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राजनीतिः संकट पैदा करते तेल के दाम

भारत अपने तेल की कुल जरूरत का करीब बयासी फीसद आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है। अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपया 72 के स्तर को भी छू सकता है। ऐसे में महंगे कच्चे तेल के कारण पेट्रोल-डीजल के दाम तीन से चार रुपए प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं।

Author July 13, 2018 4:33 AM
देश को पेट्रोल और डीजल की महंगाई से बचाने के लिए ऊर्जा नीति को नए सिरे से तैयार करने की जरूरत है, ताकि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से होने वाली आर्थिक मुश्किलों को कम किया जा सके।

जयंतीलाल भंडारी

पिछले हफ्ते दुनिया की मशहूर क्रेडिट रेटिंग एजंसी- मूडीज ने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच छिड़े व्यापार युद्ध, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के बढ़ते दाम और रुपए की कीमत में ऐतिहासिक गिरावट से अब पेट्रोल और डीजल में आ रही तेजी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है। विश्व बैंक ने भी इस साल की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का सबब बन सकती हैं। दुनिया के अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि एक-दो दशक पहले मानसून का बिगड़ना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का कारण बन जाया करता था, लेकिन अब मानसून के धोखा देने पर भी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को बहुत कुछ नियंत्रित कर लिया जाता है।

अब स्थिति यह है कि कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर की घटनाओं और तेल उत्पादक देशों की नीतियों से जुड़ी हुई हैं, जिन पर भारत का नियंत्रण नहीं होता। ऐसे में भारत को कच्चे तेल की बढ़ती हुई कीमतों पर नियंत्रण के लिए पेट्रोल-डीजल के विकल्पों पर रणनीतिक रूप से आगे बढ़ना होगा। एक जुलाई, 2018 से कच्चे तेल का उत्पादन करने वाले तेरह देशों के संगठन- ओपेक (आर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज) द्वारा कच्चे तेल का उत्पादन लगभग दस लाख बैरल प्रतिदिन (बीपीडी) बढ़ा दिया गया है। फिर भी वैश्विक तेल बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम नहीं हो पाई हैं। इसके साथ ही भारत के लिए कच्चे तेल के मूल्यों से संबंधित एक और नई बड़ी चिंता है। पिछले दिनों अमेरिका ने कठोरता के साथ जिस तरह भारत और चीन सहित सभी देशों को ईरान से कच्चे तेल का आयात चार नवंबर तक बंद करने के लिए कहा है, उससे भारत के समक्ष सस्ते तेल के लिए नए देशों को ढूंढ़ने का संकट खड़ा हो गया है।

अमेरिका ने चार नवंबर के बाद भी ईरान से तेल आयात करने वाले देशों के खिलाफ सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है। भारत में इराक और सऊदी अरब के बाद सबसे ज्यादा कच्चा तेल ईरान से मंगाया जाता है। ईरान को भारत यूरोपीय बैंकों के माध्यम से यूरो में भुगतान करता है। डॉलर की तुलना में यूरो में भुगतान भारत के लिए लाभप्रद है। ईरान से किया जाने वाला कच्चे तेल का आयात सस्ते परिवहन के कारण भी भारत के लिए फायदेमंद है। इतना ही नहीं, भारत के लिए ईरान से तेल खरीदना इसलिए भी मुनाफे का सौदा है कि ईरान भारत को भुगतान के लिए साठ दिन की मोहलत देता है, जबकि दूसरे देश सिर्फ तीस दिन का वक्त देते हैं। हालांकि कच्चे तेल के आयात के लिए ईरान की जगह नए देश तलाशना भारत के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है, लेकिन ईरान की तरह सुविधा शायद ही कोई देश दे। ऐसे में कच्चे तेल की नई आपूर्ति का सवाल और बढ़ती कीमतें देश के आम आदमी से लेकर संपूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का सबसे प्रमुख कारण हैं।

चूंकि भारत अपने तेल की कुल जरूरत का करीब बयासी फीसद आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है। अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपया 72 के स्तर को भी छू सकता है। ऐसे में महंगे कच्चे तेल के कारण पेट्रोल-डीजल के दाम तीन से चार रुपए प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं। साल 2018-19 में तेल आयात बिल बीस प्रतिशत बढ़ कर सौ अरब डॉलर से अधिक हो जाएगा, जो वित्त वर्ष 2017-18 के अट्ठासी अरब डॉलर से ज्यादा होगा। हाल ही में दुनिया के निवेश बैंकों- बैंक ऑफ अमेरिका, मेरिल लिंच, मार्गन स्टेनली और ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म-सीएलएसए- ने अपनी रिपोर्टों में कहा है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से भारत में महंगाई बढ़ेगी। इससे उपभोक्ताओं की परेशानियां और अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ेंगी। साथ ही, कच्चे तेल के तेजी से बढ़ते हुए आयात बिल के कारण देश में डॉलर की मांग बढ़ गई है और इस कारण विदेशी मुद्रा कोष में तेजी से गिरावट आ रही है। आठ जुलाई को देश के विदेशी मुद्रा कोष का स्तर चार सौ पांच अरब डॉलर रह गया है, जो एक महीने पहले चार सौ पच्चीस अरब डॉलर के स्तर पर था।

