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ऑनलाइन शिक्षण की चुनौतियां

कुछ बुनियादी बिंदुओं पर ध्यान दिया जाए तो आॅनलाइन शिक्षण की सफलता में कोई संदेह नहीं है। इसके लिए छात्रों और अभिभावकों को मानसिक रूप से तैयार कर ऐसा सुझाव देने की जरूरत है जिससे वे इस पद्धति का बेहतरीन उपयोग कर सकारात्मक परिणाम दे सकें।

सांकेतिक फोटो।

धर्मेंद्र प्रताप सिंह

आज विश्व के समक्ष गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है। महामारी के प्रभाव से शिक्षण संस्थान भी अछूते नहीं हैं। पिछले एक साल में शिक्षा संस्थानों में अध्ययन-अध्यापन का चक्र गड़बड़ा गया है। कक्षाओं की जगह आॅनलाइन कक्षाओं ने ले ली है। पढ़ाई और परीक्षा की व्यवस्था बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। आज अमेरिका जैसे ज्यादातर देश विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए संस्थानों को बंद कर आॅनलाइन शैक्षिक वातावरण को बचाने में लगे हैं।

भारत भी कोरोना की मार के बीच किसी न किसी रूप में स्थितियां सामान्य करने का प्रयास कर रहा है। हकीकत यह है कि कोरोना के खिलाफ जंग लंबी चलने वाली है। अब वह समय आ चुका है जब देश में आॅनलाइन शिक्षण के माध्यम से ही पढ़ाना वक्त की जरूरत बन गई है। आॅनलाइन शिक्षण में संस्था के मुखिया, शिक्षक, छात्र, इन सभी को जोड़ने वाली तकनीक और उसके विशेषज्ञ महत्त्वपूर्ण होते हैं। यह प्रक्रिया संस्था प्रमुख से शुरू होकर छात्र तक पहुंचती है।

स्मार्टफोन आॅनलाइन शिक्षण प्रणाली के सशक्त माध्यम के रूप में उभरे हैं, जिसमें तरह-तरह की नई तकनीकी सुविधाएं हैं। यह शिक्षण का सकारात्मक पहलू है। लेकिन इसमें भी चुनौतियां कम नहीं हैं जो हिंदी के साथ सभी भारतीय भाषाओं पर लागू होती हैं। सबसे बड़ी चुनौती अनुप्रयोग (एप्लीकेशन) और साफ्टवेयर की एकरूपता का है। जब कार्य योजना एक से दूसरे अनुप्रयोग, एक साफ्टवेयर से दूसरे साफ्टवेयर और एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर पर पहुंचती है तो उसका रूप पूरी तरह बदल जाता है।

आॅनलाइन शिक्षण में भारत के समक्ष चुनौतियां कम नहीं हैं। देश नेटवर्किंग और इंटरनेट की रफ्तार के मामले में दुनिया से काफी पीछे है। अधिकांश गरीब छात्र लैपटाप या कंप्यूटर से वंचित हैं। ये छात्र मोबाइल का प्रयोग जरूर कर रहे हैं, लेकिन उस मोबाइल पर जिस लिपि का उपयोग करते हैं, वह रोमन होती है और यह भारतीय भाषाओं की शिक्षण पद्धति के लिए आसान नहीं है। नीति निमार्ता और संस्था प्रमुख अंग्रेजी मानसिकता के साथ पूरी की पूरी शैक्षिक नीतियां आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं। उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि इस देश में अंग्रेजी जानने वाले मात्र दो फीसदी हैं और विज्ञान, मेडिकल की पढ़ाई के साथ ही मानविकी के छात्रों की संख्या भी कम नहीं है।

अभी तक संस्थाएं आॅनलाइन शिक्षण की बात कर रही हैं। लेकिन इनके माध्यमों पर वे एकमत नहीं हैं। थोड़ा पीछे जाकर सदी की शुरूआत में देखें तो भारतीय भाषाओं में टाइपिंग बहुत ही दुष्कर कार्य माना जाता था। इसे सीखने के लिए जगह-जगह पर कोचिंग संस्थान खुले हुए थे। उस समय किसी ने यह नहीं सोचा था कि आने वाले समय में बोल कर टाइप करने (वॉइस टाइपिंग) की सुविधा भी विकसित हो जाएगी। आज जो साफ्टवेयर तैयार हो रहे हैं, उनमें भारतीय भाषाओं को बहुत सीमित जगह मिल रही है। उपयोगकर्ता को इसके बारे में जानकारी न होना और चुनौतीपूर्ण है।

बाजार ने इतने विकल्प दे दिए हैं कि उपयोगकर्ता किसे अधिक समय तक इस्तेमाल करे, यह तय करना बहुत कठिन है। ऐसा कदापि नहीं कि छात्र तकनीक का उपयोग नहीं कर रहें हैं, लेकिन प्रयोगकतार्ओं में एकरूपता की कमी और सकारात्मक रूप में उपयोग करने वालों की संख्या सीमित है। इसमें छात्रों को पूरी तरह दोष देना गलत है, क्योंकि छात्र को सही तरीके से समझाने और इन स्थितियों से सावधान करने का प्रयास किया गया होता तो आज स्थितियां भिन्न होतीं। आज एकाएक उन्हें आॅनलाइन शिक्षण की ओर ले जाना एक श्रमसाध्य और चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बाजार के रास्ते छात्रों तक जो तकनीक पहुंचेगी, उसका यही हश्र होगा।

