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राजनीतिः खतरे में आदिवासी संस्कृति

जनजातीय समूहों में उनकी परंपरागत भाषा से संबंधित सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्श नियमों का क्षरण होने से जनजातीय समाज संक्रमण के दौर से गुजरने लगा है। जनजातियों की संस्कृति पर दूसरा हमला कारपोरेट जगत और सरकार की मिलीभगत के कारण हो रहा है। जंगल को अपनी मातृभूमि समझने वाली जनजातियों के इस आशियाने को उजाड़ने का जिम्मा खुद सरकारों ने उठा लिया है। जंगलों को काट कर और जला कर उस भूमि को जिस प्रायोजित तरीके से उद्योग समूहों को सौंपा जा रहा है, उसका भी प्रभाव उनकी संस्कृति पर साफ देखा जा रहा है।

जनजातियों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के अलावा सामाजिक समस्याओं ने भी उन्हें दोराहे पर खड़ा कर दिया है, जिससे न तो वे अपनी संस्कृति बचा पा रही हैं और न ही आधुनिकता से लैस होकर राष्ट्र की मुख्यधारा में ही शामिल हो पा रही हैं।

पिछले साल संयुक्त राष्ट्र की ‘द स्टेट आफ द वर्ल्ड्स इंडिजिनस पीपुल्स’ नामक रिपोर्ट से यह उद्घाटित हुआ था कि मूलवंशी और आदिम जनजातियां भारत सहित संपूर्ण विश्व में अपनी संपदा, संसाधन और जमीन से वंचित व विस्थापित होकर विलुप्त होने के कगार पर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक खनन कार्य के कारण हर रोज हजारों जनजाति परिवार विस्थापित हो रहे हैं और उनकी सुध नहीं ली जा रही है। विस्थापन के कारण उनमें गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी बढ़ रही है। नेशनल फेमिली हेल्थ (एनएफएच) सर्वे में यह खुलासा हुआ है कि कोलम (आंध्रप्रदेश और तेलंगाना), कोरगा (कर्नाटक), चोलानायकन (केरल), मलपहाड़िया (बिहार), कोटा (तमिलनाडु), बिरहोर (ओड़िशा) और शोंपेन (अंडमान और निकोबार) के विशिष्ट संवेदनशील आदिवासी समूहों की संख्या घट रही है और आदिवासी बच्चों की मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से दोगुने स्तर पर पहुंच गई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक जनजातीय बच्चों की मृत्यु दर 35.8 फीसद है, जबकि राष्ट्रीय औसत दर 18.4 फीसद है। इसी तरह जनजातीय शिशु मृत्यु दर 62.1 फीसद है, जबकि राष्ट्रीय शिशु मृत्यु दर सत्तावन फीसद है। यह आंकड़ा भारत की सांस्कृतिक विविधता पर मंडराते किसी खतरे से कम नहीं है।

जनजातियों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के अलावा सामाजिक समस्याओं ने भी उन्हें दोराहे पर खड़ा कर दिया है, जिससे न तो वे अपनी संस्कृति बचा पा रही हैं और न ही आधुनिकता से लैस होकर राष्ट्र की मुख्यधारा में ही शामिल हो पा रही हैं। इस कारण उनकी सभ्यता और संस्कृति दोनों दांव पर हैं। जनजातीय समुदायों को लंबे समय से धर्म के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है। लिहाजा, बड़े पैमाने पर उनका धर्म परिवर्तन हुआ, लेकिन जीवन में कोई खास सुधार नहीं हुआ। धर्म परिवर्तन न तो उनकी गरीबी व बेरोजगारी को कम कर पाया और न ही उन्हें इतना शिक्षित ही बनाया कि वे स्वावलंबी होकर अपने समाज का भला कर सकें। इसका एक दुष्प्रभाव यह भी हुआ कि इससे जनजातियां जाति व्यवस्था के खांचे में घिरती चली गर्इं। और जनजातियों की परंपरागत सामाजिक एकता और सामुदायिकता खतरे में पड़ गई। आज स्थिति यह है कि धर्म परिवर्तन के कारण बहुत से आदिवासियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। विवाह और सामाजिक संपर्क के क्षेत्र में उन्हें अब भी एक पृथक समूह के रूप में देखा जा रहा है। अनेक जनजातियां संस्कृतिकरण के दुष्परिणाम को न समझते हुए उन्हीं समूहों की भाषा बोलने लगीं, जिनकी संस्कृति को स्वीकार कर लिया था। आज भारत की उत्तर पूर्वी और दक्षिणी भागों की जनजातियों में कितने ही व्यक्तियों ने अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा के रूप में स्वीकार कर अपनी मूलभाषा का परित्याग कर दिया है।