ऐसे में भारत को एक ओर तेल कीमतों पर उपयुक्त नियंत्रण और दूसरी ओर तेल के अन्य विकल्पों की रणनीति पर आगे बढ़ना होगा। सस्ते कच्चे तेल के मोल-भाव के लिए भारत ने जून के महीने में एक प्रभावी कदम उठाया है। दुनिया के तीन में से दो सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देश- चीन और भारत ने हाथ मिला कर तेल उत्पादक देशों पर कच्चे तेल की कीमत घटाने का दबाव बनाने के लिए साझा रणनीति बनाई है। चीन और भारत ने इस रणनीति के तहत सबसे पहले एशियाई तेल उत्पादक देशों द्वारा कच्चे तेल की बिक्री पर जो एशियाई प्रीमियम वसूला जाता है, उसे खत्म कराने के लिए ओपेक संगठन में जोरदार आवाज उठाई और इसका लाभ भी मिला। एशियाई देशों के लिए तेल आपूर्ति दुबई या ओमान के कच्चे तेल बाजारों से जुड़ी है।

ऐसे में कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षाकृत अधिक ली जाती हैं। कच्चे तेल की खरीद में यूरोप व उत्तरी अमेरिका के देशों की तुलना में एशियाई देशों को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है, जिसे एशियाई प्रीमियम नाम दिया गया है। एशियाई प्रीमियम अमेरिका या यूरोपीय देशों की तुलना में प्रति बैरल करीब छह डॉलर अधिक है। चीन और भारत दुनिया में बड़े तेल आयातक देश हैं। चीन द्वारा किया जाने वाला कच्चे तेल का सालाना उपभोग करीब एक करोड़ बीस लाख बैरल है और कुल वैश्विक खपत में उसकी हिस्सेदारी तेरह फीसद है। जबकि भारत में कच्चे तेल का सालाना उपभोग करीब चालीस लाख बैरल है, जो कुल वैश्विक खपत का करीब चार फीसद है।

इस तरह वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल का सत्रह फीसद उपभोग करने वाले चीन और भारत ने तेल उत्पादक देशों से कहा है कि वे तेल के बड़े खरीदार हैं, इसलिए उनसे कोई एशियाई प्रीमियम वसूल करने की बजाए उन्हें बड़ी मात्रा में तेल खरीद पर विशेष छूट दी जाए। यदि चीन और भारत अपने गठजोड़ का विस्तार करते हुए इसमें दो और बड़े तेल उपभोक्ता देशों- दक्षिण कोरिया और जापान को भी भागीदार बना लें तो ये दुनिया के चार बड़े तेल उपभोक्ता देश संगठित रूप से तेल उत्पादक देशों से अधिक मोलभाव कर सकेंगे। दो दिन पहले ही भारत ने ओपेक को साफ कह दिया है कि वह कच्चे तेल के दाम घटाए, वरना भारत तेल खरीदने के दूसरे विकल्पों पर विचार करेगा और ओपेक को इसका आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

देश को पेट्रोल और डीजल की महंगाई से बचाने के लिए ऊर्जा नीति को नए सिरे से तैयार करने की जरूरत है, ताकि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से होने वाली आर्थिक मुश्किलों को कम किया जा सके। अगले एक दशक में देश की ऊर्जा संबंधी मांग बहुत तेजी से बढ़ेगी। कच्चे तेल के आयात पर इसकी निर्भरता भी बढ़ेगी। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि सरकार एक एकीकृत ऊर्जा नीति तैयार करे। बिजली से चलने वाले वाहनों के निर्माण पर जोर हो, इसके लिए इलेक्ट्रिक कारों पर कर कम किया जाए। इसके साथ-साथ केंद्र व राज्य सरकारें सार्वजनिक परिवहन सुविधा को सरल और कारगर बनाएं। ऐसे रणनीतिक प्रयासों से देश की अर्थव्यवस्था कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के खतरों से निपट सकेगी।

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