जब भी छात्रों से आॅनलाइन माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया जाता है तो उसमें मुख्यत: दो तरह की चुनौतियां आती हैं। प्रथम, उपयोक्ता को तकनीक के बारे में जानकारी नहीं होती या उनके पास संसाधन के रूप में कंप्यूटर, लैपटाप, मोबाइल आदि नहीं हैं जिनके जरिए उनसे संपर्क बनाया जा सके। दूसरी, चुनौती काम करने के बाद तब आती है जब छात्रों द्वारा किया गया कार्य तकनीकी परिवर्तन की वजह से सही प्रारूप में नहीं पहुंच पाता। ऐसे में हमें प्रशिक्षित तकनीक विशेषज्ञों की जरूरत महसूस होती है, जो न तो छात्र के लिए उपलब्ध होते हैं और न ही शिक्षक के लिए। अक्सर देखा गया है कि ऐसे विशेषज्ञ उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों के लिए ही उपलब्ध होते हैं। यदि ये विशेषज्ञ शिक्षक और छात्रों तक पहुंचते भी हैं तो उसमें इतना समय लग जाता है कि समस्याएं पीछे छूट चुकी होती हैं।

आॅनलाइन शिक्षण के अंतर्गत वीडियो कांफ्रेसिंग के लिए आज गूगल क्लास रूम, गूगल मीट, क्लाउड, जूम ऐप आदि बहुत सारे तरीके हमारे समक्ष मौजूद हैं। इस शिक्षण में चुनौती यह है कि भारत में आज भी आधी आबादी इंटरनेट का उपयोग नहीं करती है। जबकि अन्य देशों के मुकाबले हमारे यहां इंटरनेट काफी सस्ता है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन आफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सिर्फ छत्तीस फीसदी लोग ही इंटरनेट उपयोग कर रहे हैं। इसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता तीव्र गति वाले इंटरनेट की है। जब भी गति संबंधी समस्या आई तो हमें टू जी से थ्री जी, थ्री जी से फोर जी का विकल्प दे दिया गया। लेकिन मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं हो सका। अब हम फाइव जी यानी पांचवीं पीढ़ी के इंटरनेट की ओर बढ़ रहे हैं, पर गति संबंधी समस्या दूर नहीं हो रही है।

आज संकटकाल में आॅनलाइन शिक्षण शिक्षा के बड़े माध्यम के रूप में सामने है। लेकिन शिक्षक और छात्र दोनों ही इससे कतरा रहे हैं। इसका कारण यह है कि मूलभूत समस्या को समझने और दूर करने का कभी प्रयास ही नहीं किया गया, बल्कि समाधान के रूप में उन्हें बाजार के हवाले कर दिया गया, जहां छात्र और शिक्षक का सदैव एक ग्राहक की तरह ही इस्तेमाल किया गया। यहां उच्च अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे छात्र और शिक्षक के साथ बैठ कर समस्या का हल निकालें, न कि तकनीक विशेषज्ञों के साथ। ये विशेषज्ञ सहायक के रूप में प्रयोग होने चाहिए जो छात्र और शिक्षक की समस्याओं को समझ कर उनके लिए काम कर सकें। आॅनलाइन शिक्षण की कड़ी में यदि छात्र और शिक्षक को नजरअंदाज किया गया तो यह कभी भी सफल नहीं होगी।

कुछ बुनियादी बिंदुओं पर ध्यान दिया जाए तो आॅनलाइन शिक्षण की सफलता में कोई संदेह नहीं है। इसके लिए छात्रों और अभिभावकों को मानसिक रूप से तैयार कर ऐसा सुझाव देने की जरूरत है जिससे वे इस पद्धति का बेहतरीन उपयोग कर सकारात्मक परिणाम दे सकें। शिक्षण पद्धति में एक नियत तकनीक प्रयोग लंबे समय तक तय किया जाए, जब तक कि उसमें परिवर्तन की जरूरत न महसूस हो। तभी छात्र उसके साथ सहज हो सकेंगे। केवल नएपन और बदलाव के लिए इसे नहीं अपनाया जाना चाहिए।

भारत में छात्रों को जो समस्याएं आ रही हैं, उसके विकल्प के रूप में समाधान न खोज कर उसकी पहचान कर उसमें सुधार किया जाए और प्रयोक्ताओं को इसके बारे में सही जानकारी दी जाए। यह ध्यातव्य है कि एक शिक्षक और छात्र के लिए तकनीक काम करने का तरीका मात्र है। उस तकनीक के साथ छात्र कभी भी सहज नहीं हो सकता जो दिनोंदिन बदल रही है। तकनीक छात्रों के सहायक के रूप में अपनाई जानी चाहिए, वरना छात्र इससे दूर भागते नजर आएंगे। दूसरी बड़ी जरूरत तकनीक को भारतीय भाषाओं के साथ सहज बनाने का प्रयास करने की है। इसके लिए सरकार और शैक्षिक संस्थाओं के प्रमुखों को आगे आकर छात्रों के लिए सुविधाजनक उपाय खोजना होगा।

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