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गरीबी का गहराता संकट

भारत दुनिया के सबसे ज्यादा आर्थिक असमानता वाले देशों में एक है, जहां अमीर तेजी से और अमीर हो रहे हैं और गरीब की हालत और बिगड़ती जा रही है। महामारी से बचाव के लिए किए गए कुछ उपायों ने असमानता की खाई को कई गुना बढ़ा दिया।

Author Updated: February 22, 2021 3:55 AM
povertyप्रतीकात्‍म फोटो।

सुविज्ञा जैन

हर सभ्य देश निर्विवाद रूप से लोकतंत्र का पक्षधर है। दुनियाभर के विद्वानों में इस बात को लेकर कोई मतभेद नहीं है कि हर नागरिक को विकास के समान अवसर देने वाली व्यवस्था का नाम ही लोकतंत्र है। इसे लेकर भी ज्यादा विवाद नहीं है कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैधानिक रूप से सभी नागरिकों को ज्यादा से ज्यादा बराबरी पर लाकर ही लोकतंत्र का लक्ष्य हासिल हो पाता है।

इधर, विद्वानों के बीच इस बात पर भी सहमति बन चली है कि अगर आर्थिक समानता को साध लिया जाए तो सामाजिक, राजनीतिक और वैधानिक समानता खुद ब खुद सध जाती है। इसीलिए हर देश का शासन यह मान कर चलता है कि अगर उसने सभी नागरिकों के बीच अर्थ यानी धन का सम-वितरण कर दिया तो वह सफल है। लेकिन दुनिया में अभी तक ऐसी कोई विश्वसनीय व्यवस्था बन नहीं पाई है जिससे यह जाना जा सके कि दुनिया में आर्थिक विषमताओं को कम करने के लिए कौनसा देश क्या कर पा रहा है?

फिर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई मंच हैं जहां दुनिया के आर्थिक हालात पर नियमित सोच-विचार चलता रहता है। ऐसा ही बड़ा मंच है वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम यानी विश्व आर्थिक मंच। यह मंच हर साल स्विटजरलैंड के दावोस शहर में अपने सदस्य देशों का सम्मेलन आयोजित करता है और कई बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी इसमें शिरकत करते हैं। पिछले महीने आयोजित इस सम्मेलन में हालांकि इस बार सोच- विचार की वैसी समीक्षा नहीं हुई जैसी हर साल हुआ करती थी। गौरतलब है कि गुजरे साल महामारी से बचाव के लिए पूर्णबंदी जैसे सख्त और अपरिहार्य कदम के कारण दुनिया आर्थिक संकट से गुजरी है। पूर्णबंदी ने उन देशों की अर्थव्यवस्था के हर छोटे-बड़े पहलू पर असर डाला है और इसीलिए इस साल विश्व आर्थिक मंच की बैठक के सात सूत्री एजंडे में महामारी और उससे उपजे आर्थिक हालत ही प्रमुख मुद्दे रहे।

दुनिया के ज्यादातर देशों में आर्थिक वृद्धि दर में भारी गिरावट आई है। ऐसा होना लाजिमी भी था, क्योंकि काम-धंधे महीनों तक बंद रहे। इन हालात का आकलन करते हुए आॅक्सफैम ने अपनी रिपोर्ट आर्थिक मंच की बैठक में रखी। कोरोना के कहर के बीच एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखी इस रिपोर्ट में आर्थिक विषमता को एक विषाणु कह कर संबोधित किया गया। वैसे तो आय असमानता की रिपोर्टें आॅक्सफैम पहले भी जारी करती रहा है, लेकिन इस साल की इसकी रिपोर्ट भारत के लिए कुछ ज्यादा ही चौकाने वाली रही। दावोस सम्मेलन के पहले ही दिन पेश की गई इस रिपोर्ट में आकलन यह है कि भारत दुनिया के सबसे ज्यादा आर्थिक असमानता वाले देशों में एक है,

जहां अमीर तेजी से और अमीर हो रहे हैं और गरीब की हालत और बिगड़ती जा रही है। महामारी से बचाव के लिए किए गए कुछ उपायों ने असमानता की खाई को कई गुना बढ़ा दिया। निष्कर्ष यह निकला है कि पूर्णबंदी की वजह से जहां हर गरीब के काम-धंधे धीमे पड़ गए, वहीं भारतीय अरबपतियों की धन संपत्ति में इस दौरान पैंतीस फीसद का इजाफा हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पूर्णबंदी के बाद शीर्ष एक सौ अरबपतियों की धन संपत्ति में बारह लाख सनतानवे हजार आठ सौ करोड़ रूपए की बढ़ोतरी और हो गई।

