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ऊर्जा में थोरियम का विकल्प

भारत का यूरेनियम भंडार दुनिया के भंडारों के मुकाबले एक फीसद से कम है, लेकिन इसके मुकाबले हमारा थोरियम भंडार दुनिया के भंडारों के मुकाबले अड़सठ फीसद अधिक है। एक तथ्य यह भी है कि थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर बना कर भारत अगले चार सौ साल तक अपनी जरूरतों के मुताबिक ऊर्जा पा सकता है।

भारत का यूरेनियम भंडार दुनिया के भंडारों के मुकाबले एक फीसद से कम है, लेकिन इसके मुकाबले हमारा थोरियम भंडार दुनिया के भंडारों के मुकाबले अड़सठ फीसद अधिक है।

अभिषेक कुमार सिंह

किसी भी विकासशील देश की तरह भारत को भी अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए भारी मात्रा में बिजली चाहिए। सरकार के दावे पर यकीन करें तो अब देश के अठारह हजार गांवों तक बिजली पहुंचा दी गई है और शहरों में बिजली की खपत में तेजी से इजाफा हो रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में ही इस साल यह खपत सात हजार मेगावाट प्रतिदिन पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है जो इस साल मई-जून में किसी भी दिन सच साबित हो सकता है। हालात ऐसे हैं कि एक ही महानगर को बिजली देने के लिए कई बिजलीघरों को एक साथ चलाना पड़ रहा है। वैसे तो बिजली पैदा करने के कई अलग-अलग विकल्प हैं, पानी से पनबिजली पैदा की जा रही है, तो तेल-गैस और कोयले से बिजली बनाने वाले संयंत्र भी देश में हैं। लेकिन बड़े पैमाने पर देखें तो 2024 तक परमाणु ऊर्जा का उत्पादन तीन गुना करने या दीर्घकालिक लक्ष्य के मुताबिक एटमी ऊर्जा से देश में पैंतीस हजार मेगावाट बिजली पैदा करने के लक्ष्य हमें मजबूर करते हैं कि देश अपना सारा जोर एटमी बिजली पैदा करने में लगाए।

दो साल पहले 2017 में पोकरण परीक्षण की वर्षगांठ के मौके पर सरकार ने घोषणा की थी कि देश में स्वदेशी तकनीक पर आधारित दस नाभिकीय रिएक्टर (परमाणु संयंत्र) लगाए जाएंगे। इन संयंत्रों से सात हजार मेगावाट बिजली हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इन संकल्पों के समांतर हाल में खबर यह भी आई है कि जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र में रिएक्टरों के निर्माण का ठेका पाने वाली फ्रांस की कंपनी ईडीएफ ने परियोजना के वित्त पोषण के लिए भारत को फ्रांस की दो अन्य सरकारी कंपनियों को संप्रभु गारंटी उपलब्ध कराने की शर्त रखी है। ईडीएफ ही वह कंपनी है जो महाराष्ट्र के जैतापुर में भारत का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा संयंत्र विकसित करेगी। इसमें 1650-1650 मेगावॉट क्षमता के छह परमाणु ऊर्जा रिएक्टर होंगे। कंपनी ने पिछले साल दिसंबर में ही भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम (एनपीसीआइएल) को एक प्रौद्योगिकी-वाणिज्यिक पेशकश की थी। इस पेशकश पर सरकार ने हाल तक कोई जवाब नहीं दिया है। यह चुप्पी असल में बहुत कुछ कहती है। परमाणु संयंत्रों को र्इंधन मुहैया कराना अब भी टेढ़ी खीर है। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता की राह में चीन अड़ंगा है, तो अमेरिका सहित कई अन्य देश करार के बावजूद परमाणु सहयोग करने को आसानी से राजी नहीं होते हैं। अतीत में ऐसा कई बार हुआ है, जब परमाणु संयंत्रों के र्इंधन के रूप में यूरेनियम की सप्लाई को अमेरिका-आस्ट्रेलिया सहित कई देश झटके दे चुके हैं। साफ है कि हमारे देश को विदेशों से यूरेनियम की आपूर्ति की राह कठिन है। असल में, झगड़े की जड़ यूरेनियम की सप्लाई ही है जिसे लेकर हमेशा संदेह बने रहते हैं। यही नहीं, समझौतों के बल पर यदि जरूरत भर का र्इंधन मिल भी गया, तो भी सिर्फ दिल्ली के लिए ही सात हजार मेगावाट बिजली बनाने के लिए हर साल कई हजार टन बेहद महंगा यूरेनियम खरीदने को मजबूर होना पड़ेगा। यह सारी कसरत उस वक्त भी बेकार लगती है जब एटमी एनर्जी के मामले में एक सवाल आत्मनिर्भरता का उठता है।

