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राजनीति: बुनियादी तालीम से नई शिक्षा नीति तक

नई तालीम की संकल्पना और संरचना भारत की ज्ञान अर्जन की उस परंपरा पर आधारित थी, जिसकी जड़ें गहराई तक भारत की मिट्टी में गड़ी हुई थीं। अगर स्वतंत्रता के समय से संविधान निर्माण तक इसे अपेक्षित परिप्रेक्ष्य में समझा गया होता, तो बुनियादी तालीम से मुंह नहीं मोड़ा गया होता।

बुनियादी शिक्षा में केवल किताबी ज्ञान न मिले, बल्कि हमें अच्छी जिंदगी जीना भी सिखाए।

इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रों की प्रगति, विकास और साख का मूल आधार उनकी ज्ञान संपदा ही होगी। यह आधार जितना सशक्त, समेकित, सजग तथा परिवर्तनों के प्रति सतर्क और गतिशील होगा, राष्ट्र की प्रगति में नागरिकों की भागीदारी भी उतनी ही विस्तृत और सर्वव्यापी होगी। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए भारत में पहली आवश्यकता हर व्यक्ति तक अच्छी गुणवत्ता तथा उपयोगी कौशलों की ग्राह्यता से परिपूर्ण शिक्षा पहुंचाने की होगी। इस स्थिति में अभी आई नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 नई सकारात्मक संभावनाओं को देश और व्यवस्था के समक्ष प्रस्तुत करती है।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के समय महात्मा गांधी ने शिक्षा पर विशेष जोर दिया था। स्वतंत्रता के बाद जो स्थिति बनी है, और जो समस्याएं उभरी हैं, उनका समाधान निकालने के लिए गांधीजी द्वारा 1937 में प्रस्तावित बुनियादी तालीम के तत्त्वों को समझ कर ही नई शिक्षा नीति में प्रस्तावित शैक्षिक सुधारों की संभावनाओं को व्यावहारिक रूप दिया जा सकेगा। भारत में शिक्षा व्यवस्था में जब भी परिवर्तन और सुधारों पर चर्चा होती है, महात्मा गांधी के शिक्षा संबंधी प्रयोगों, उनके द्वारा प्रतिपादित शिक्षा दर्शन और नई तालीम का संदर्भ किसी न किसी रूप में उपस्थित हो ही जाता है।

गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका के अपने आश्रमों से लेकर भारत में स्थापित अपने प्रत्येक आश्रम में शिक्षा देने की व्यवस्था की, स्वयं भागीदारी की, और लगभग चार दशक के अपने प्रयोगों के अनुभवों के आधार पर भारत के लिए जो शिक्षा व्यवस्था प्रतिपादित की वह बेसिक शिक्षा, नई तालीम या बुनियादी तालीम के नाम से जानी गई। अंग्रेजों द्वारा प्रत्यारोपित शिक्षा के बारे में गांधीजी ने ‘हिंद स्वराज’ में खुल कर लिखा कि जो शिक्षा दी जा रही है उससे ‘हम मनुष्य नहीं बनते- उससे हम अपना कर्तव्य नहीं जान सकते।’ शिक्षित व्यक्ति की संकल्पना को ‘हिंद स्वराज’ में गांधीजी डॉ. हक्सले के एक उद्धरण से व्यक्त करते हैं: ‘उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके शरीर को ऐसी आदत डाली गई है कि वह उसके वश में रहता है, जिसका शरीर चैन से और आसानी से सौंपा हुआ काम करता है। उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसकी बुद्धि शुद्ध, शांत और न्यायदर्शी है। उसने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसका मन कुदरती कानूनों से भरा है और जिसकी इंद्रियां उसके बस में हैं, जिसके मन में भावनाएं बिलकुल शुद्ध हैं, जिसे नीच कामों से नफरत है और जो दूसरों को अपने जैसा मानता है। ऐसा आदमी ही सच्चा शिक्षित (तालीमशुदा) माना जाएगा, क्योंकि वह कुदरत के कानून के मुताबिक चलता है। कुदरत उसका अच्छा उपयोग करेगी और वह कुदरत का अच्छा उपयोग करेगा।’

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के आधार सिद्धांत का वर्णन यों प्रारंभ होता है: ‘शैक्षिक प्रणाली का मुख्य उद्देश्य अच्छे इंसान का विकास करना है- जो तर्कसंगत विचार और कार्य करने में सक्षम हो, जिसमें करुणा और सहानुभूति, साहस और लचीलापन, वैज्ञानिक चिंतन और रचनात्मक कल्पनाशक्ति, नैतिक मूल्य और आधार हों। इसका उद्देश्य ऐसे उत्पादक लोगों को तैयार करना है, जो कि अपने संविधान द्वारा परिकल्पित- समावेशी, और बहुलतावादी समाज के निर्माण में बेहतर तरीके से योगदान करे।’ इसमें आगे यह भी कहा गया है कि ‘हर बच्चे की विशिष्ट क्षमताओं की स्वीकृति, पहचान और उनके विकास हेतु प्रयास करना’ होगा, और इसके लिए शिक्षकों और अभिभावकों को तैयार किया जाएगा। इस तत्त्व को नई शिक्षा नीति में समाहित किया गया है, आज की भाषा- मुहावरे- में वर्णित किया गया है।
विनोबा भावे नई तालीम को ‘नित्य नए समाज की रचना करने वाली तालीम’ कहते थे।

