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राजनीतिः संदेह के घेरे में बाघों की गिनती

दुनियाभर में इस समय करीब तीन हजार नौ सौ बाघ हैं। इनमें से दो हजार दो सौ छब्बीस भारत में हैं। विज्ञान-सम्मत की गई गणनाओं का अंदाजा है कि यह संख्या डेढ़ से तीन हजार के बीच हो सकती है। इस बड़े फर्क ने ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ जैसी विश्व विख्यात परियोजना पर संदेह के सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे यह भी आशंका उत्पन्न हो गई है कि क्या यह परियोजना सफल है भी या नहीं? वन्य जीव विषेशज्ञ दो हजार दो सौ छब्बीस के आंकड़े पर सहमत नहीं है।

भारत में टाइगर प्रोजेक्ट परियोजना की शुरुआत 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने की थी। शुरू में इसका कार्य क्षेत्र नौ बाघ संरक्षण वनों तक सीमित था।

भारत में इस समय इक्कीस राज्यों के तीस हजार बाघों के रहवासी क्षेत्रों में गिनती का काम चल रहा है। इस साल प्रथम चरण की गिनती के आंकड़े बढ़ते क्रम में आ रहे हैं। यह गिनती चार चरणों में पूरी होगी। बाघ गणना बाघ की जंगल में प्रत्यक्ष उपस्थिति के बजाय, उसकी कथित मौजूदगी के प्रमाणों के आधार पर की जा रही है। इसलिए इनकी गिनती की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। केंद्र सरकार के 2010 के आकलन के अनुसार यह संख्या दो हजार दो सौ छब्बीस है। जबकि 2006 की गणना में एक हजार चार सौ ग्यारह बाघ थे। इस गिनती में सुंदरवन के वे सत्तर बाघ शामिल नहीं थे, जो 2010 की गणना में शामिल कर लिए गए थे। महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तराखंड और असम में सबसे ज्यादा बाघ हैं। एक समय टाइगर स्टेट का दर्जा पाने वाले मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या निरंतर घट रही है। प्रदेश में पिछले साल ग्यारह महीने के भीतर तेईस बाघ विभिन्न कारणों से मारे भी गए। इनमें ग्यारह शावक थे।

दुनियाभर में इस समय करीब तीन हजार नौ सौ बाघ हैं। इनमें से दो हजार दो सौ छब्बीस भारत में हैं। विज्ञान-सम्मत की गई गणनाओं का अंदाजा है कि यह संख्या डेढ़ से तीन हजार के बीच हो सकती है। इस बड़े फर्क ने ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ जैसी विश्व विख्यात परियोजना पर संदेह के सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे यह भी आशंका उत्पन्न हो गई है कि क्या यह परियोजना सफल है भी या नहीं? वन्य जीव विषेशज्ञ दो हजार दो सौ छब्बीस के आंकड़े पर सहमत नहीं है। दरअसल, बाघों की गिनती के लिए अलग-अलग तरीके इस्तेमाल होते हैं। भारतीय वन्य जीव संस्थान, देहरादून के विषेशज्ञों का कहना है कि मध्य भारत में बाघों के आवास के लिहाज से सबसे उचित स्थान कान्हा राष्ट्रीय उद्यान है। यहां नई तकनीक से गणना की जाए तो मौजूदा संख्या में तीस फीसद तक की वृद्धि हो सकती है। डीएनए फिंगर प्रिंट की तकनीक का इस्तेमाल करने वाले विषेशज्ञों ने आकलन किया है कि कान्हा में बाघों की संख्या नवासी है। वहीं, कैमरा ट्रैप पर आधारित एक अन्य तकनीक यह संख्या साठ के करीब बताती है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि बाघ एकांत पसंद प्राणी हैं। लिहाजा, इनकी गणना करना आसान नहीं है। लेकिन गणना में इतना अधिक अंतर दोनों ही तरीकों के प्रति संदेह पैदा करता है।

भारत में टाइगर प्रोजेक्ट परियोजना की शुरुआत 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने की थी। शुरू में इसका कार्य क्षेत्र नौ बाघ संरक्षण वनों तक सीमित था। बाद में इसका क्षेत्र विस्तार उनचास उद्यानों तक बढ़ा दिया गया। बाघ संरक्षण का काम भारत सरकार और राज्यों की साझा जिम्मेदारी है। इन साझा प्रयासों का ही परिणाम है कि बाघों की संख्या तीस फीसद तक बढ़ी है। 2010 में यह संख्या एक हजार सात सौ छह थी, जो 2014 में बढ़ कर दो हजार दो सौ छब्बीस हो गई। लेकिन 2011 में जारी बाघ गणना की रिपोर्ट में जो तथ्य सामने आए, उनसे कई सवाल खड़े हो गए। इस गणना के अनुसार 2006 में बाघों की जो संख्या एक हजार चार सौ ग्यारह थी, वह 2010 में एक हजार सात सौ छह हो गई। जबकि 2006 की गणना में सुंदरवन के बाघ शामिल नहीं थे, वहीं 2010 की गणना में इनकी संख्या सत्तर बताई गई। बाघों की बढ़ी संख्या नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से आई थी। इसमें नक्सली भय से वन अमले का प्रवेश वर्जित है। जब वन अमला बियावान जंगलों में पहुंचा ही नहीं तो गणना कैसे संभव हुई? जाहिर है, यह गिनती अनुमान आधारित थी। इस रपट को जारी करते हुए खुद सरकार ने माना था कि 2009-2010 में बड़ी संख्या में बाघ मारे गए थे, इसके बावजूद न तो शिकारी और तस्करों के समूहों को हिरासत में लिया जा सका और न ही शिकार की घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सका। इस गिनती में आघुनिक तकनीक से महज छह सौ पंद्रह बाघों के छायाचित्र लेकर गिनती की गई थी।

