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सड़कों पर हादसों का सफर

सड़क पर होने वाली मौतों के मामले में दिल्ली सबसे आगे है, जबकि उत्तर प्रदेश को सबसे घातक प्रांत बताया गया है।
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

पिछले महीने बुलंदशहर में सिकंदराबाद-गुलावड़ी मार्ग पर दो ट्रकों की टक्कर में नौ लोगों की जान गई और बारह अन्य घायल हो गए। होली वाले दिन बुलंदशहर जिले में बाईस लोगों से भरा एक वाहन ट्रक से टकरा गया, जिसमें नौ व्यक्तियों की मौत हो गई। इटावा जिले में टैक्टर-ट्रॉली भिड़ंत में आठ बच्चों सहित उन्नीस लोगों के मरने की खबर आई। इसी तरह यमुना एक्सप्रेस-वे पर आगरा से दिल्ली लौट रही एक कार के मथुरा में दुर्घटनाग्रस्त होने से दो महिलाओं और एक बच्चे सहित कुल पांच लोगों की मौत हो गई। पिछले दिनों अयोध्या में मंदिर से लौट रहे लखनऊ के एक कॉलेज छात्र को उलटी तरफ से आ रहे वाहन ने मौत के घाट उतार दिया। इसी तरह परीक्षा देकर लौट रही नंदिनी नगर कॉलेज की एक छात्रा को बस ने कुचल दिया।

ऐसी दुर्घटनाएं आम हो चली हैं, लेकिन इन पर अंकुश लगाने की दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठाए गए। सच तो यह है कि राज्य प्रशासन ने इस संवेदनशील मसले को बहुत हल्के से लिया। मरने वालों में कोई किसी की मां, कोई बहन, कोई घर में कमाने वाला इकलौता व्यक्ति, तो कोई वह बच्चा भी था, जिसने अपने भविष्य के लिए बड़े-बड़े सपने संजोए हुए थे। प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इस विषय पर चिंता जताई। उन्होंने दिल्ली के मैनेजमेंट छात्र का उदाहरण देते हुए कहा कि उस छात्र की एक सड़क दुर्घटना में बेहद खून बहने से मौत हो गई। वह दस मिनट तक सड़क पर पड़ा रहा, लेकिन कोई उसकी मदद को नहीं आया। उन्होंने कहा कि सरकार सड़क परिवहन और सुरक्षा कानून बनाएगी और दुर्घटना के शिकार लोगों को बिना पैसा चुकाए तुरंत चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराएगी।

अगर हम नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो और सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों पर गौर करें तो एक भयावह तस्वीर सामने आती है। भारत में हर साल साढ़े चार लाख से ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें करीब डेढ़ लाख लोग ऐसी दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा देते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर हर घंटे सोलह लोगों के मारे जाने का औसत है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार सड़क पर होने वाली मौतों के मामले में दिल्ली सबसे आगे है, जबकि उत्तर प्रदेश को सबसे घातक प्रांत बताया गया है। पूरे देश में ओवरटेकिंग और खतरनाक ड्राइविंग की जितनी घटनाएं होती हैं, उनमें से एक चौथाई से ज्यादा घटनाएं महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में होती हैं। यह औसत 27.7 फीसद है। नशे की हालत में गाड़ी चलाते हुए सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं जिन चार राज्यों में हुई हैं, उनमें उत्तर प्रदेश भी एक है, जबकि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और बिहार भी ऐसी घटनाओं में काफी आगे हैं।

नशे में गाड़ी चलाने का ही नतीजा है कि काफी वाहन इमारतों से टकरा जाते हैं। ऐसी दुर्घटनाओं में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। इस तरह की मौतों में 19.11 फीसद केवल इस राज्य में हुर्इं। जिन शहरों में ऐसी दुर्घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं, उनमें दस शहरों को सबसे खतरनाक माना गया है, उनमें उत्तर प्रदेश के तीन शहर कानपुर, लखनऊ और आगरा शामिल हैं। इन सब आंकड़ों से एक ही बात जाहिर होती है कि उत्तर प्रदेश का सड़क दुर्घटनाओं के मामले में रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। ऐसे में इस बात का कोई मतलब नहीं रह जाता कि दुर्घटनाओं में पहले नंबर पर कौन है और दूसरे नंबर पर कौन? इन दुर्घटनाओं को युद्ध स्तर पर रोके जाने की जरूरत है। यह हालत तब है जब राज्य सरकार से जुड़े लोग इन दुर्घटनाओं में मारे गए हैं। सपा विधायक हाजी इरफान की इसी साल सैफई जाते समय कार पेड़ से टकराने से मृत्यु हो गई थी। हाजी उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव के बेटे की शादी में भाग लेने के लिए जा रहे थे।

यातायात पुलिस निदेशालय, उत्तर प्रदेश के जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 में हुई दुर्घटनाओं में 16,287 लोगों की मौत हुई, जबकि 22,337 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। देश में सत्तर फीसद दुर्घटनाएं चालकों की लापरवाही से होती हैं। दस फीसद दुर्घटनाएं वाहनों की तकनीकी खराबी से, छह फीसद खराब मौसम से और चार फीसद के लिए खराब सड़कें जिम्मेदार हैं। जाहिर है कि चालकों की लापरवाही इन दुर्घटनाओं में सबसे अहम है। इन चालकों को दिए जाने वाले लाइसेंस की जांच बहुत जरूरी है। कई कंपनियों में चालकों की सीमित संख्या होने से इन्हें कई शिफ्ट करनी पड़ती है, जिससे ऐसी दुर्घटनाओं पर लगाम नहीं लग पा रही।

