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राजनीतिः कैसे साफ होगी गंगा

सरकारें अपने स्तर पर नदियों की सफाई के लिए जो कुछ करेंगी, उनकी सार्थकता इससे तय होगी कि सरकार और समाज ने नदियों की किन दिक्कतों को गंभीरता से लिया है। नदियों को नया जीवन देने के लिए पहले हमें अपनी उन समस्याओं को जानना जरूरी है जिनकी वजह से हमारी नीयत में नदियों के लिए खोट बनी हुई है।

Author Published on: July 11, 2020 1:45 AM
हमारे देश में गंगा-यमुना दुनिया की उन नदियों में से हैं जिनके अस्तित्व पर लंबे समय से खतरा मंडरा रहा है।

संजय वर्मा

भारतीय जनमानस का गंगा नदी से गहरा जुड़ाव रहा है। सिर्फ धार्मिक नजरिए से नहीं, बल्कि जल संसाधन, बिजली उत्पादन और खेती के जरिए भी अर्थव्यवस्था में योगदान के लिए गंगा का सतत प्रवाहित होना देश की सबसे अहम जरूरत है। गंगा में जल निरंतर बहे और वह निर्मल भी हो- इस बेमिसाल नारे के साथ गंगा का सफाई अभियान वर्षों से चल रहा है और पिछले छह साल में तो इसमें काफी सक्रियता भी दिखाई गई। लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि सरकार के इस जोश के बावजूद बीते छह साल में गंगा कितनी साफ हुई है।

बीते कई दशकों में गंगा की सफाई के लिए कई योजनाएं बनीं और उनमें हजारों करोड़ रुपए बहाए गए, लेकिन ठोस नतीजों का अकाल बना रहा। इधर विश्व बैंक ने भी पंचवर्षीय योजना के तहत केंद्र की नमामि गंगे परियोजना के लिए तीन हजार करोड़ रुपए (चालीस करोड़ डॉलर) का भारी-भरकम कर्ज देना मंजूर किया है। विश्व बैंक से इस परियोजना को साढ़े चार हजार करोड़ रुपए (साठ करोड़ डॉलर) की रकम पहले ही मिल चुकी है। शायद ही किसी को इसका अहसास हो कि अब तक नमामि गंगे या फिर नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) के तहत तीन सौ तेरह विभिन्न परियोजनाओं के लिए पच्चीस हजार करोड़ रुपए की व्यवस्था की जा चुकी है, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। ऐसा क्यों है। आखिर गंगा और देश की अन्य नदियों की दुर्दशा के वे ठोस-जमीनी कारण क्या हैं, जिनका निराकरण किए बगैर उनकी स्वच्छता-निर्मलता संभव नहीं हो पा रही है।

हमारे देश में गंगा-यमुना दुनिया की उन नदियों में से हैं जिनके अस्तित्व पर लंबे समय से खतरा मंडरा रहा है। छह साल पहले यानी 2014 में पर्यावरण संरक्षण से संबद्ध वैश्विक संस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर) ने खुलासा किया था कि निरंतर बढ़ते प्रदूषण, पानी के अत्यधिक दोहन, सहायक नदियों के सूखने, बड़े बांधों के निर्माण और वातावरण में परिवर्तन से इन बड़ी नदियों के लुप्त होने का संकट पैदा हो गया है। गंगा की हालत से अन्य नदियों के सामने मौजूद चुनौतियों का अंदाजा हो जाता है। तीन साल पहले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने आंकड़े जारी कर बताया था कि गंगा का जल आचमन लायक क्यों नहीं है। सीपीसीबी के मुताबिक हरिद्वार से लेकर कानपुर, इलाहाबाद और बनारस तक इसमें कोलीफार्म बैक्टीरिया की मात्रा काफी ज्यादा है, जो इंसानों को विभिन्न रोगों की गिरफ्त में ला सकता है।

आमतौर पर गंगा के प्रति सौ मिलीलीटर जल में कोलीफार्म बैक्टीरिया की तादाद पांच हजार से नीचे होनी चाहिए, पर हरिद्वार में यह मात्रा प्रति सौ मिलीलीटर जल में 50917, कानपुर में 1,51,333 और बनारस में 58000 पाई गई थी। बनारस में तो कोलीफार्म बैक्टीरिया की संख्या सुरक्षित मात्रा से 11.6 गुना ज्यादा है। गंगा में बैक्टीरिया की इतनी अधिक मौजूदगी की वजह उसमें मिलने वाला बिना उपचारित किए गए सीवेज का गंदा पानी है, जो इसके तट पर मौजूद शहरों से निकलता है। गंगा के किनारे मौजूद शहरों से रोजाना औसतन 2.7 अरब लीटर सीवेज का गंदा और विषैला पानी निकलता है। हालांकि इन सभी शहरों में सीवेज का पानी साफ करने के लिए शोधन संयंत्र लगे हुए हैं, पर उनकी क्षमता काफी कम है और ये संयंत्र सिर्फ 1.2 अरब लीटर यानी पचपन फीसद सीवेज की सफाई कर पाते हैं। इसका अर्थ यह है कि बाकी पैंतालीस फीसद सीवेज गंगा में यूं ही मिलने दिया जाता है। देश की दूसरी नदियां भी गंगा की तरह ही सीवेज का गंदा पानी बिना शोधन संयंत्र के मिलने के कारण भयानक प्रदूषण झेल रही है।