जब बाघों की संख्या कम हो गई तब मध्य प्रदेश के कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में पैरों के निशान के आधार पर बाघ गणना प्रणाली को मान्यता दी गई थी। ऐसा माना जाता है कि हर बाघ के पंजे का निशान अलग होता है और इन निशानों को एकत्र कर बाघों की संख्या का आकलन किया जा सकता है। कान्हा के निदेशक ने इसे एक वैज्ञानिक तकनीक माना था, लेकिन यह तकनीक उस समय मुश्किल में आ गई, जब ‘साइंस इन एशिया’ के मौजूदा निदेशक ने बंगलुरु की वन्य जीव सरंक्षण संस्था के लिए विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में बंधक बनाए गए बाघों के पंजों के निशान लिए और विषेशज्ञों से इनमें अंतर करने के लिए कहा। इसके बाद पंजों के निशान की तकनीक की कमजोरी उजागार हो गई और इसे नकार दिया गया।

इसके बाद ‘कैमरा ट्रैपिंग’ का तरीका इस्तेमाल किया गया। शुरुआत में इसे दक्षिण भारत में लागू किया गया। इसमें जंगली बाघों की तस्वीरें लेकर उनकी गणना की जाती थी। ऐसा माना गया कि हर बाघ के शरीर पर धारियां उसी तरह अलग-अलग होती हैं, जैसे इंसान की अंगुलियों के निशान अलग-अलग होते हैं। यह एक महंगी आकलन प्रणाली थी। पर यह बाघों के पैरों के निशान लेने की तकनीक से कहीं ज्यादा सटीक थी। इस तकनीक द्वारा गिनती सामने आने पर बाघों की संख्या नाटकीय ढंग से घट गई। इसी गणना से यह आशंका सामने आई कि इस सदी के अंत तक बाघ लुप्त हो जाएंगे।

बढ़ते क्रम में बाघों की गणना इसलिए भी नामुमकिन और अविश्वसनीय है, क्योंकि आर्थिक उदारवाद के चलते बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्राकृतिक संपदा के दोहन की जिस तरह से छूट दी जा रही है, उसी अनुपात में बाघ के प्राकृतिक आवास भी प्रभावित हो रहे हैं। खनन और राजमार्ग विकास परियोजनाओं ने बाघों की वंश वृद्धि पर अंकुश लगाया है। इन परियोजनाओं को प्रचलन में लाने के लिए चार गुना मानव बसाहटें बाघ आरक्षित क्षेत्रों में बढ़ी हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियां भी खनन परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही हैं। पन्ना में हीरा खनन परियोजना, कान्हा में बॉक्साइट, राजाजी में राष्ट्रीय राजमार्ग तड़ोबा में कोयला खनन और उत्तर-प्रदेश के तराई वन क्षेत्रों में इमारती लकड़ी माफिया बाघों के लिए जबरदस्त खतरा बने हुए हैं। यही कारण है कि बाघों की संख्या में लगातार कमी आ रही है, जबकि राष्ट्रीय उद्यानों, वनकर्मियों और वन आबंटन में निरंतर वृद्धि हो रही है। बीते चार सालों में एक अरब छियानवे करोड़ का पैकेज बाघों के संरक्षण के लिए जारी किया जा चुका है। बाघ गणना के जो वर्तमान परिणाम सामने आए हैं, केवल इसी गिनती पर नौ करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं।

बाघों की गणना के ताजा और पूर्व प्रतिवेदनों से भी यह तय हुआ है कि नब्बे फीसद बाघ आरक्षित बाघ अभ्यारण्यों से बाहर रहते हैं। इन बाघों के संरक्षण में न वनकर्मियों का कोई योगदान होता है, न ही बाघों के लिए मुहैया कराई जाने वाली धनराशि बाघ संरक्षण के उपायों में खर्च होती है। इस तथ्य की पुष्टि इस बात से भी होती है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में जो जंगल हैं, उनमें बाघों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि हुई है। जाहिर है, इन क्षेत्रों में बाघ संरक्षण के सभी सरकारी उपाय पहुंच से बाहर हैं। लिहाजा वक्त का तकाजा है कि जंगल के रहबर वनवासियों को ही जंगल के दावेदार के रूप में देखा जाए तो संभव है कि वन प्रबंधन का कोई मानवीय संवेदना से जुड़ा जनतांत्रिक सहभागितामूलक मार्ग प्रशस्त हो।

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