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आत्मनिर्भर भारत के मकसद में मददगार आसान कर्ज

सरकार को अपनी ओर से उन व्यवसायों या कॉरपोरेट घरानों के लिए बराबरी के स्तर पर आकर मदद करनी चाहिए, जिन्हें अपने सभी कर्जों का भुगतान करने के बाद भी नया कर्ज नहीं मिलता है और उन्होंने अपनी प्रमुख परिसंपत्तियां बेच कर भी कर्ज चुकाने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है।

Economyसांकेतिक फोटो।

निशिकांत दुबे

इस बार 2021-22 के लिए केंद्रीय बजट ने एक नपे-तुले, विस्तार को ध्यान में रख कर, राजकोषीय मुद्रा का सहारा लेकर महामारी के बाद अर्थव्यवस्था को पटरी पर वापस लाने के लिए एक मंच तैयार किया है। नरेंद्र मोदी सरकार के बजट में पेश किए गए आंकड़ों में अभूतपूर्व पारदर्शिता के साथ, हाल ही में पेश किया गया बजट आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ते कदम को और मजबूत करता है।

एक मजबूत और उत्साहित घरेलू कॉर्पोरेट क्षेत्र आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला होगा, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी अपने वक्तव्यों में अक्सर कहते रहे हैं। जब पूंजी आसानी से और कम दामों पर उपलब्ध होगी, तो सपनों को पूरा करने में मदद मिलेगी।

इस संबंध में, गौर करने वाली बात यह है कि बजट में दो नए वित्तीय संस्थानों के निर्माण का प्रस्ताव दिया गया है; एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी और डेवलपमेंट फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन (डीएफआई)। ये दोनों संस्थान, उस आवश्यक क्रेडिट ग्रोथ की कमी को पूरा करने में लंबा रास्ता तय करेंगे, जिसके चलते तेजी से आर्थिक सुधार होने की दिशा में चल रहे प्रयासों में बाधा उत्पन्न हुई थी।

भारत में, विशेष रूप से घरेलू कंपनियों के लिए कमर्शियल क्रेडिट ग्रोथ के साथ, प्रस्तावित डीएफआई, ज्यादा नौकरियां पैदा करने और अर्थव्यवस्था का विस्तार करने के लिए निजी निवेश की एक नई लहर लेकर आएगा। नए इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट डेवलपमेंट से लाभ मिलेगा और इससे प्रमुख क्षेत्रों में क्षमता निर्माण होगा।

हालांकि, ज्यादा से ज्यादा विदेशी निवेश को मौका देना स्वागत योग्य है, लेकिन जरूरी बात यह है कि विदेशी निवेशकों ने हमेशा ग्रीन फील्ड निवेश के बजाय ब्राउन फील्ड निवेश करना पसंद किया है। दरअसल, पिछले तीन दशकों में ग्रीन फील्ड प्रोजेक्ट में किसी एक बड़े एफडीआई की ओर इशारा करना मुश्किल है।

आर्थिक उदारीकरण से पहले या बाद में, प्रोजेक्ट से जुड़े जोखिम को हमेशा घरेलू भारतीय उद्यमियों और बिजनेस घरानों ने झेला है। इसे पहचाना और सराहा जाना चाहिए। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में कहा, निजी क्षेत्र पर हमला करने और उसे कमजोर बनाने से भारत का विकास नहीं होगा और रोजगार पैदा करने और आर्थिक विकास के लिए हानिकारक होगा।

इस हिसाब से, प्रोजेक्ट के लिए आसान और बजट के अंदर रहने वाले फाइनेंस की उपलब्धता, हमारी अर्थव्यवस्था में इस मोड़ पर भारतीय कंपनियों के लिए सबसे अहम है। अधिकांश भारतीय कंपनियों और महासंघों के पास कम लागत वाली या दीर्घकालिक पूंजी उपलब्ध नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र के भारतीय बैंक एसेट लायबिलिटी मिसमैच, पूंजी की कमी, एसेट की बिगड़ती गुणवत्ता, उच्च विनियामक लागतों से जूझ रहे हैं और साथ ही, कई प्रोजेक्ट के लिए फाइनेंस रोक दिए गए हैं। इन दिनों में जो भी कर्ज दिया जाता है, उसकी कीमत बहुत कम होती है। हमारी कंपनियों के लिए सस्ती पूंजी की जरूरत हमारे शरीर के लिए आॅक्सीजन की तरह है, और इस तरह की सुविधा उपलब्ध कराना इस मुश्किल घड़ी में बहुत मायने रखता है।

जहां एक ओर एक नए डीएफआई, एआरसी की स्थापना, पीएसयू बैंकों के नए कैपिटल इन्फ्यूजन और निजाकरण जैसी कुछ समस्याओं का हल करेगी, वहीं थोड़ी छूट देते हुए नियामक ढांचे के दो विशिष्ट क्षेत्रों पर दोबारा नजर डालना भी जरूरी है।

सबसे पहले, बैंक को कर्ज न चुकाने वाली कंपनियों को कर्ज देना बंद कर देना चाहिए, साथ ही उन कंपनियों को भी जो कर्ज समय से चुका तो रही हैं, लेकिन उनके प्रोमोटर या डायरेक्टर किसी कर्ज न चुकाने वाली कंपनी में इन्हीं पदों पर हैं। कॉर्पोरेट भारत में एक बड़े क्रॉस-होल्डिंग स्ट्रक्चर को देखते हुए, इस तरह के अहम बदलावों का लाना बहुत जरूरी है।

