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राजनीति: चुनौती बनती कुपोषण की समस्या

बच्चों में कुपोषण के मोर्चे पर दुनिया में कितना भी काम क्यों न हुआ हो, लेकिन यह भी एक हकीकत है कि अपने देश में आज भी पांच साल से कम उम्र के करीब आठ लाख अस्सी हजार बच्चे हर साल मर रहे हैं। इनमें उनहत्तर फीसद बच्चों की मौत सिर्फ कुपोषण से होती है। यह आंकड़ा यूनिसेफ की रिपोर्ट स्टेट ऑफ वर्ल्ड्स चिल्ड्रन, 2019 का है।

दुनियाभर में कुपोषण की समस्या गंभीर बनी हुई है। भारत में लाखों बच्चे हर साल सिर्फ कुपोषण की वजह से मौत के मुंह में समा रहे हैं।

सुविज्ञा जैन

इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि दुनिया भर के बच्चों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। विकासशील और गरीब देशों में यह समस्या ज्यादा है। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि पिछले तीन दशक से दुनिया के तमाम देश बच्चों के कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए संजीदगी से काम कर रहे थे और ऐसा हो पाने का एक कारण यह माना गया है कि वैश्विक आर्थिक विकास से यह गुंजाइश बनी। लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद कोई बहुत उत्साहजनक नतीजे देखने को नहीं मिले।

फिर, मौजूदा वैश्विक मंदी और महामारी ने बच्चों पर कुपोषण की आफत का अंदेशा और बढ़ा दिया। इस बात की तसदीक पिछले पखवाड़े संयुक्त राष्ट्र के दो बड़े अधिकारियों के बयानों से भी हो रही है। ये दो अधिकारी हैं संयुक्त राष्ट्र की राजनीतिक प्रमुख रोजमेरी डिकार्लो और संयुक्त राष्ट्र के मानवतावादी मामलों के प्रमुख मार्क लोकॉक। लोकॉक ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को आगाह किया है कि कोराना संकट ने आर्थिक रूप से कमजोर देशों की स्वास्थ्य परिस्थितियों पर बहुत बुरा असर डाला है। लिहाजा उन देशों में गरीबी और भुखमरी बढ़ेगी, नागरिकों की औसत आयु कम होगी जाएगी और शिक्षा की स्थिति खराब हो जाएगी।

इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह कि बच्चों की मौतों की संख्या बढ़ जाएगी। जाहिर है, ये अंदेशे फिजूल नहीं हैं। हाल में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक कोराना आने के बाद से दुनिया में हर महीने कमोबेश दस हजार बच्चे सिर्फ भूख से मर रहे हैं। आर्थिक मंदी के गंभीर होने पर यह आंकड़ा और भयावह हो सकता है।

अगर भारत के संदर्भ में इसे देखें तो इस समय आर्थिक मंदी का सबसे घना साया हमारे ऊपर ही है। विशेषज्ञों ने यह हिसाब लगा कर भी बता दिया है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष के बाकी बचे छह महीनों में भी भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के आसार नहीं हैं। वैसे भी इस साल की पहली तिमाही में सरकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में शून्य से भी 23.9 फीसद की गिरावट के बाद आर्थिक स्थिति को लेकर दुविधा में रहने का कोई कारण बचा नहीं है।

दूसरी ओर कोरोना अभी भी अपनी चरम स्थिति में पहुंचा नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि संकटकाल में आगे क्या करना जरूरी होगा? खासतौर पर हालात से जूझने के लिए प्राथमिकताएं तय करना ही पड़ेंगी और तात्कालिक व दीर्घावधि की योजनाएं फौरन बनानी पड़ेंगी। बेशक तात्कालिक योजनाओं में देश में कामधंधों को पटरी पर लाना पहला काम होगा। लेकिन दीर्घावधि की योजनाओं में आने वाली पीढ़ी का घ्यान रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। जाहिर है, उसके लिए देश के बच्चों के स्वास्थ्य को इस आफत से बचाना उतना ही जरूरी है।

बच्चों में कुपोषण के मोर्चे पर दुनिया में कितना भी काम क्यों न हुआ हो, लेकिन यह भी एक हकीकत है कि अपने देश में आज भी पांच साल से कम उम्र के करीब आठ लाख अस्सी हजार बच्चे हर साल मर रहे हैं। इनमें उनहत्तर फीसद बच्चों की मौत सिर्फ कुपोषण से होती है। यह आंकड़ा यूनिसेफ की रिपोर्ट स्टेट ऑफ वर्ल्ड्स चिल्ड्रन, 2019 का है। हालांकि सरकार इस आंकड़े को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेती दिखती। उसका तर्क होता है कि पिछले कुछ दशकों से बाल विकास के संकेतकों में सुधार आया है। बेशक पिछले तीस-चालीस साल के दौरान रहीं तमाम सरकारों ने बच्चों पर ज्यादा खर्च करके हालात को कुछ संभाला है। इसी दौरान स्कूली बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन की विश्व प्रसिद्ध योजना का क्रियान्वयन भी हुआ। पिछले दशक में खाद्य सुरक्षा कानून ने भी काफी असर डाला। इसका सीधा असर बच्चों में पोषण से जोड़ा जा सकता है।

