राजनीति: चुनौती बनता चीनी रेल का जाल

भारत से लगती सीमा पर सड़कों और खास तौर से रेल नेटवर्क का विस्तार करना चीनी साम्राज्यवाद की रणनीति है। चीन इस पर पिछले डेढ़-दो दशक से काम कर रहा है। इसका एक चिंताजनक पहलू यह है कि वह इसमें भारत के छोटे पड़ोसी देशों को भी शामिल कर लेता है। जैसे नेपाल से जुड़े कई मामलों में उसकी यह चाल जब-तब सामने आती रही है।

Author Updated: December 9, 2020 5:00 AM
corridorचीन-पाकिस्‍तान के बीच निर्मित रेल कॉरिडोर। फाइल फोटो।

संजय वर्मा

मानव इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि सरहदें हमेशा महत्त्वपूर्ण रही हैं। एक राष्ट्र के रूप में ही नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और सामाजिक रहन-सहन के दायरों को भी सीमाएं एक ठोस पहचान देती रही हैं। लेकिन जब बात आस-पड़ोस के देशों के संबंधों और देश की संप्रभुता की आती है तो इनमें आने वाले उतार-चढ़ाव अक्सर सीमाओं के मामले में ऐतिहासिक साबित होते रहे हैं।

शायद यही वजह है कि ज्यादातर देश पड़ोसी देशों से लगती सीमाओं पर शांति कायम रखने के पक्षधर रहे हैं। लेकिन सरहदों की शांति के मामले में भारत इतना भाग्यशाली नहीं रहा। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों की तो बात दूर, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देश भी जब-तब भारत को आंख दिखाने से बाज नहीं आते। हालांकि भारत की हमेशा से यही कोशिश और नीति रही है कि पड़ोसी मुल्कों से सीधे टकराव की नौबत न आए। लेकिन चीन से एक बार (1962) और पाकिस्तान से चार बार (1947-48, 1965, 1971 और 1999) हुए युद्ध साबित करते हैं कि कई बार चाह कर भी टकराव टल नहीं पाते और ऐसे में दुश्मन देश को उसी की भाषा में जवाब देना अपरिहार्य हो जाता है।

ऐसी ही नौबत इस साल जून में लद्दाख की गलवान घाटी में चीन की हरकतों के कारण पैदा हुई और जिसके फिलहाल समाधान की कोई ठोस राह वार्ताओं के कई दौरों के बाद भी नहीं निकल पाई है। चीन की तरफ से चुनौती सिर्फ यही नहीं है कि उसकी सेना भारत से लगे सरहदी इलाकों में गड़बड़ियां पैदा करती रहती है, बल्कि सीमाई इलाकों में रेल और सड़क संपर्कों का जाल बिछाने की उसकी प्राथमिकताओं से भारत के समक्ष भी यह स्थिति बन गई है कि वह भी सरहदी बुनियादी ढांचे के मामले में चीन की बराबरी करे। इस संबंध में चीन के मुकाबले की पूरी कोशिशें तो हो रही हैं, लेकिन इस काम में हुए विलंब और सीमा पर चीनी रेल नेटवर्क की तेजी ने एक ऐसा संकट खड़ा कर दिया है, जिसकी अब किसी भी रूप में अनदेखी भारत को भारी पड़ेगी।

कुछ दिनों पहले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रेल महकमे के अधिकारियों से कहा था कि वे सिचुआन-तिब्बत रेलवे परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करें। खास तौर से उनका जोर लिंझी-यान रेलवे लाइन पूरा करने पर है। लिंझी-यान रेल लाइन तिब्बत के लिंझी को चीन के सिचुआन प्रांत से जोड़ेगी। लिंझी का महत्त्व इससे समझा जा सकता है कि यह स्थान भारत के उत्तर-पूर्व के प्रांत अरुणाचल प्रदेश की सीमा से लगा है।

करीब 47.8 अरब डॉलर की इस रेल परियोजना के पूरा होने से सिचुआन प्रांत की राजधानी चेंगदू से तिब्बत की राजधानी ल्हासा का सफर सिर्फ तेरह घंटे का रह जाएगा, जिसमें अभी अड़तालीस घंटे लगते हैं। चीन के सैन्य इरादों को देखते हुए सीमाई इलाकों में ऐसी परियोजनाएं संदेह से परे नहीं की जा सकतीं। वैसे भी चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बता कर उस पर अपना दावा ठोकता रहता है। इसलिए यदि लिंझी तक वह ऐसी रेल लाइन बिछाता है जिससे सैन्य साजोसामान को तेजी से पहुंचाना आसान हो जाए, तो चीनी मंसूबों पर संदेह जगना स्वाभाविक ही है। लिंझी तक रेल लाइन आने का मतलब है कि चीन जब चाहे, अपनी मिसाइलें तक यहां ला सकता है और युद्ध के हालात पैदा कर जमीन कब्जाने की हरकत कर सकता है।

भारत से लगती सीमा पर सड़कों और खास तौर से रेल नेटवर्क का विस्तार करना चीनी साम्राज्यवाद की रणनीति है। चीन इस पर पिछले डेढ़-दो दशक से काम कर रहा है। इसका एक चिंताजनक पहलू यह है कि वह इसमें भारत के छोटे पड़ोसी देशों को भी शामिल कर लेता है। जैसे नेपाल से जुड़े कई मामलों में उसकी यह चाल जब-तब सामने आती रही है। करीब पांच साल पहले खबर आई थी कि चीन मशहूर पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट के नीचे सुरंग बना कर तिब्बत और नेपाल को आपस में जोड़ने की योजना बना रहा है। इसके लिए तिब्बत-नेपाल के बीच पांच सौ चालीस किलोमीटर लंबा हाई स्पीड रेल नेटवर्क बिछाया जाएगा।