उत्तर प्रदेश में दुर्घटनाओं की एक बड़ी वजह सड़कों पर स्पष्ट संकेत का अभाव है। यहां के ज्यादातर इलाकों में यह पता ही नहीं चल पाता कि ट्रकों के लिए कौन-सी लेन है और बाकी वाहनों के लिए कौन-सी। ग्रामीण इलाकों में गांव वालों ने डिवाइडर बना दिए हैं। हाइवे पर अवैध निर्माण होता है। फुटफाथ पर दुकानें लग जाती हैं। सड़कों पर सामान बेचा जाता है। यहां तक कि पार्किंग भी सड़कों पर ही की जाती है, जिससे सड़कों पर आवागमन बाधित होता है।

इतना ही नहीं, सड़कों पर तेज ध्वनि में बजते हॉर्न से प्रदूषण स्तर में काफी इजाफा हुआ है। इन्हें रोकने के लिए देश में मौजूद कानूनों का क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो पा रहा। राज्य सरकारें सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान करने वालों से तो जुर्माना वसूल सकती हैं, लेकिन ध्वनि प्रदूषण पर ऐसी किसी कार्यवाही का ब्योरा देने में हिचकती हैं। आमतौर पर माना जाता है कि अस्सी डेसिबल से अधिक शोर होने पर किसी भी व्यक्ति का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। महानगरों में सड़कों पर इतना शोर आम है। पर कल्पना कीजिए कि जब सड़कों पर यह शोर एक सौ चालीस डेसिबल तक पहुंच जाए तो क्या होगा। जाहिर है, इससे बहरेपन का खतरा पैदा हो जाएगा। महानगरों में चौराहों पर हॉर्न बजाने पर प्रतिबंध होने की कोई परवाह नहीं करता। यही वजह है कि सड़क पर आप वाहन में हों या पैदल, बेवजह हॉर्न के शोर से बच नहीं सकते। शायद सिरदर्द, थकान, अनिद्रा, कानों की समस्या, स्वभाव में चिड़चिड़ापन आदि परेशानियों से हम घिर जाते हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि ध्वनि प्रदूषण का असर अठारह साल से कम उम्र के बच्चों पर ज्यादा होता है और दस साल से कम उम्र के बच्चों को कान की बीमारी ओटाइटिस हो रही है। इससे सुनने की शक्ति कम हो जाती है। उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस समय राज्य में करीब सत्रह लाख वाहन चलते हैं। राज्य के चौराहों पर जब जाम लगता है तो ध्वनि प्रदूषण की मात्रा कहां पहुंचती होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

इस पूरे मसले पर चिंतन जरूरी है। दुर्घटना से सीख लेनी होगी। हमें इस बात से भी बचना होगा कि केंद्र राज्य की गलती ढूंढ़े और राज्य केंद्र की। यहां फ्रांस का उदाहरण ज्यादा मुफीद होगा। ‘द डिपार्टमेंट आॅफ रोड ऐंड मोबिलिटी’ ने पेरिस की सार्वजनिक जगहों पर बदलाव के लिए अभियान चला रखा है। शहर के अंदर एक सौ पचासी एकड़ में बनी सड़क साइकिल चालकों, पैदल राहगीरों के लिए छोड़ी गई है, जहां गाड़ियों की पार्किंग पर रोक होगी। शहर के सार्वजनिक स्थानों की फिर से डिजाइन का काम चल रहा है। इससे वाहनों की आवाजाही में पच्चीस फीसद की गिरावट और कारों की खरीद में सैंतीस फीसद की कमी आई है। अभी शहर में कारों की गति पचास किलोमीटर प्रति घंटा है। इससे दूसरे वाहनों के लिए सड़कें सामान्यतया सुरक्षित नहीं हैं। इसलिए स्थानीय निकाय ने पूरे शहर में कारों की गति बीस किलोमीटर प्रति घंटा कर दी है।

कई हादसे ड्रावर की भूल से होते हैं, जैसे उसे नींद आना। मगर ज्यादातर मामले किसी को बचाने में होते हैं, जैसे अचानक किसी गाड़ी, व्यक्ति या किसी जानवर के सामने आ जाने से गंभीर दुर्घटना हो जाती है। इससे बचने के लिए ड्रावर ट्रेनिंग कैंप लगाने चाहिए, ताकि ड्राइवर ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए मानसिक तौर से मजबूत रहें।

सड़क परिवहन को सुरक्षित नहीं किया जा सकता और न दुर्घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। इसके लिए समाज में अच्छे और सुरक्षित तरीके से वाहन चलाने की प्रवृत्ति विकसित करने की जरूरत है। कई मोटरसाइकिल चालक कहीं भी मुड़ जाने और करतबी अंदाज में लहराते हुए चलने को अपना अधिकार समझते हैं। रात को आमतौर पर पुलिस की तैनाती भी उतनी नहीं होती, जितनी होनी चाहिए। जरूरत है कानूनी प्रावधानों को कठोर बनाने की। दुर्घटना संभावित क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए। वहां सीसीटीवी कैमरे लगा कर सतर्कता बरती जा सकती है।

हमें देखना होगा कि वाहन चालकों पर नियंत्रण की सीमा ट्रैफिक पुलिस किस तरह बढ़ा सकती है। हालांकि हेलमेट की अनिवार्यता और गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात न करना आवश्यक नियम बना दिया गया है, लेकिन कानून को ताक पर रखना इंसान की फितरत बन चुकी है। मगर स्वनियंत्रण ही सबसे बड़ा समाधान है। हर किसी को जागरूक होना पड़ेगा और हर इंसान को दूसरे राही का मददगार बनना होगा। तभी दुर्घटनाएं कम होंगी और होंगी भी तो बहुमूल्य जीवन नष्ट न होंगे। सड़क की डिजाइन समाज की जरूरत के हिसाब से हो। (लेखक भाजपा के लोकसभा सांसद हैं)

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