लेकिन इघर कुछ वर्षों में जिस तरह से आर्थिक तंगी बढ़ी है, उससे इस तरह की योजनाओं को और ज्यादा प्रभावी बनाने के काम में अड़चनें आई हैं। कई तिमाहियों से जिस तरह से देश की माली हालत गिरावट पर है, उसका असर बच्चों में कुपोषण की समस्या से निपटने की योजनाओं पर पड़ा है। इधर, लगातार बढ़ती आबादी ज्यादा सरकारी खर्च की मांग कर रही है। गौरतलब है कि दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद हम भुखमरी के वैश्विक सूचकांक में अतिगंभीर श्रेणी में हैं। वैश्विक भुखमरी सूचकांक में एक सौ सत्रह देशों के बीच हमारा नंबर एक सौ दो वां है। यानी देश की मौजूदा माली हालत के मद्देनजर यह मानने में कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि बच्चों में कुपोषण की समस्या और गहराती जाने वाली है।

जहां तक बच्चों और किशोरों के लिए कल्याणकारी योजनाओं का सवाल है, तो यह भी तय है कि इसके लिए पर्याप्त मात्रा में धन की दरकार होगी। अलबत्ता सरकार के तरफदार विशेषज्ञ एक ही बात निकाल कर लाएंगे कि अगर आर्थिक मोर्चे को संभाल लिया जाए यानी पहले सकल घरेलू उत्पाद बढ़ा लिया जाए तो उसके बाद सब ठीक हो जाएगा। लेकिन इसका जवाब भी दिया जाना चाहिए कि माली हालत सुधारने का काम लंबा खिंचने वाला है। इस मोर्चे पर पिछले दो साल से हम जिस तरह से लगातार नीचे आते जा रहे हैं, उसके मद्देनजर आने वाले साल-दो साल में किसी चमत्कार की उम्मीद बेमानी है और तब तक स्थायी नुकसान हो जाएगा।

इसमें सबसे बड़ा अंदेशा बच्चों की एक भरी-पूरी पीढ़ी के अविकसित या कमजोर हो जाने का है। यह अपूरणीय क्षति होगी।
हम कितना भी साबित करते रहें कि आर्थिक मोर्चे को फतह करने से तमाम मोर्चे खुद-ब-खुद फतह हो जाते हैं, लेकिन क्या यह देखा जाना जरूरी नहीं है कि आर्थिक वृद्धि क्या और कितनी कीमत चुका कर हासिल होगी। यह समय ध्यान रखने का है कि देश में आर्थिक वृद्धि के लिए निवेश बढ़ाना पहली शर्त है।

अब तक का अनुभव है कि उत्पादक कार्यों में निवेश के चक्कर में सामाजिक जरूरत से ध्यान हट जाता है। बच्चों और किशोरों के लिए कल्याणकारी कार्य अक्सर इसीलिए पीछे छूट जाते हैं क्योंकि उससे तत्काल पूंजी निर्माण नहीं होता। लेकिन विशेषज्ञों की जिम्मेदारी है कि वे सरकार को याद दिलाते रहें कि ये बच्चे और किशोर ही भविष्य के पूंजी निमार्ता हैं। अगर थोड़े समय के लिए भी इस तबके की उपेक्षा होती है, तो यही माना जाना चाहिए कि हम भविष्य की कीमत पर वर्तमान गुजार रहे हैं।

बच्चों और किशोरों के लिए कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च बढ़ाने की वकालत करने वालों को पुख्ता दलीलें भी तैयार करनी होंगी। तर्क देकर यह समझाना पड़ेगा कि ऐसे खर्च का एक फौरी फायदा भी हो सकता है। क्योंकि जब यह सिद्ध हो चुका है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मौजूदा समस्या बाजार में मांग कम पड़ जाने से आई है, तो क्या यह याद नहीं दिलाया जा सकता है कि बच्चों और किशोरों के पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा पर ज्यादा निवेश करके भी पैसा नागरिकों की जेब में ही पहुंचता है। इससे बाजार में मांग खुद ब खुद बढ़ती है। सरकार को अगर अपने निवेश के लिए कोई क्षेत्र चुनना हो और आर्थिक गतिविधियों को अचानक तेज होते देखना हो तो बच्चों और किशोरों के कल्याण की योजनाएं तेजी से क्रियान्वित करना एक विकल्प क्यों नहीं हो सकता है?

अलबत्ता कुछ लोग बहस कर सकते हैं कि पैसे आएंगे कहां से? जो लोग पैसे की तंगी का तर्क देते हैं, उनसे सवाल पूछा जा सकता है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए निवेश कहां से आएगा? और क्या अब तक ऐसा ही निवेश करके देख नहीं लिया गया? बच्चों पर खासतौर पर उनके पोषण और स्वास्थ्य पर खर्च करने के लिए सीधे उनकी जेब में पैसे डालने से बेहतर तरीका और क्या हो सकता है?

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