राजनीति: म्यांमा में फिर लोकतंत्र की बलि

आंग सान सू की ने भारत और चीन दोनों के साथ रिश्तों को संतुलित किया था। चीन-म्यांमा आर्थिक गलियारा भारत के लिए पहले से चिंता का विषय बना हुआ है। चीन इस गलियारे के माध्यम से सीधे बंगाल की खाड़ी में पहुंचेगा। रखाइन राज्य के क्याकप्यू बंदरगाह को विकसित करने के पीछे चीनी मंशा साफ है। वह इस बंदरगाह को भारत की पूर्वी सीमा का ग्वादर बनाना चाहता है।

म्यांमा की सेना ने आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) की चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट कर शासन अपने हाथ में ले लिया है।

भारत के पड़ोसी मुल्क म्यांमा में एक बार फिर तख्ता पलट हो गया है। म्यांमा की सेना ने आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) की चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट कर शासन अपने हाथ में ले लिया है। आंग सान सू की और राष्ट्रपति विन मिंट नजरबंद हैं। तख्ता पलट का तात्कालिक कारण पिछले साल नवंबर में हुए आम चुनावों में धांधली होना बताया गया है। इस चुनाव में आंग सान सू की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने दुबारा सत्ता हासिल कर ली थी।

चुनाव में सेना समर्थक मुख्य विपक्षी दल यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) को जनता ने जिस तरह से खारिज किया, वही सेना के लिए चुनौती बन गया था। इसलिए तब से ही सेना तख्ता पलट की संभावना तलाश रही थी।

म्यांमा में तीसरी बार तख्ता पलट हुआ है। सन 1948 में आजाद होने के बाद 1962 में पहली बार म्यांमा में तख्ता पलट किया गया था। इसके बाद 1988 में सत्ता पलटी और अब 2021 में चुनी हुई सरकार को सेना का शिकार होना पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय जगत मे म्यांमा की सेना की इस कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया है।

अमेरिका ने तो म्यांमा पर प्रतिबंध लगाने तक का मन बना लिया है। भारत ने भी निर्वाचित सरकार को हटाए जाने पर चिंता व्यक्त की है। पड़ोसी बांग्लादेश भी परेशान है। जबकि थाइलैंड ने इसे म्यांमा का आंतरिक मामला बताया है। लेकिन चीन ने म्यांमा में हुए तख्ता पलट पर सधी प्रतिक्रिया दी है। उसने कहा है कि म्यांमा के सभी पक्ष मतभेदों को देश के संविधान और कानून के हिसाब से हल करें और सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिरता बनाएं।

निश्चित तौर पर चीन की सधी प्रतिक्रिया के पीछे अपनी रणनीति है। चीन म्यांमा के सैन्य शासकों को नाराज नहीं करना चाहता है। म्यांमा के सैन्य शासकों से चीन के अच्छे रिश्ते रहे हैं। पर चीन म्यांमा के लोकतांत्रिक नेताओं को भी नाराज नहीं करना चाहता। दिलचस्प बात यह है कि सैन्य शासकों ने चीन के विदेश मंत्री के साथ चुनावों में धांधली पर पहले ही चर्चा की थी। लेकिन चीन म्यांमा के दोनों पक्षों के साथ संतुलन की कूटनीति अपना रहा है।

चीनी सत्ता ने आंग सान सू की के साथ भी बेहतर संबंध विकसित कर लिए थे। सू की की पार्टी एनएलडी के कार्यकाल में ही दोनों देशों के बीच आर्थिक गलियारे को लेकर करार हुआ और क्याकप्यू बंदरगाह तथा विशेष आर्थिक क्षेत्र विकसित करने पर सहमति बनी थी।

चीन ने म्यांमा में बदलती परिस्थितियों को समझते हुए आंग सान सू की को चीन आमंत्रित किया। खुद शी जिनपिंग पिछले साल जनवरी में चीन-म्यांमा आर्थिक गलियारे के कामकाज में तेजी लाने के लिए म्यांमा की यात्रा पर गए थे। ऐसे में चीन के लिए आर्थिक हितों की रक्षा सबसे जरूरी है और इसीलिए उसने संतुलन की कूटनीति अपनाई है। न तो वह सैन्य शासन को नाराज करने वाला है, न ही आंग सान सू की को।

दरअसल, म्यांमा में सैन्य शासन का सीधा असर बांग्लादेश, चीन और भारत पर पड़ेगा। भारत ने भी म्यांमा की लोकतांत्रिक सरकार के कार्यकाल के दौरान वहां विकास योजनाओं में खासी दिलचस्पी ली है। भारत अपने पूर्वोत्तर राज्यों के आर्थिक विकास के मद्देनजर म्यांमा के रखाइन प्रांत के सितवे बंदरगाह को विकसित कर रहा है।

इस बंदरगाह को इसी साल शुरू करने की योजना है, जिसका लाभ समस्त पूर्वोत्तर को मिलेगा। भारत म्यांमा के रास्ते अपने पूर्वोत्तर के राज्यों को शेष भारत से जोड़ने की योजना पर काम कर रहा है। लेकिन म्यांमा के सैन्य शासकों का भारतीय विकास योजनाओं पर रुख क्या होगा, यह समय बताएगा।