जनजातीय समूहों में उनकी परंपरागत भाषा से संबधित सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्श नियमों का क्षरण होने से जनजातीय समाज संक्रमण के दौर से गुजरने लगा है। जनजातियों की संस्कृति पर दूसरा हमला कारपोरेट जगत और सरकार की मिलीभगत के कारण हो रहा है। जंगल को अपनी मातृभूमि समझने वाले जनजातियों के इस आशियाने को उजाड़ने का जिम्मा खुद सरकारों ने उठा लिया है। जंगलों को काट कर और जला कर उस भूमि को जिस प्रायोजित तरीके से उद्योग समूहों को सौंपा जा रहा है, उसका भी प्रभाव उनकी संस्कृति पर साफ देखा जा रहा है। देश में नब्बे के दशक से ही विदेशी निवेश बढ़ाने की गरज व खनन नीतियों में बदलाव के कारण आदिवासी परंपरागत भूमि से बेदखल हो रहे हैं। एक रिपोर्ट में आदिवासी जनसमुदाय की दशा पर ध्यान खींचते हुए कहा गया है कि इनकी आबादी विश्व की जनसंख्या की महज पांच फीसद है, लेकिन दुनिया के नब्बे करोड़ गरीब लोगों में मूलवासी लोगों की संख्या एक तिहाई है। विकसित और विकासशील दोनों ही देशों में कुपोषण, गरीबी और सेहत को बनाए रखने के लिए जरूरी संसाधनों के अभाव और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के कारण आदिवासी जनसमूह विश्वव्यापी स्तर पर अमानवीय दशा में जी रहे हैं।

आमतौर पर जनजातीय समाज सीधे और सरल माने जाते हैं, लेकिन उनकी परंपरागत अर्थव्यवस्था पर हमले ने उन्हें आक्रोशित बना दिया है। अब वे अपनी उदार संस्कृति का परित्याग कर हथियार की भाषा बोलने लगे हैं। मूलवासी जनसमूह आजीविका के संकट से तो जूझ ही रहे हैं, साथ ही वे कई तरह की बीमारियों से भी लड़ रहे हैं। अगर विकसित देश अमेरिका की ही बात करें, तो यहां आम आदमी की तुलना में जनजातीय समूह के लोगों को तपेदिक होने की आशंका छह सौ गुना अधिक है। उनके आत्महत्या करने की आशंका भी बासठ फीसद ज्यादा है। आस्ट्रेलिया में जनजातीय समुदाय का कोई बच्चा किसी अन्य समूह के बच्चे की तुलना में बीस साल पहले मर जाता है। नेपाल में अन्य समुदाय के बच्चे से जनजातीय समुदाय के बच्चे की आयु संभाव्यता का अंतर बीस साल, ग्वाटेमाला में तेरह साल और न्यूजीलैंड में ग्यारह साल है। विश्व स्तर पर देखें तो जनजातीय समुदाय के कुल पचास फीसद लोग टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित हैं। इस संख्या में और भी इजाफा होने के आसार हैं। जनजातीय समूह भाषा के संकट से भी जूझ रहे हैं।

‘भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर’ द्वारा किए गए ‘भारतीय भाषाओं के लोकसंरक्षण’ का अध्ययन बताता है कि विगत पचास वर्षों में भारत में बोली जाने वाली साढ़े आठ सौ भाषाओं में तकरीबन दो सौ पचास भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं और एक सौ तीस से अधिक भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है। विलुप्त होने वाली भाषाओं में सर्वाधिक आदिवासियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं हैं। शोध के मुताबिक असम की पचपन, मेघालय की इकतीस, मणिपुर की अट्ठाईस, नगालैंड की सत्रह और त्रिपुरा की दस भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं। इन्हें बोलने वालों की संख्या लगातार तेजी से घट रही है। सिक्किम में माझी बोलने वालों की संख्या सिर्फ चार रह गई है। छोटे से राज्य अरुणाचल में ही नब्बे से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं। इसी तरह ओड़ीशा में सैंतालीस और महाराष्ट्र एवं गुजरात में पचास से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं। चूंकि भारत भाषायी विविधता से समृद्ध देश है लिहाजा आदिवासी क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाओं का विशेष संरक्षण जरूरी है।

वैश्विक आंकड़ों पर गौर फरमाएं, तो दुनियाभर में एक सौ निन्यानवे भाषाएं ऐसी हैं जो आदिवासी क्षेत्रों में बोली जाती हैं और अब उनके बोलने-लिखने वाले लोगों की संख्या एक दर्जन से भी कम रह गई है। यूक्रेन में बोली जाने वाली कैरेम भी इन्हीं भाषाओं में से एक है जिसे बोलने वालों की संख्या महज छह है। इसी तरह ओकलाहामा में विचिता भाषा बोलने वालों की संख्या दस और इंडोनेशिया में लेंगिलू बोलने वालों की संख्या सिर्फ चार रह गई है। इसी तरह विश्व में एक सौ अठहत्तर भाषाएं ऐसी भी हैं जिन्हें बोलने वाले लोगों की संख्या डेढ़ सौ तक है। किंतु दुर्भाग्य है कि इस भाषायी विविधता को बचाने की कोई ठोस पहल नहीं हो रही है।

चिंता की बात यह है कि जनजातीय समूह सभ्य कहे जाने वाले लोगों के भी निशाने पर हैं। अमेरिका हो या भारत, हर जगह विकास के नाम पर जंगलों को उजाड़ा जा रहा है। अपनी सुरक्षा और रोजगार के लिए जनजातीय समूह अपने मूलस्थान से पलायन कर रहे हैं। दूसरे समूहों में जाने और रहने के कारण उनकी भाषा और संस्कृति प्रभावित हो रही है। यही नहीं, भारत समेत इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड जैसे तमाम देशों में उन्हें झूठे आरोपों में फंसा कर उन पर अत्याचार किए जा रहे हैं। जरूरत आज जनजातीय जीवन व संस्कृति दोनों बचाने की है। अन्यथा संस्कृति और समाज की टूटन उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा से तो अलग करेगी ही, उन्हें हिंसक घटनाओं के लिए भी उत्प्रेरित करेगी जो किसी भी देश व समाज के हित में नहीं होगा।

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