यह असल में मौजूदा एक हजार नौ सौ छप्पन किलोमीटर लंबे क्विंगहाइ-तिब्बत रेल नेटवर्क को और आगे बढ़ाने की योजना का हिस्सा है, जिसमें नेपाल को तिब्बत से जोड़ने का प्रस्ताव किया गया था। इस नेटवर्क के लिए चीन तिब्बत में कोमोलांग्मा पर्वत के नीचे खुदाई करके लंबी-लंबी सुरंगें तैयार करेगा। कोमोलांग्मा असल में माउंट एवरेस्ट का ही चीनी नाम है। अगस्त, 2013 में चीन ने नेपाल सीमा के नजदीक तिब्बत के सबसे बड़े शहर शिगाजे को राजधानी ल्हासा से जोड़ने वाली दो सौ तिरपन किलोमीटर लंबी रेल लाइन बना कर तैयार की थी। भारत के नजरिये से देखें तो चीन के लिए इसका सैन्य और रणनीतिक महत्त्व काफी ज्यादा है।

नेपाल और तिब्बत के ऊंचे, दुर्गम और बर्फीले इलाकों में रेल लाइनों का पहुंचना व्यापार, पर्यटन और बेमिसाल इंजीयनिरिंग का उदाहरण होने के साथ-साथ इसकी मिसाल भी है कि कैसे चीन ने भारत के नजदीकी सीमावर्ती इलाकों में रेलें पहुंचा कर अपनी सेनाओं की आवाजाही को आसान बना दिया है। कुछ ही समय पहले इन ज्यादातर इलाकों में सेना की पहुंच महज सड़कों के जरिए ही थी। बारिश और बर्फबारी के दिनों में सड़कों पर यातायात रुक जाता था।

यही नहीं, इन बाधाओं के रहते कई अहम मौकों पर सेनाओं की पहुंच में विलंब होता था। जैसे शिगाजे से ल्हासा तक सड़क के रास्ते जाने में पांच घंटे का वक्त लगता था, जबकि ट्रेन यही दूरी सिर्फ दो घंटे में तय कर लेती है। नेपाल के अलावा चीन की नजर भारत से लगती पाकिस्तानी सीमाओं पर भी है। चीनी सरकार अपने सीमावर्ती प्रांत शिनजियांग से पाक-अधिकृत कश्मीर के रास्ते पाकिस्तान तक एक अंतरराष्ट्रीय रेल लिंक बनाने की योजना पर काम करने की तैयारी में है।

यह प्रस्तावित रेल लिंक अठारह सौ किलोमीटर लंबा होगा और इस्लामाबाद व कराची से गुजरते हुए पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन के शिनजियांग प्रांत के काशगर शहर को आपस में जोड़ेगा। इसका सबसे चिंताजनक पहलू पाक-अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरना है, इसीलिए भारत ने इस पर अपनी चिंताओं से चीन को अवगत कराया था।

भारत से लगते इलाकों में रणनीतिक बुनियादी ढांचे खड़े करने से हालात इस तरह के बन गए हैं कि तिब्बत जैसे इलाकों में भी चीनी सेनाएं हमारे सामने आ खड़ी हुई हैं और हिमालय को चीन ने एक युद्ध के मैदान में बदल दिया है। अब विकल्प यह बचा है कि भारत भी अपनी सेनाओं के लिए सीमाई क्षेत्रों में वैसे ही सड़क व रेल नेटवर्क तैयार करे जैसे कि चीन ने किए हैं। हालांकि इस दिशा में पिछले कुछ वर्षों में जो प्रयास किए गए हैं, वे थोड़ी राहत देते हैं। जैसे, अरुणाचल की राजधानी ईटानगर को भी रेलवे के मानचित्र पर लाया जा चुका है।

इसी तरह रंगिया-मुर्कोंगसेल लेक तक की पांच सौ दस किलोमीटर लंबी रेल लाइन को चालू करने का आश्वासन भी है। रंगिया उत्तर-पूर्व क्षेत्र का सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रेल जंक्शन है। यहां से होकर एक रेल लाइन भूटान तक जाती है। इसके अलावा उत्तराखंड में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन बिछाने का काम अब जाकर जोर पकड़ पाया है। लेकिन इसके बावजूद वस्तुस्थिति यह है कि सामरिक महत्त्व वाली तकरीबन चौदह रेल परियोजनाएं पैसे की कमी के कारण लंबित हैं।

बेशक, चीन को लेकर कभी हमारे देश में ‘हिंदी-चीनी, भाई-भाई’ का नारा प्रचलित हुआ था, लेकिन आर्थिक प्रतिद्वंद्विता और सीमाई हितों के बदले यथार्थ में यह जरूरी हो गया है कि सीमा पर आम नागरिकों के साथ-साथ फौज की आवाजाही को सुचारू बनाने वाली पहलकदमियों में अब तेजी लाई जाए। गलवान घाटी की घटना ने साबित कर दिया है कि इस मामले में अब कोई देरी जमीन कब्जाने के चीनी मंसूबों को और बढ़ाने वाली ही साबित हो सकती है।

Next Stories
1 राजनीति: चांद की ओर बढ़ते कदम
2 राजनीति: अर्थव्यवस्था में भरोसे का संकट
3 राजनीति: बचाना होगा छोटी नदियों को
आज का राशिफल
X