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अरविंद जयतिलक का लेख : बेरोजगारी बढ़ने के सबब

आज की तारीख में ग्रामीण बेरोजगारी सबसे अधिक है। लेकिन इसे अवसर में बदला जा सकता है। पर यह तभी संभव होगा जब खेती, बागवानी, पशुपालन, वृक्षारोपण, कृषि यंत्रों की मरम्मत के संबंध में आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

प्रतीकात्मक फोटो

पिछले दिनों प्रकाश में आई ‘एस्पाइरिंग माइंड्स’ की ‘नेशनल इम्पालयबिलिटी रिपोर्ट’ चिंतित करने वाली है। यह रिपोर्ट बताती है कि इंजीनियरिंग डिग्री रखने वाले स्नातकों में कुशलता की कमी है और उनमें से करीब अस्सी फीसद स्नातक रोजगार के काबिल नहीं हैं। गौरतलब है कि यह रिपोर्ट देश भर के साढ़े छह सौ से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेजों के तकरीबन डेढ़ लाख इंजीनियरिंग छात्रों पर किए गए अध्ययन पर आधारित है। चंद सप्ताह पहले एसोचैम की एजुकेशन कमेटी के सर्वेक्षण से भी जाहिर हुआ कि देश में चल रहे साढ़े पांच हजार बिजनेस स्कूलों में से सरकार द्वारा संचालित भारतीय प्रबंध संस्थानों तथा कुछ मुट्ठी भर संस्थाओं को छोड़ कर शेष सभी स्कूलों व संस्थाओं से डिग्री लेकर निकलने वाले ज्यादतर छात्र-छात्राएं कहीं भी रोजगार पाने के लायक नहीं। रिपोर्ट की मानें तो भारतीय प्रबंध संस्थानों को छोड़ कर अन्य संस्थानों से पढ़ कर निकलने वाले पेशेवरों में से केवल सात फीसद रोजगार पाने के लायक बन पाते हैं।

हालत यह है कि इंजीनियरिंग और एमबीए की डिग्री रखने वाले बड़ी संख्या में लोग दस हजार रुपए से कम की पगार पर नौकरी कर रहे हैं, जो एक किस्म से अर्द्धबेरोजगारी ही है। इसका असर यह हुआ है कि पिछले दो साल के दौरान दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, अमदाबाद, लखनऊ, हैदराबाद, देहरादून आदि शहरों में करीब सवा दो सौ बिजनेस स्कूल बंद हो चुके हैं। कुछ यही हाल इंजीनियरिंग कॉलेजों की भी है। इसके अलावा शिक्षा की निम्न गुणवत्ता की वजह से 2014 से 2016 के बीच कैंपस रिक्रूटमेंट में भी पैंतालीस फीसद की गिरावट आई है जिसके फलस्वरूप बेरोजगारी-दर में वृद्धि हो रही है। पिछले साल श्रम मंत्रालय की इकाई श्रम ब्यूरो द्वारा जारी ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट में भी कहा गया कि भारत में बेरोजगारी की दर 2013-14 में बढ़ कर 4.9 फीसद पहुंच गई है। गौरतलब है कि 2012-13 में यह दर 4.7 फीसद थी।

श्रम ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक देश के शहरी इलाकों में बेरोजगारी की दर 2013-14 में घट कर 5.5 फीसद पर आ गई है जो इससे पहले के वित्तवर्ष में 5.7 फीसद थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में सबसे कम बेरोजगारी की दर 1.2 फीसद गुजरात में, और सबसे अधिक बेरोजगारी दर सिक्किम में रही। अध्ययन के मुताबिक गुजरात में पंद्रह साल से अधिक उम्र के प्रति एक हजार लोगों में बेरोजगारी दर बारह रही जबकि कर्नाटक में यह अठारह, महाराष्ट्र में अट्ठाईस, मध्यप्रदेश में उनतीस और तेलंगाना में तैंतीस, अरुणाचल प्रदेश में एक सौ चालीस, केरल में एक सौ अठारह, त्रिपुरा में एक सौ सोलह, गोवा में एक सौ छह, जम्मू-कश्मीर में एक सौ पांच, हिमाचल प्रदेश में पचहत्तर, राजस्थान में पैंसठ, पंजाब में अट्ठावन और हरियाणा में अड़तालीस रही।

