ताज़ा खबर
 

राजनीति: बचाना होगा छोटी नदियों को

नदियों का संकट में होना आमजन के लिए भी संकट का कारण बन सकता है। सन 1951 में हमारे यहां प्रतिव्यक्ति चौदह हजार एक सौ अस्सी लीटर पानी सहजता से उपलब्ध था। लेकिन अनुमान है कि सन 2050 तक पानी की उपलब्धता तीन हजार एक सौ बीस लीटर प्रतिव्यक्ति ही रह जाएगी। यह स्थिति डराती है।

छोटती नदियों पर संकट का निदान उसके संरक्षण में है।

आमतौर पर गर्मी ऋतु में देश के कई हिस्सों से इस आशय की खबरें आती हैं कि छोटी नदियां सूख गईं या कुछ बड़ी नदियों में पानी की मात्रा बहुत कम हो गई। लेकिन दक्षिण पूर्वी राजस्थान के कोटा जिले के सांगोद क्षेत्र में बहने वाली उजाड़ नदी इस वर्ष नवंबर महीने में ही सूख गई। उजाड़ चंबल की सहायक नदी है और अंचल के बहुत सारे गांवों के लिए जीवनरेखा है। आमतौर पर उजाड़ नदी में इतना पानी रहता था कि उससे जुड़े गांवों में आवागमन सुनिश्चित करने के लिए पचपन मीटर लंबा पुल बनाया गया है। लेकिन अपने जल से इलाके को विकास का वरदान सौंपने वाली यह नदी समाज की अपने प्रति असंवेदनशीलता के कारण अब अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए छटपटाती-सी प्रतीत होती है।

दरअसल, अपने प्रति संवेदनहीनता का दंश झेल रही उजाड़ नदी देश की अकेली नदी नहीं है। देश में ऐसी सैकड़ों सहायक नदियां होंगी जो इस तरह असमय सूख कर दम तोड़ रही हैं और मनुष्य के लिए जल संकट के खतरे की घंटी बजा रही हैं। लेकिन लगता है हम इस खतरे को अभी भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। गंगा को तो हमारी मान्यताओं में बहुत पवित्र माना जाता है। सनातन मान्यताओं के अनुसार व्यक्ति को अंतिम समय यदि गंगाजल की दो बूंदों का भी आचमन मिल जाए तो सांसारिक बंधनों से उसकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। लेकिन देवी माने जाने वाली गंगा नदी स्वयं अब प्रदूषण के दुर्दांत प्रतीत होते असुर से संघर्ष करने पर विवश है।

पिछले दिनों यमुना में प्रदूषण के कारण उठे झागों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब चलीं। सदा सलिला कही जाने वाली चंबल नदी के पानी को भी एक परीक्षण में कई स्थानों पर पीने योग्य नहीं पाया गया है। कावेरी नदी चालीस प्रतिशत से अधिक अपना जलप्रवाह खो चुकी है, तो कृष्णा और गोदावरी नदी में पानी की मात्रा दो दशक पहले की तुलना में बहुत कम हो गई है। जब देश की महनीय नदियों का यह हाल है तो छोटी नदियों और बरसाती नदियों की स्थिति का अनुमान तो आसानी से लगाया जा सकता है।

यह स्थिति इसलिए चिंता पैदा करती है क्योंकि हमारी पानी की जरूरत का पैंसठ प्रतिशत से अधिक हिस्सा नदियां ही पूरा करती हैं। पानी केवल पीने या रोमजर्रा की जरूरतों को पूरा करने या सिंचाई के काम ही नहीं आता, अपितु औद्योगिक उत्पादन में कच्चे माल के परिशोधन सहित अनेक क्रियाओं में पानी ही जरूरी होता है। ऐसे में जिन देशों को प्रकृति ने नदियों का वरदान दिया है, उन्हें नदियों के अस्तित्व के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत थी। लेकिन दुर्भाग्य से विकास की आपाधापी ने नदियों के प्रति हमारी संवेदनशीलता को छीन लिया। हमने नदियों को बचाने और संरक्षित रखने के बजाय के उनके प्रवाह क्षेत्र में ही बस्तियां बनानी शुरू दीं।

यह तो समझ आता है कि नदियों के प्रवाह पर बांध बनाना जीवन की जरूरत था, लेकिन नदियों के किनारों पर अतिक्रमिण कर लेना या उनमें मनमाने तरीके से गंदगी प्रवाहित करना कैसे उचित कहा जा सकता है? स्थिति यह हो गई कि हम नदियों को देवी मान कर पूजते तो रहे, लेकिन उनकी पवित्रता से खिलवाड़ भी करते रहे। लेकिन ऐसा नहीं है कि नदियों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार भारत में ही हुआ। अपने सीमित संसाधनों से आकाश की अथाह ऊंचाई नापने की आपाधापी में कई विकासशील देशों ने नदियों की महत्ता को नजरअंदाज किया है। ब्राजील के रियो-दे जेनेरियो की सारापुई या सुपुई नदी कचरे से इस कदर भर गई है कि उस पर पैदल चला जा सकता है।

