमाई का रास्ता खोलना चाहते हैं।

स्पेसएक्स जैसी दर्जनों कंपनियां और हैं- जैसे वर्जिन गैलेक्टिक, मोजावे एयरोस्पेस, बोइंग, एक्सकॉर आदि। इनमें से कई कंपनियां इस प्रयास में हैं कि वे दोबारा इस्तेमाल लायक रॉकेट बना कर पर्यटकों को ठीक उसी तरह अंतरिक्ष में ले जाएं, जैसे कभी नासा अपने स्पेस शटलों से वैज्ञानिकों को आइएसएस तक लाती-ले जाती रही। पर इनमें से एलन मस्क की कंपनी- स्पेसएक्स ने सर्वाधिक गंभीर प्रयास कर बाजी मार ली है। हालांकि इस बीच रॉकेटों की नाकामी का खतरा स्पेसएक्स ने भी उठाया है, लेकिन छह-सात महीने के अंतराल में दो कामयाब उड़ानों के साथ उसने नाम अंतरिक्ष पर्यटन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखवा लिया है।

जैसे-जैसे निजी कंपनियां अत्यधिक जोखिम वाले अंतरिक्ष अभियानों में अपनी काबिलियत साबित करेंगी, सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियों का ज्यादातर कामकाज उन्हें मिलता जाएगा। यह पाया गया है कि सरकारी एजेंसियों के मुकाबले निजी कंपनियां प्रतिस्पर्धी कीमतों पर वे सारे काम कर सकती हैं, जिनके लिए सरकारों को अलग से बजट प्रावधान करने पड़ते हैं और किसी अभियान की नाकामी पर आलोचना का सारा जिम्मा अपने सिर लेना पड़ता है।

एक अन्य उल्लेखनीय बात यह है कि योग्यता साबित होने पर उपग्रहों के प्रक्षेपण से लेकर अंतरिक्ष पर्यटन तक के छिटपुट सारे काम निजी एजेंसियों के हवाले किए जा सकते हैं और मंगल से लेकर सुदूर व गहन अंतरिक्ष के अन्वेषण का काम सरकारी एजेंसियों को दिया जा सकता है, जहां ज्यादा सूझबूझ और गंभीर अवलोकन की जरूरत है। कुछ ही महीने पहले भारत सरकार ने भी यही संकेत दिए हैं कि अब एक कानूनी ढांचे के तहत भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी क्षेत्र को भागीदारी के ज्यादा मौके दिए जाएंगे, ताकि ज्यादा संख्या में संचार उपग्रह बना कर उनका प्रक्षेपण किया जा सके और देश की गरीब जनता की भलाई और देश के विकास के काम सुचारु ढंग हो सकें।

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