देश के अन्य राज्यों की भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। पिछले वर्ष राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अड़सठवें दौर पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक ईसाई समुदाय के लोगों में ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी 4.5 फीसद और शहरी इलाकों में 5.9 फीसद है। इसी तरह ग्रामीण इलाकों में सिखों में बेरोजगारी 1.3 फीसद और हिंदुओं में शहरों में 3.3 फीसद है। इसी तरह ग्रामीण इलाकों में मुसलिम पुरुष 49.9 फीसद बेरोजगार हैं जबकि ग्रामीण इलाकों में मुसलिम महिलाएं 15.3 फीसद और शहरी क्षेत्रों में 10.5 के पास ही रोजगार है। गौर करें तो यह स्थिति तब है जब देश में बेरोजगारी से निपटने के लिए ढेरों कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इनमें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, समन्वित विकास कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) प्रमुख हैं। लेकिन जिस तेजी से बेरोजगारी दर में वृद्धि हो रही है उससे साफ है कि देश में बेरोजगारी से निपटने का कोई ठोस कार्यक्रम नहीं है।

गौरतलब है कि भारत सरकार ने लोगों को रोजगार प्रदान करने के लिए स्किल इंडिया के जरिए सन 2022 तक चालीस करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के ताजा सर्वेक्षण पर विश्वास करें तो इस लक्ष्य को हासिल करना फिलहाल मुश्किल ही है। इसलिए कि रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर दस युवाओं में से महज एक युवा को ही किसी तरह का कारोबारी प्रशिक्षण हासिल है। यानी पंद्रह साल से उनसठ साल के आयु वर्ग के सिर्फ 2.2 फीसद लोगों ने औपचारिक रूप से और 8.6 फीसद लोगों ने अनौपचारिक रूप से कारोबारी प्रशिक्षण हासिल किया है। अगर दोनों को जोड़ दें तो यह आंकड़ा 10.8 फीसद ठहरता है। लेकिन जिस गति से देश में बेरोजगारी बढ़ रही है उस हिसाब से कारोबारी प्रशिक्षण की यह उपलब्धि ऊंट के मुंह में जीरा समान ही है।

इस समय देश में नौजवानों का रुझान मेडिकल और इंजीनियरिंग क्षेत्रों को लेकर ज्यादा है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र में भी रोजगार हासिल करने के लिए सिर्फ ढाई फीसद नौजवानों के पास शैक्षिक योग्यता है। यह स्थिति निराश करने वाली है। आमतौर पर पच्चीस से तीस वर्ष के बीच पंचानबे फीसद नौजवान अपनी पढ़ाई पूरी कर लेते हैं और फिर रोजगार की तलाश शुरू कर देते हैं। सीआइआइ की इंडिया स्किल रिपोर्ट-2015 बताती है कि भारत में हर साल तकरीबन सवा करोड़ शिक्षित युवा तैयार होते हैं। ये नौजवान रोजगार के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र, सभी जगह अपनी किस्मत आजमाते हैं। लेकिन सिर्फ सैंतीस फीसद कामयाब हो पाते हैं, यानी उन्हें रोजगार मिलता है। इसके खासकर दो कारण हैं। एक तो यह कि सरकारी क्षेत्र में नौकरियां सिकुड़ रही हैं, जबकि दूसरी ओर प्राइवेट क्षेत्र में उन्हीं लोगों को रोजगार मिल रहा है जिन्हें कारोबारी प्रशिक्षण हासिल है।

यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि देश में सालाना सिर्फ पैंतीस लाख लोगों के लिए कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था है, जबकि दूसरी ओर सवा करोड़ शिक्षित बेरोजगार युवा रोजगार की कतार में खड़े होते हैं। दो वर्ष पहले योजना आयोग ने एलान किया था कि शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने के लिए पचास लाख कौशल विकास केंद्र (स्किल डेवलपमेंट सेंटर) खोले जाएंगे। लेकिन अभी तक लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। सवाल लाजिमी है कि जब कौशल विकास केंद्रों की संख्या में वृद्धि नहीं होगी तो फिर रोजगार कैसे मिलेगा? उचित होगा कि सरकार इन केंद्रों की संख्या बढ़ाए। अगर छोटे कस्बों में नए कौशल विकास केंद्र खोले जाएंगे तो नि:संदेह इससे औद्योगिक ढांचे का विकेंद्रीकरण होगा और अर्थव्यवस्था अधिक आत्मनिर्भर बनेगी। यह किसी से छिपा नहीं है कि अभी तक अनुदान और प्रोत्साहन सिर्फ उत्पादन के आधार पर दिए जाते हैं। बेहतर होगा कि इस आधार को बदला जाए और इसे रोजगार के अवसर प्रदान करने के आधार पर दिया जाए।

आज की तारीख में ग्रामीण बेरोजगारी सबसे अधिक है। लेकिन इसे अवसर में बदला जा सकता है। पर यह तभी संभव होगा जब खेती, बागवानी, पशुपालन, वृक्षारोपण, कृषि यंत्रों की मरम्मत के संबंध में आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाएगा और ग्रामीण निर्माण कार्यक्रमों का विस्तार होगा। अब समय आ गया है कि बेकार पड़ी भूमि को कृषि के अंतर्गत लाया जाए। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की मात्रा में वृद्धि होगी। देश में अच्छे बीजों, उर्वरक तथा यंत्रों की मांग बढ़ गई है। इनकी बिक्री तथा पूर्ति के कामों में काफी लोगों को रोजगार मिल सकता है।

बेहतर होगा कि केंद्र व राज्य सरकारें ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल भारत (स्किल इंडिया) केंद्रों का विस्तार करे। इससे बुनाई, मैकेनिक, आपरेटरी और हस्तशिल्प को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के अवसर सृजित होंगे। चिकित्सा, रियल एस्टेट, शिक्षा एवं प्रशिक्षण, आइटी, मैन्युफैक्चरिंग, बैंकिंग व वित्तीय क्षेत्रों में भी युवाओं को अपना कैरियर संवारने का मौका मिलता है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब सार्वजनिक और निजी क्षेत्र इसमें निवेश बढ़ाएंगे और लोगों को रोजगार देंगे। याद होगा 2012-13 में बैंक-समूहों ने एक लाख लोगों को नौकरी देने का एलान किया था। इसके अलावा देशी-विदेशी कंपनियों ने भी कुछ इसी तरह की घोषणा की थी। लेकिन एलान के मुताबिक वे रोजगार उपलब्ध कराने में विफल रहीं। अगर बैंकिंग समूह ही ग्रामीण क्षेत्रों में अपना विस्तार करे तो यहां लाखों लोगों को रोजगार मिल सकता है। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सरकार निवेश को बढ़ावा देकर रोजगार सृजित कर सकती है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों की भारी कमी है। अगर सरकार इसका विस्तार करे तो न सिर्फ रोजगार का सृजन होगा बल्कि सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य लाभ भी मिलेगा।

स्किल इंडिया के अलावा कुछ अन्य दिशा में भी गौर फरमाने की जरूरत है। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण है निवेश के ढांचे में परिवर्तन लाने की। अगर सरकार आधारभूत और उपभोक्ता वस्तु उद्योगों में निवेश बढ़ाए तो न सिर्फ शिक्षित बेरोजगार नौजवानों को रोजगार मिलेगा बल्कि वस्तुओं की पूर्ति में भी वृद्धि होगी। रोजगार बढ़ाने के लिए छोटे उद्योगों का विकास सबसे ज्यादा जरूरी है। इसलिए कि छोटे उपक्रम बड़े उपक्रमों के मुकाबले अधिक लोगों को रोजगार देते हैं। अर्थशास्त्रियों की मानें तो लघु उद्योगों में उतनी ही पूंजी लगाने से बड़े उद्योगों की तुलना में पांच गुना अधिक लोगों को रोजगार मिलता है। लेकिन सरकारी नीतियों और प्रोत्साहन-कार्यक्रमों में लघु उद्योग प्राथमिकता में नहीं हैं। इसलिए हैरत की बात नहीं कि रोजगार-वृद्धि थम गई है।

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