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राजनीति: सुशासन और सर्वोदय

सुशासन लोक विकास की कुंजी है जो शासन को अधिक खुला और संवेदनशील बनाता है। ऐसा इसलिए है ताकि सामाजिक-आर्थिक उन्नयन में सरकारें खुली किताब की तरह रहें और देश की जनता को दिल खोल कर विकास दें। मानवाधिकार, सहभागी विकास और लोकतंत्रीकरण के साथ सर्वोदय व सशक्तिकरण का महत्त्व सुशासन की सीमा में ही है।

Author Updated: January 14, 2021 5:29 AM
infrastructureसांकेतिक फोटो।

सुशील कुमार सिंह

सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में ब्रिटेन, आॅस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने नवीन लोक प्रबंधन की सैद्धांतिक आधारशिला इस उद्देश्य से रखी थी ताकि पुराने स्वरूप से विकास करने वाले शासन को नया रूप दिया जा सके। इसका उद्देश्य ऐसी सरकार और प्रशासन तैयार करना था जो अपनी भूमिका ‘नाव खेने’ की जगह ‘स्टीयरिंग’ संभालने के रूप में बदल ले। जब सड़क खराब हो तो ब्रेक गति पर नियंत्रण रखते हैं और जब सब कुछ अनुकूल हो तो यात्रा सुगम हो जाती है। जाहिर है, ऐसी शासन पद्धति में लोक कल्याण की भावना में बढ़त और लोक सशक्तिकरण के आयामों में उभार को बढ़ावा मिलता है।

इस बात का सभी समर्थन करेंगे कि इक्कीसवीं सदी के इस इक्कीसवें साल पर तुलनात्मक विकास का दबाव अधिक है, क्योंकि इसके पहले का वर्ष महामारी के चलते उस आईने की तरह चटक गया है जिसमें सूरत बिखरी-बिखरी दिख रही है। यदि इसे एक खूबसूरत तस्वीर में तब्दील किया जाए तो ऐसा सर्वोदय और सशक्तिकरण के चलते ही संभव होगा, जिसकी बाट बड़ी उम्मीद से जनता जोह रही है।

तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य की चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को नया रूप लेना जरूरी है। न्यू इंडिया की अवधारणा इस दौर की सबसे बड़ी जरूरत है। भूमंडलीय अर्थव्यवस्था में हो रहे अनवरत परिवर्तनों को देखते हुए न केवल दक्ष श्रमशक्ति, बल्कि स्मार्ट सिटी और स्मार्ट गांवों की ओर भी कदमताल तेजी से करना होगा। यह दौर मौद्रिक और वित्तीय कदम उठाने के मामले में और समस्याओं से बंध चुके लोगों को बहाल करने का भी है। ऐसे में सर्वोदय इसकी प्राथमिकता है और यह सुशासन पर पूरी तरह टिका है।

सर्वोदय सौ साल पहले गांधी दर्शन से उपजा शब्द है, मगर इसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है। सर्वोदय एक ऐसा विचार है जिसमें सभी के हितों की भारतीय संकल्पना के अलावा सुकरात की सत्य साधना और रस्किन के अंत्योदय की अवधारणा मिश्रित है। सर्वोदय सर्व और उदय के योग से बना शब्द है जिसका संदर्भ सबका उदय और सब प्रकार के उदय से है। यह सर्वांगीण विकास को परिभाषित करने से ओतप्रोत है।

आत्मनिर्भर भारत की चाह रखने वाले शासन और नागरिकों दोनों के लिए यह एक अंतिम सत्य भी है। समसमायिक विकास की दृष्टि से देखें तो समावेशी विकास के लिए सुशासन एक कुंजी है, लेकिन सर्वज्ञ विकास की दृष्टि से सर्वोदय एक आधारभूत संकल्पना है। बेशक देश की सत्ता पुराने डिजाइन से बाहर निकल गई है, पर कई चुनौतियों के चलते समस्या समाधान में अभी बात अधूरी है।

सुशासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है जो लोक कल्याण को बढ़ावा देती है और जिसमें नागरिक सशक्तिकरण उन्मुख होता है। बीते वर्ष कोरोना महामारी के कारण भारत की अर्थव्यवस्था बेपटरी हो गई। लेकिन अब सकारात्मक संकेत आने लगे हैं। हालांकि बेरोजगारी, बीमारी, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा जैसी तमाम बुनियादी समस्याएं अभी भी कायम हैं। गरीबी और भुखमरी की ताजी सूरत भी स्याह दिखाई देती है।

वैश्विक भुखमरी सूचकांक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि हम भुखमरी के संकट से निजात नहीं पा सके हैं। पिछले साल की रिपोर्ट में एक सौ सात देशों में भारत चौरानवे वें पायदान पर रहा, जबकि 2014 में पचपनवें पायदान पर था। पांच साल में हालात का इतना बिगड़ना चिंता और सवाल खड़े करता है।
 
