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भ्रम के विज्ञापन

किसी भी उपभोक्ता का यह अधिकार होना चाहिए कि वह उत्पाद के विज्ञापन में दर्शाई गई गुणवत्ता की मांग करे और ऐसा न होने पर उसके खिलाफ शिकायत करे।

Author March 23, 2017 05:29 am
केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान। (image Source: PTI)

भ्रामक विज्ञापनों से निपटने के लिए लंबे समय से सख्त नियम बनाने की बात होती रही है। पर अब तक इस पर कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है। केंद्रीय उपभोक्ता, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री रामविलास पासवान ने एक नया उपभोक्ता संरक्षण कानून लाने की बात कही है, जिसके तहत भ्रामक विज्ञापन देने वालों को सख्त सजा का प्रावधान होगा। इस पर शायद ही किसी को आपत्ति होगी कि कोई कंपनी अपने उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए उसका प्रचार करती है, लेकिन अगर उसके बारे में लोगों को गुमराह करने वाली बातें सच की शक्ल में पेश की जाती हैं तो यह न सिर्फ विश्वास के प्रति धोखे का मामला है, बल्कि इससे उपभोक्ताओं को कई स्तरों पर नुकसान भी हो सकता है।

विडंबना है कि हमारे समाज में जागरूकता की व्यापक कमी के चलते ज्यादातर लोग वस्तुओं की उपयोगिता को विज्ञापनों में किए गए दावों के मुताबिक मान लेते हैं और उसकी हकीकत के बारे में पड़ताल नहीं करते। जबकि किसी भी उपभोक्ता का यह अधिकार होना चाहिए कि वह उत्पाद के विज्ञापन में दर्शाई गई गुणवत्ता की मांग करे और ऐसा न होने पर उसके खिलाफ शिकायत करे। मगर उपभोक्ता अधिकारों के प्रति उदासीनता का फायदा कंपनियां उठाती हैं। पिछले करीब दो-ढाई दशक में बाजार के आक्रामक प्रसार में ऐसी होड़ पैदा हुई है, जिसमें हर रास्ता अपना कर मकसद बस उपभोक्ताओं से मुनाफा कमाना रह गया है। तमाम ऐसी वस्तुएं हैं, जिनके विज्ञापनों में बढ़-चढ़ कर ऐसे दावे किए जाते हैं, जो सीधे लोगों के विवेक पर असर डालते हैं और वे दूसरे ज्यादा सही विकल्पों पर विचार करना छोड़ देते हैं।

छिपी बात नहीं है कि सुंदरता को लेकर हमारे समाज में कैसे पूर्वाग्रह हैं और सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कंपनियां लोगों की इससे जुड़ी भावनाओं का शोषण करती हैं। सांवले व्यक्ति को गोरा बनाने का दावा करने वाली क्रीम की हकीकत अब साधारण लोग भी समझते हैं। पर आज भी उसके विज्ञापनों में गोरा बनाने का झूठा दावा किया जाता है। मुश्किल है कि विज्ञापनों में परोसे गए भ्रम को विश्वसनीय बनाने के लिए जाने-माने खिलाड़ियों-कलाकारों और नामचीन हस्तियों का सहारा लिया जाता है। जबकि किसी वस्तु के बारे में किए गए झूठे दावों वाले विज्ञापन कुछ लोगों के लिए आर्थिक मुनाफे का जरिया हो सकते हैं, पर आम लोग उसके असर में आर्थिक, सामाजिक और मानसिक, हर स्तर पर नुकसान में रहते हैं। विडंबना यह भी है कि वस्तुओं के विज्ञापनों में किए गए दावों की वास्तविकता की जांच-परख की न कोई कसौटी है, न इन पर कारगर तरीके से रोक लगाने के लिए कोई तंत्र।

सरकारी तंत्र का आलम यह है कि लगभग छह साल पहले केंद्र सरकार की ओर से इन पर नियंत्रण के लिए उपभोक्ता मामलों के विभाग को नियामक प्रणाली विकसित करने के दिशा-निर्देश दिए गए थे, ताकि अखबार, टीवी या एसएमएस के जरिए परोसे जाने वाले ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगाई जा सके, जो लोगों को किसी वस्तु के गुण-दोषों का ब्योरा न देकर भ्रमित करने वाली जानकारियां देते हैं। लेकिन अगर इतने सालों बाद भी भ्रामक विज्ञापनों से निपटने के लिए कोई कारगर तंत्र नहीं है, तो समझा जा सकता है कि सरकारें अपनी ही पहल के दावों के प्रति कितनी गंभीर हैं! देखना है कि भ्रामक विज्ञापनों पर लगाम लगाने का ताजा प्रस्ताव कब अमल में आता है।

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