इसके अलावा नदियों को दो और मुख्य प्रदूषणों का सामना करना पड़ रहा है। ज्यादा बड़ा खतरा नदी किनारे मौजूद कारखानों से निकलने वाले औद्योगिक कचरे और विषैले रसायनों का है। साथ में, नदियों के समीप स्थित खेतों में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग ने भी बड़ी समस्या पैदा की है, जिनके अवशेष रिस कर नदियों में मिल जाते हैं और उसके पानी को जहरीला बना देते हैं। इन प्रदूषणों की स्थिति क्या है, इसका एक आकलन गंगा के किनारे स्थित शहरों से इसमें मिलने वाले प्रदूषण के जरिए हो सकता है। गंगोत्री से निकलने के बाद हरिद्वार आते-आते गंगा में उत्तराखंड राज्य की बारह नगरपालिकाओं के अंतर्गत पड़ने वाले नवासी नाले सारा सीवेज इस नदी में उड़ेल देते हैं। हरिद्वार में सीवेज से पैदा प्रदूषण से निपटने के लिए तीन शोधन संयंत्र हैं, लेकिन वे इस शहर के सीवेज को संभालने में नाकाम साबित हो रहे हैं। हरिद्वार के बाद कानपुर में गंगा की स्थिति सबसे ज्यादा दयनीय हो जाती है, क्योंकि यहां बेशुमार औद्योगिक कचरा इसमें प्रवाहित किया जाता है। कानपुर में तमाम फैक्ट्रियां हैं और इसके जाजमऊ नामक इलाके में साढ़े चार सौ चमड़ा शोधन इकाइयां हैं। इनके निकलने वाला औद्योगिक कचरा गंगाजल को जहरीला बनाने के लिए पर्याप्त है। औद्योगिक शहर कानपुर में पैदा होने वाले प्रदूषण से गंगा को बचाने का एकमात्र उपाय यह पाया गया है कि यहां के सारे नालों को गंगा से दूर ले जाया जाए और उनका गंदा पानी किसी भी सूरत में इसमें न मिल पाए।

औद्योगिक विकास के जोर पकड़ने के साथ ही गंगा-यमुना आदि नदियां इसलिए और ज्यादा मैली होती जा रही हैं, क्योंकि यह सिलसिला प्रदूषण रोकने की तमाम सरकारी कवायदों के बावजूद रुकने का नाम नहीं ले रहा। बीते अरसे में सुप्रीम कोर्ट गंगा एक्शन प्लान की राशि के दुरुपयोग पर गहरी नाराजगी जता चुका है। एक मौके पर सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा था कि प्रदूषण दूर करने के नाम पर गंगा एक्शन प्लान में करीब नौ सौ करोड़ खर्च करने के बावजूद गंगा में औद्योगिक प्रदूषण क्यों बदस्तूर जारी है? पर सरकार बगलें झांकने के अलावा और कुछ नहीं कर सकी। सच तो यह कि इतना कुछ होने के बाद भी गंगा को स्वच्छ बनाने का नीतिगत अभियान नीयत में खोट के कारण सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं आया।

यह इससे स्पष्ट होता है कि कुछ वर्ष पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने इस संबंध में जो रिपोर्ट पेश की थी, उसे वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तक ने गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं महसूस की। कैग की रिपोर्ट में गंगा एक्शन प्लान के क्रियान्वयन की खामियों की ओर इशारा किया गया था और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट में कहा गया था कि हमारे पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है जो यह निगरानी रख सके कि कार्रवाई योजना के तहत राज्यों को दिए गए पैसे का सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं। सरकारी रवैये से यह संदेह गहराता है कि गंगा का प्रदूषण दूर करने के नाम पर अब तक पैसे की बंदरबांट ही होती रही है।

दुनिया में कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब सरकार और समाज ने मिल कर नदियों को पुनर्जीवन दिया है। लंदन की टेम्स की स्वच्छता की मिसाल देने वाली सरकार और जनता को यह जानने की जरूरत है कि नदियों को बचाने के लिए आखिर कितनी कड़ी प्रतिबद्धताओं की जरूरत होती है। सरकारें अपने स्तर पर नदियों की सफाई के लिए जो कुछ करेंगी, उनकी सार्थकता इससे तय होगी कि सरकार और समाज ने नदियों की किन दिक्कतों को गंभीरता से लिया है। नदियों को नया जीवन देने के लिए पहले हमें अपनी उन समस्याओं को जानना जरूरी है जिनकी वजह से हमारी नीयत में नदियों के लिए खोट बनी हुई है।

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