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 15 मार्च 1950 को योजना आयोग का गठन, फिर पहली पंचवर्षीय योजना का कृषि प्रधान होना और सात दशकों के भीतर ऐसी बारह योजनाओं को देखा जा सकता है जिनमें गरीबी उन्मूलन से लेकर समावेशी विकास तक की भी पंचवर्षीय योजनाएं शामिल हैं। बावजूद इसके देश में हर चौथा व्यक्ति अशिक्षित और इतने ही गरीबी रेखा के नीचे हैं।

अगले साल तक किसानों की आमदनी भी दोगुनी करने की बात है और दो करोड़ से अधिक घर भी साल 2022 के भीतर ही दिए जाने हैं। बुनियादी विकास की चुनौतियों और शहरी व ग्रामीण विकास की अवधारणा के अलावा कई तकनीकी विकास से भी देश को ओतप्रोत होना है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है कि कृषि और कृषि प्रसंस्करण आधारित गतिविधियों और उद्योगों को मजबूती देना, साथ ही किसान हितैषी योजनाओं को भी सुधारों और वित्तीय प्रोत्साहन की जरूरत है।

सबसे बड़ी बात सरकार और किसान के बीच एक विकासात्मक सुलह को हासिल करना है, ताकि सर्वोदय की शुचिता को खतरा न हो। यह नहीं भूलना चाहिए कि जब अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्र धराशायी हो रहे थे, तब कृषि ही एक ऐसा क्षेत्र था जिसने अपनी विकास दर को 3.7 फीसद से ऊपर रखते हुए देश को अन्न से भर दिया। संकटकाल के दौरान अन्नदाताओं की प्रासंगिकता और खेत-खलिहानों की उपयोगिता कहीं अधिक समझ में आई। जाहिर है अपने हिस्से के विकास की बाट तो खेत-खलिहान भी जोह रहे हैं।

सुशासन लोक विकास की कुंजी है जो शासन को अधिक खुला और संवेदनशील बनाता है। ऐसा इसलिए है ताकि सामाजिक-आर्थिक उन्नयन में सरकारें खुली किताब की तरह रहें और देश की जनता को दिल खोल कर विकास दें। मानवाधिकार, सहभागी विकास और लोकतंत्रीकरण के साथ सर्वोदय व सशक्तिकरण का महत्त्व सुशासन की सीमा में ही है। सुशासन के लिए महत्त्वपूर्ण कदम सरकार की प्रक्रियाओं को सरल बनाना भी होता है और ऐसा तभी संभव है जब पूरी प्रणाली पारदर्शी और ईमानदार हो। कानून ने विवेकपूर्ण और तर्कसंगत सामाजिक नियमों और मूल्यों के आधार पर समाज में एकजुटता की स्थापना की है और शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा हो जो कानून से अछूता हो।

वर्तमान दौर कठिनाइयों का तो है, पर बुनियादी विकास ऐसे तथ्यों और तर्कों से परे होते हैं। देश में नौकरियों के नब्बे फीसद से ज्यादा अवसर सूक्ष्म, छोटे और मझोले उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र मुहैया कराता है। इस क्षेत्र की अहमियत को देखते हुए सरकार ने कई कदमों की घोषणा पहले के बजट में भी की है। वैश्विक महामारी के कारण बाजार में घटी हुई मांग के सदमे से उबरने का दबाव एमएसएमई क्षेत्र पर भी साफ देखा जा सकता है।

यह क्षेत्र जितनी शीघ्रता से पटरी पर लौटेगा, उतनी ही तेजी से देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार की स्थिति बेहतर होगी। गौरतलब है कि सरकार देश को पचास खरब डालर की अर्थव्यवस्था बनाने के ऊंचे लक्ष्य को हासिल करने के उद्देश्य से समावेशी विकास और रोजगार सृजन के लिए समर्पित है। जाहिर है, यह आसान काम नहीं है। इसके लिए उद्यमिता को बढ़ावा और तकनीक में नवाचार जरूरी होगा।

सामाजिक-आर्थिक प्रगति को सर्वोदय का प्रतीक कहा जा सकता है। इसी के भीतर समावेशी विकास को भी देखा और परखा जा सकता है। मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और स्टैंडअप इंडिया जैसी योजनाएं भी एक नई सूरत की तलाश में है। जिस तरह अर्थव्यवस्था और व्यवस्था को चोट पहुंची है, उसकी भरपाई आने वाले दिनों में तभी संभव है जब अर्थव्यवस्था नए स्वरूप में ढलेगी।

कुल मिला कर विकास के सभी प्रकार और सर्वज्ञ विकास और सब तक विकास की पहुंच अभी अधूरी है और इसे पूरा करने का दबाव साल 2021 या आगे आने वाले वर्षों पर अधिक इसलिए रहेगा क्योंकि 2020 का घाटा जल्दी जाने वाला नहीं है। आॅक्सफोर्ड इकोनोमिक्स की पड़ताल भी यह बताती है कि साल 2025 तक भारत की विकास दर पांच फीसद से कम रह सकती है। यह जरूरी नहीं कि सभी के पास महल हों, पर यह बहुत जरूरी है कि बुनियादी विकास से कोई अछूता न रहे। जब ऐसा हो जाएगा तभी सर्वोदय होगा और लोक सशक्तिकरण होगा।

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