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में जब हर तरफ शैक्षिक परिवर्तनों की चर्चा हो रही है, यह विचार कितना भविष्य-दृष्टिपूर्ण माना जाएगा! वे नई तालीम देने के लिए उन्हें ही समर्थ मानते थे, जिनकी शुद्धि हो चुकी हो, जिनका विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने का विस्तृत अनुभव हो, और वे उसका समुचित उपयोग करने को उत्सुक हों। नई शिक्षा नीति में लगभग हर स्तर पर और हर तरफ स्थानीय उत्पादकता की ओर सभी का ध्यान जा रहा है, कौशल विकास को प्रारंभ से ही लाने का विचार स्वीकृत हो रहा है, संपूर्ण व्यक्तित्व विकास को नीति में प्रमुखता से स्थान दिया जा रहा है; सभी को समान अवसर देने का वचन दिया जा रहा है।

अगर गहराई से समझा जाए तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि नई तालीम की संकल्पना अपने में कितनी संपूर्णता और गतिशीलता संजोए हुए थी, वह सदा के लिए तकली पर अटक जाने के लिए ही प्रतिपादित नहीं की गई थी। इसमें ‘सबके लिए’ सबसे महत्त्वपूर्ण दिशा-निर्देश है। पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति या बच्चे के लिए अब भी बराबरी की शिक्षा और व्यवस्था उससे दूर ही है। यह नई शिक्षा नीति के समक्ष संभवत: उससे भी बड़ी चुनौती है, जितना बड़ा इसे गांधीजी ने अपने समय में देखा और समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया था।

नई तालीम की संकल्पना और संरचना भारत की ज्ञान अर्जन की उस परंपरा पर आधारित थी, जिसकी जड़ें गहराई तक भारत की मिट्टी में गड़ी हुई थीं। अगर स्वतंत्रता के समय से संविधान निर्माण तक इसे अपेक्षित परिप्रेक्ष्य में समझा गया होता, तो बुनियादी तालीम से मुंह नहीं मोड़ा गया होता। हर युवक को इससे परिचित अवश्य होना चाहिए कि गोपाल कृष्ण गोखले ने 1915 में मोहनदास करमचंद गांधी को भारत में अपना काम शुरू करने से पहले एक वर्ष भारत को समझने में समय लगाने को कहा था, और गांधी ने उसका अक्षरश: पालन किया। उन्होंने भारत के लोगों की आवश्यकताओं, इच्छाओं, अपेक्षाओं को समझा, उनकी कमजोरियों, अज्ञानता, निराशा, मनोबल की क्षीणता को जाना। अध्यात्म और मानवीय मूल्यों के अंतर्निहित तत्त्वों को पहचाना। भारत में विविधता की स्वीकार्यता के महत्त्व को समझा। नई तालीम के लिए उन्होंने कहा था कि ‘हमारी शिक्षा पद्धति बुद्धि, शरीर और आत्मा, तीनों का विकास करती है।’ इसकी तुलना में सामान्य शिक्षा पद्धति केवल बुद्धि की ओर ध्यान देती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इसे स्वीकार गया है। परीक्षा पद्धति बदली जा रही है। मूल्यांकन पद्धति अब अर्जित ज्ञान के उपयोग पर ध्यान देगी, न कि जो केवल याद किए गए को परीक्षा में दोहराने को कहेगी। कौशल सीखना, स्वयं उत्पादकता में भागीदारी करना, संभावनाओं को खंगालना भी आगे महत्त्व पाएंगे। मूल्यों, संस्कारों और चरित्र निर्माण पर ध्यान दिया जाएगा और बच्चे तथा युवा जब इसे आत्मसात कर लेंगे, तब स्वयं वे जीवन के बड़े और गहरे लक्ष्य से अपने को दूर नहीं रख पाएंगे।

गांधीजी शुरू से शिक्षा में मातृभाषा माध्यम को हर कीमत पर लाने के पक्षधर रहे। मातृभाषा माध्यम के महत्त्व को इक्कीसवीं सदी में नई नीति के अंतर्गत स्वीकार और आग्रहपूर्वक प्रस्तुत किया गया है। इसके क्रियान्वयन में अनेक जटिल प्रश्न जानबूझ कर उछाले जाते हैं, कष्ट तो मासूम बच्चों को ही होता है। अपेक्षा करनी चाहिए कि माता-पिता मातृभाषा माध्यम की मानसिक और संवेदनात्मक आवश्यकता को समझेंगे, और सरकारें यह तय करेंगी कि किसी भी युवा को किसी भी प्रतिस्पर्धा में अंग्रेजी भाषा के कारण कोई हानि नहीं होगी। भारत में करोड़ों बच्चों को अंग्रेजी माध्यम थोपने के कारण स्नायविक ऊर्जा पर जबर्दस्त दबाव झेलना पड़ता है। उन विकसित देशों से प्रेरणा लेनी ही होगी, जो ज्ञान के हर क्षेत्र में; और वैज्ञानिक प्रगति के चरम पर पहुंचे हैं, मगर जहां शिक्षा का माध्यम मातृभाषा से ही प्रारंभ होता है। नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में सार्थकता लाने और गतिशीलता बनाए रखने के लिए बुनियादी तलीम के तत्त्व अत्यंत सहायक हो सकते हैं।

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