सात साल पहले 2012 में जब तमिलनाडु में रूस की मदद से स्थापित कुडनकुलम परमाणु संयंत्र को चालू करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, तो इसे लेकर उठे विरोध के बीच कुछ विश्लेषकों ने सवाल उठाया था कि भारत आखिर क्यों नहीं यूरेनियम की बजाय थोरियम वाले विकल्प पर गौर करता है जो न केवल सुरक्षित है, बल्कि भारत को परमाणु ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर भी बना सकता है। भारत का यूरेनियम भंडार दुनिया के भंडारों के मुकाबले एक फीसद से कम है, लेकिन इसके मुकाबले हमारा थोरियम भंडार दुनिया के भंडारों के मुकाबले अड़सठ फीसद अधिक है। एक तथ्य यह भी है कि थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर बना कर भारत अगले चार सौ साल तक अपनी जरूरतों के मुताबिक ऊर्जा पा सकता है। इसमें एक बाधा यह है कि थोरियम से चलने वाले रिएक्टर बनाने में करीब पांच दशक तक लग सकते हैं। दूसरे, यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि अकेले थोरियम से बिजली नहीं बनाई जा सकती क्योंकि थोरियम ऐसा तत्त्व नहीं है जो सीधे यूरेनियम की जगह ले सके। इसके लिए उसमें प्लूटोनियम मिलाते हुए इन दोनों तत्त्वों का 20-80 का अनुपात (20 फीसद यूरेनियम, 80 फीसद थोरियम) रखना होगा। एक वक्त था जब देश में थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा की दिशा में काफी सोच-विचार चला था। जब से अमेरिका-भारत परमाणु समझौते की बात शुरू हुई थी, तभी से यह जोर-शोर से कहा जाने लगा था कि क्यों नहीं भारत उस परमाणु र्इंधन के बारे में सोचता, जिसके लिए उसे अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया और न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) की कड़ी शर्तों का मोहताज नहीं होना पड़ेगा।

यहां कुछ अहम सवाल हैं। पहला यह कि क्या दुनिया में कहीं और थोरियम आधारित परमाणु संयंत्रों से बिजली पैदा की जा रही है? दूसरे, इस तरह के संयंत्रों में पैदा की जाने वाली बिजली बहुत महंगी तो नहीं हो जाएगी? इस बारे में कुछ प्रयोग फ्रांस, अमेरिका समेत कई विकसित देशों ने किए, पर उनमें सफलता नहीं मिलने पर उन्होंने इससे हाथ खींच लिए। लेकिन हमारे देश के परमाणु वैज्ञानिकों ने थोरियम रिएक्टरों के मामले में काफी सफलता पाई है। चेन्नई के पास कलपक्कम स्थित इंदिरा गांधी सेंटर फॉर एटॉमिक रिसर्च (आइजीसीएआर) में थोरियम आधारित बिजली उत्पादन कार्यक्रम पर काफी समय से शोध चल रहा है। वहां पांच सौ मेगावाट का फास्ट ब्रीडर रिएक्टर बनाने का काम भी चल रहा है। चेन्नई स्थित एडवांस्ड थोरियम ब्रीडर रिएक्टर में आठ सौ अस्सी किलो प्लूटोनियम डालने के बाद ग्यारह सौ किलो थोरियम यूरेनियम-233 में बदल जाएगा। इस तरह इस रिएक्टर में जितने र्इंधन की खपत की जाएगी, उससे अधिक ईंधन पैदा हो जाएगा। इसके अलावा विश्लेषकों का कहना है कि पंद्रह साल पहले अक्तूबर, 2004 में कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का जो निर्माण कार्य शुरू किया गया था, अगर उसमें पर्याप्त सफलता मिलती है तो भारत अपनी मौजूदा राष्ट्रीय बिजली उत्पादन क्षमता से तीन गुना अधिक उत्पादन यानी साढ़े तीन लाख मेगावाट बिजली का उत्पादन स्वदेशी परमाणु सामग्री और तकनीक से कर सकेगा।

यह भी दावा है कि यह थोरियम रिएक्टर दुनिया के किसी भी अन्य रिएक्टर से ज्यादा सुरक्षित है। इसके अलावा थोरियम आधारित ऐसे परमाणु बिजलीघर में एक बार ईंधन डालने के बाद दो साल तक और र्इंधन की जरूरत नहीं होती है। सबसे खास बात यह कि इस रिएक्टर में न तो प्राकृतिक यूरेनियम की जरूरत पड़ती और न ही संवर्धित यूरेनियम की। और जहां तक सैन्य उद्देश्यों के लिए (यानी एटमी हथियारों के लिए) प्लूटोनियम और यूरेनियम की जरूरत का सवाल है, तो यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि अमेरिका से समझौते के बाद भी भारत आयातित यूरेनियम से निकले प्लूटोनियम का इस्तेमाल इस मकसद में नहीं कर पाता है। इसके उलट अगर वह थोरियम रिएक्टरों पर अपनी निर्भरता बढ़ाता है, तो इन संयंत्रों से निकले यूरेनियम का इस्तेमाल अपनी मर्जी से सैन्य उद्देश्यों के लिए भी करने को स्वतंत्र होगा। स्पष्ट है कि यूरेनियम-थोरियम के बीच थोरियम एक श्रेष्ठ विकल्प है। साथ ही, भारत अपने यहां विकसित थोरियम तकनीक पर पेटेंट अधिकार ले सकता है, यानी आगे चलकर दुनिया इसकी नकल नहीं कर सकती। इसीलिए मूल सवाल यही है कि क्यों नहीं इस बारे में राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई जाती है और अंतरराष्ट्रीय निगरानी व यूरेनियम आयात की कड़ी शर्तों पर स्वदेशी थोरियम आधारित परमाणु संयंत्रों के विकास को तरजीह दी जाती?

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