भारत की ताजा चिंता जहां अपनी विकास योजनाओं को लेकर है, वहीं चीन की भविष्य की रणनीति को लेकर भी है। अगर सैन्य शासकों पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए तो ये चीन के पाले में जा सकते हैं। जबकि आंग सान सू की ने भारत और चीन दोनों के साथ रिश्तों को संतुलित किया था। चीन-म्यांमा आर्थिक गलियारा भारत के लिए पहले से ही चिंता का विषय बना हुआ है। चीन इस गलियारे के माध्यम से सीधे बंगाल की खाड़ी में पहुंचेगा। रखाइन राज्य के क्याकप्यू बंदरगाह को विकसित करने के पीछे चीनी मंशा साफ है। वह इस बंदरगाह को भारत की पूर्वी सीमा का ग्वादर बनाना चाहता है।

सैन्य शासन के कारण म्यांमा से भागे रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या और बढ़ेगी। इससे बांग्लादेश की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि रखाइन प्रांत से भागे लाखों रोहिंग्या शरणार्थियों ने बांग्लादेश में शरण ले रखी है। दरअसल, रोहिंग्या मुसलमानों को शरणार्थी बनाने में म्यांमा की सेना की अहम भूमिका है, जिनके दमन ने उन्हें रखाइन से भागने के लिए मजबूर किया।

रखाइन प्रांत के संसाधनों पर कई वैश्विक कंपनियों के साथ-साथ म्यांमा की सेना से जुड़ी कंपनियों की भी नजर है। इसी कारण इस प्रांत में सेना और रोहिंग्या समुदाय के बीच संघर्ष हुआ। ऐसे में बदले हालात में बांग्लादेश को रोहिंग्या शरणार्थियों का बोझ लंबे समय तक उठाना पड़ेगा। इनकी वापसी के लिए म्यांमा के सैन्य शासक जल्द तैयार नहीं होंगे। हालांकि म्यांमा के तख्ता पलट पर बांग्लादेश ने भी यही कहा कि वह म्यांमा में स्थिरता चाहता है, ताकि रोहिंग्या शरणार्थियों की आराम से वापसी हो सके।

म्यांमा की घरेलू राजनीति ने तख्ता पलट में अहम भूमिका निभाई है। इसमें कोई शक नहीं है कि म्यांमा में सेना के खासे कारोबारी हित हैं। दरअसल, म्यांमा की सेना भी पाकिस्तानी सेना की तरह कई व्यवसाय करती है। व्यवसाय के लिए उसने कंपनियां बना रखी हैं और इनके प्रबंधन में वरिष्ठ सैन्य अधिकारी शामिल हैं।

सेना की व्यावसायिक प्रवृत्ति ने देश में संसाधनों की लूट को बढ़ाया है। नागरिकों के दमन का यही बड़ा कारण है। दरअसल, सेना और चुनी हुई सरकार के बीच टकराव का एक कारण म्यांमा इकोऩॉमिक होल्डिंग लिमिटेड और म्यांमा इकोनॉमिक कॉरपोरेशन रहे हैं। इन दोनों प्रतिष्ठानों पर सैन्य अधिकारियों का नियंत्रण है।

इन दोनों कंपनियों की सौ से ज्यादा सहायक कंपनियां भी हैं, जिनमें वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के व्यक्तिगत आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। दोनों कंपनियों का देश के बैकिंग कारोबार से लेकर दूरसंचार क्षेत्र तक पर कब्जा है। उत्पादन के क्षेत्र में इनके पास चालीस से ज्यादा फैक्ट्रियां हैं, जिनमें सीमेंट, चीनी से लेकर खाद्य तेल जैसी जरूरी वस्तुओं का उत्पादन होता है।

भवन निर्माण के क्षेत्र में भी इन कंपनियों का दखल है। सेना के संरक्षण में ये कंपनियां खनन क्षेत्र में भी कारोबार कर रही हैं। कोयला और गैस के क्षेत्र में इन कंपनियों का दखल है। कुछ बहुमूल्य पत्थरों का खनन और तस्करी का आरोप भी इन कंपनियों पर लगता रहा है।

पिछले कुछ समय से सू की की सरकार सेना के कारोबार में पारदर्शिता का दबाव बना रही थी। लेकिन सेना की ये कंपनियां सरकार को राजस्व देने को तैयार नहीं थीं। देश के संसाधनों का अवैध दोहन और राजस्व की वसूली में विफल रहने पर लोकतांत्रिक सरकार और सेना के बीच टकराव लाजमी था।

दोनों कंपनियों ने 1998 से लेकर 2011 तक सरकार को न तो कोई आयकर दिया था, न ही वाणिज्य कर दिया था। चुनी हुई सरकार के कार्यकाल के दौरान भी सेना के संरक्षण में कंपनियों का कारोबार धड़ल्ले से चलता रहा। इस बीच अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की तरफ से सैन्य कारोबार को पारदर्शी बनाने के लिए दबाव बढ़ता गया। उसका परिणाम अब सामने आया है। लोकतांत्रिक नेताओं को एक बार फिर सत्ता से बाहर कर दिया गया है। अब देखना होगा कि वैश्विक संस्थाएं म्यांमा की इस घटना पर किस तरह से अपनी कार्रवाई को अंजाम देती हैं।

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