इस संबंध में एक संभावित विकल्प यह हो सकता है कि बैंकों को ऐसे सभी मामलों पर निर्णय लेने की अनुमति हो, जहां किसी कंपनी पर बकाया कर्ज जोखिम सीमा से नीचे है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए प्रक्रियाओं का एक संशोधित ढांचा तैयार किया जाए, जो व्यावहारिक और वाणिज्यिक रूप से सही हो। इससे, दिया गया कर्ज सुरक्षित रहने में आसानी होगी और यह सामान्य रूप से कॉर्पोरेट क्षेत्र के ऋण प्रवाह में सुधार करने में अहम भूमिका तय करेगा।

दूसरा, उन लोगों के लिए एक मददगार पोस्ट-रिजोल्यूशन माहौल बनाया जाए, जो किसी डिफॉल्ट के बाद निपटान या आईबीसी की प्रक्रिया से गुजरे हैं। जहां एक ओर ‘क्रेडिटर इन कंट्रोल’ की नई व्यवस्था भी जरूरी है, वहीं दूसरी ओर यह ‘डेटर इन द डॉक्स’ नीति पर आधारित नहीं हो सकता है, जो कि इस समय प्रभावी रूप से मौजूद है। मौजूदा पोस्ट-रिजोल्यूशन माहौल विकास के लिए अनुकूल और कंपनियों के पुनरुद्धार के लिए मददगार होने के बजाय केवल बकाया की वसूली तक सीमित है।

यह प्रणाली किसी उधार लेने वाले ऐसे व्यक्ति के लिए मददगार नहीं है, जिसने बकाया राशि का निपटारा या तो दिवालिया होने की प्रक्रिया के माध्यम से किया है या उधार देने वालों के साथ द्विपक्षीय वन-टाइम सेटलमेंट के द्वारा। बैंकों को ऐसे कॉरपोरेट्स को कर्ज देने की अनुमति बिल्कुल नहीं है। इस तरीके से चलते रहने की वजह से भारतीय बैंकों का दिमाग और तरीका बहुत रूढ़िवादी हो गया है। वहीं विदेशी बैंक, इस संबंध में, बहुत अधिक खुले और व्यावहारिक हैं। दरअसल, लगभग सभी दिवालिएपन से जुड़े मामलों की फाइनेंसिंग विदेशी बैंकों से हुई है।

सरकार को अपनी ओर से उन व्यवसायों या कॉरपोरेट घरानों के लिए बराबरी के स्तर पर आकर मदद करनी चाहिए, जिन्हें अपने सभी कर्जों का भुगतान करने के बाद भी नया कर्ज नहीं मिलता है और उन्होंने अपनी प्रमुख परिसंपत्तियां बेच कर भी कर्ज चुकाने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है।

हितधारकों, ऋणदाताओं, उधारकर्ताओं और नियामकों के परामर्श से, सरकार को उन कॉरपोरेट घरानों को कर्ज देने के लिए एक स्पेशल नॉन-एडवर्सेरिअल प्रोसीजर्स (एसएनएपी या स्नैप) तैयार करनी चाहिए, जिन्होंने कर्ज देने वालों के साथ या तो द्विपक्षीय एकमुश्त निपटान किया हो या ऐसी दिवालिया प्रक्रिया से गुजर चुके हों, जिसमें कुल कर्ज के तीन-चौथाई (यानी 75 प्रतिशत) से कम की वसूली नहीं की गई हो। इस सुविधा के तहत, कर्ज की शर्तों को कठोर बनाया जा सकता है या व्यवहार्यता के विश्लेषण और आकलन के बाद कर्ज महंगा किया जा सकता है।

बेशक, इस तरह की प्रक्रिया को जांचने की जरूरत होगी, ताकि अनैतिक तरीकों से चलने वाली कंपनियों को कर्ज बांटने में जल्दी न की जाए। यह निश्चित रूप से समझना चाहिए कि इस तरह की सुविधा केवल उन लोगों के लिए उपलब्ध होगी, जिनके लिए किसी स्वतंत्र कर्ज देने वाले की फोरेंसिक आॅडिट द्वारा स्थापित किया गया हो कि उनका कोई बेनामी या धोखाधड़ी वाला लेनदेन नहीं है। ऐसी प्रणाली के तहत बड़ा लाभ यह है कि प्रोमोटरों को न केवल सहयोग करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि वे कर्ज देने को रोक कर पहले वसूली पर ध्यान देंगे।

सरकार के अलावा, भारतीय बैंक एसोसिएशन जैसी संस्थाओं को भी सक्रिय होना होगा और भारतीय और विदेशी बैंकों को साथ लाकर, अपने कर्जदारों के लिए मददगार पोस्ट-रिजोल्यूशन माहौल बनाना होगा। ऐसे में वे प्रोजेक्ट कंसोर्टियम के रूप में मिल कर काम करेंगे, जिसमें एक प्रोजेक्ट फाइनेंस में आगे रहेगा, तो दूसरा नॉन-टेन्योर वाली वर्किंग कैपिटल फाइनेंसिंग में।
(लेखक भाजपा सांसद हैं)

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