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सभी सोलह प्रखंडों से कोई न कोई नदी गुजरती है। लेकिन इन नदियों में से अधिकांश अपनी दुर्दशा पर आंखें बहा रहीं हैं। नदियों की अत्यधिक संख्या के कारण मिथिला को तो नदियों का मायका तक कह दिया जाता है। लेकिन इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि नदियां अपने मायके में ही दुख के साथ बह रही हैं। बिहार की बूढ़ी गंडक, लखनदेई, टिमदा, झझा, सियारी, कदाने, बाया, डंडा, मनुषमारा जैसी नदियां या तो दम तोड़ चुकी हैं या दम तोड़ने के कगार पर हैं। झारखंड में पिछली गर्मियों में एक सौ तैंतीस नदियों के सूखने की खबरें आई थीं। पलामू जिले की ही कोयल, सदाबह, अमानत नदियां अस्तित्व के लिए जूझती दिखीं।

गुमला जिले में नदी के प्रवाह क्षेत्र में बच्चे क्रिकेट खेलते हुए दिखे। किसी नदी के सिकुड़ने या सूखने का दर्द क्या होता है, यह उन इलाकों में जाकर जानना चाहिए जिन इलाकों ने इस स्थिति का सामना किया है। राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके से बेहतर किसी नदी के महत्त्व को कहां समझा जा सकता है? कहते हैं कि पौराणिक नदी सरस्वती का प्रवाह इसी क्षेत्र में था। शोधकर्ताओं के अनुसार करीब डेढ़ सौ साल पहले भी राजस्थान के इस इलाके के प्रमुख शहर बीकानेर के पास नाल गांव में एक नदी बहती थी, लेकिन धीरे-धीरे वह लुप्त हो गई।

जर्मनी के द मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर द साइंस आफ ह्यूमन हिस्ट्री, तमिलनाडु के अन्ना विश्वविद्यालय और कोलकाता के भारतीय विज्ञान शिक्षा और शोध संस्थान (आइआइएसईआर) जैसे संस्थानों से जुड़े विद्वानों ने यह शोध किया था। इससे कुछ ही दूर स्थित सीकर जिले की साइवार की पहाड़ियों से निकलने वाली साहबी नदी की तो सौ से अधिक उपनदियां थीं। इस नदी के प्रवाह का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पर मासनी बांध बनाया गया। लेकिन यह नदी भी अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। कुछ विद्वानों ने पौराणिक दृष्दावती नदी के रूप में इसे पहचाना है। सोता, कृष्णावती, दोहन आदि इस नदी की उपनदियां थीं।

एक नदी के रूठने के डर से दन दिनों दक्षिण अमेरिकी देश पैराग्वे भी गुजर रहा है। यहां की राजधानी असुनशियोन के पास से गुजरने वाली नदी पराग्वे ही इस देश को समुद्र से जोड़ने वाला एकमात्र विकल्प थी। इस देश के लिए पराग्वे नदी के महत्त्व का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसी नदी के नाम पर देश का नाम भी रखा गया। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी- नासा द्वारा पिछले दिनों जारी एक तस्वीर में यह दिखाया गया है कि कैसे राजधानी असुनशियोन के आसपास नदी का इलाका सूख गया है।

पराग्वे के लोक निर्माण विभाग के निदेशक जॉर्ज वेगार्रा ने पिछले दिनों कहा भी कि ‘नदी सूखने का असर सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, क्योंकि पराग्वे का बावन फीसद आयात और लगभग पचहत्तर प्रतिशत निर्यात नदी के रास्ते से ही होता है।’ नदी के सूखने ने दूरस्थ इलाकों की बस्तियों में पेयजल आपूर्ति को भी प्रभावित किया है।

नदियां मानव सभ्यता की उन्नायक रही हैं। प्राय: सभी प्राचीन सभ्यताओं का विकास किसी नदी घाटी में हुआ है। लेकिन अब नदियां संकट में हैं। नदियों का संकट में होना आमजन के लिए भी संकट का कारण बन सकता है। सन 1951 में हमारे यहां प्रतिव्यक्ति चौदह हजार एक सौ अस्सी लीटर पानी सहजता से उपलब्ध था। लेकिन अनुमान है कि सन 2050 तक पानी की उपलब्धता तीन हजार एक सौ बीस लीटर प्रतिव्यक्ति ही रह जाएगी। यह स्थिति डराती है। देश में जहां छोटी नदियों के प्रवाह क्षेत्र अतिक्रमण के शिकार हो गए हैं, वहीं दो सौ पैंसठ मझोली नदियां संकट में हैं। बड़ी नदियां भी प्रदूषण का शिकार हो रही हैं। ऐसे में समय की सबसे बड़ी जरूरत है कि हम नदियों के प्रति संवेदनशील हों, अन्यथा समूची सभ्यता के लिए आने वाले दिन सचमुच बहुत कठिन होंगे।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजनीति: प्रगति के लिए जरूरी है चुनाव सुधार
2 राजनीति: भविष्य की चुनौतियां और शिक्षा
3 राजनीति: संकट में घिरे इमरान
ये पढ़ा क्या?
X