हिसाब लगाकर बताया गया यह आंकड़ा इतना बड़ा है जिससे भारत की एक सौ अड़तीस करोड़ की आबादी में हर एक व्यक्ति को चौरानवे हजार रुपए दिए जा सकते हैं। इसी बात को और जोर देकर बताने के लिए एक और हिसाब यह है कि महामारी के दौरान भारत के सबसे अमीर ग्यारह अरबपतियों की पूंजी में हुए इजाफे वाली रकम से ग्रामीण रोजगार की सरकारी योजना यानी मनरेगा को दस साल तक चलाए रखा जा सकता है।

रिपोर्ट में जो कुछ बताया गया, उसका आशय यह है कि पूर्णबंदी के कारण भारत में अमीर तबका खुद को तो आर्थिक नुकसान से बचा ले गया, लेकिन गरीबों के हिस्से में बेरोजगारी, भूख और मौतें आईं। आॅक्सफैम ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) के आंकड़ों का हवाला देते हुए फोरम पर बताया कि भारत में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली लगभग नब्बे फीसद आबादी में कमोबेश चालीस फीसद लोगों पर और गहरी गरीबी में चले जाने का खतरा खड़ा है।

इस दौरान करीब बारह करोड़ बीस लाख लोगों का रोजगार चला गया और रोजगार खोने वालों में पचहत्तर फीसद लोग भारत के असंगठित क्षेत्र के हैं। इतना ही नहीं, अमीर तबके को छोड़ कर लगभग हर भारतीय घर की आय में महामारी के दौरान कमी आई। पिछले साल अप्रेल महीने में चौरासी फीसद घरों की आमदनी घटी, यानी हर दस में से आठ घरों की आय में कमी आई। आमदनी इस हद तक घटी कि निम्न आय वाले तबके के छियालीस फीसद गरीबों को कर्ज़ लेकर अपना गुजारा करना पड़ा। इस रिपोर्ट में यहां तक कहा गया है कि आजादी के बाद भारतीय आबादी में जो आर्थिक असमानता कम हुई थी, वह आज फिर उसी स्तर पर पहुंचती दिख रही है जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था।

गौर इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि रिपोर्ट में जो आंकडे और सुझाव दिए गए हैं, वे किसी न किसी विशेषज्ञ समूह या संस्थाओं ने पहले से दे रखे थे। मसलन एक करोड़ से ज्यादा सालाना आमदनी वालों पर आय कर चालीस फीसद तक बढ़ा कर जुटाई रकम को आर्थिक पैकेज में लगाने का सुझाव आइआरएस ऐसोसिएशन ने दिया था। इसी आधार पर हिसाब लगाया कि महामारी के दौरान अमीरों की आमदनी जितनी बढ़ी है, उतनी रकम से पांच महीने तक चालीस करोड़ असंगठित क्षेत्र के कामगारों को गरीबी से उबारा जा सकता है।

उसी रिपोर्ट में एक सुझाव यह था कि जिनकी कर योग्य आमदनी दस लाख रुपए सालाना से ज्यादा है, उन पर चार फीसद उपकर यानी सेस लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों की बनाई इस रिपोर्ट में बताया गया था कि अगर देश के सबसे ज्यादा अमीरों में से नौ सौ चौवन पूंजीधारियों पर सिर्फ चार फीसद का संपदा कर लगा दिया जाए तो देश की कुल जीडीपी की एक फीसद के बराबर रकम हासिल की जा सकती है और उस रकम को महामारी के कारण गरीब हुए लोगों पर खर्च किया जा सकता है।

नजर तो इस बात पर भी डालनी पड़ेगी कि इस समय दुनिया के तमाम देशों की सरकारें अपने राजस्व बढ़ोतरी के लिए अधिक से अधिक आबादी को कर के दायरे में लाने की बात करने लगी हैं। अमीरों की जगह आम आबादी को शामिल कर के कर दायरा बढाने के पक्ष में एक तर्क यह दिया जाता है कि सिर्फ गिने-चुने अमीर लोगों से आखिर कितना कर मिल जाएगा?

लेकिन विश्व आर्थिक मंच पर रखी रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर भारत के ग्यारह सबसे अमीर खरबपतियों की एक साल में बढ़ी आमदनी पर सिर्फ एक फीसद टैक्स ले लिया जाए तो वह रकम देश की जन औषधि योजना पर कुल खर्च से भी एक सौ चालीस गुनी बैठती है, यानी इन अमीरों पर सिर्फ एक फीसद टैक्स लगा कर गरीबों को दवाइयां देने वाली योजना जैसी एक सौ चालीस नई योजनाएं शुरू की जा सकती हैं।

आर्थिक विषमता की खाई पाटने वाली योजनाओं पर खर्च करने के लिए धन का प्रबंध बजट के बाद भी किया जा सकता है। पिछले साल यानी 2020 में आम बजट के बाद पैकेज रूपी पांच मिनी बजट लाए गए थे। अगर छोटे से धनवान तबके से न्यायोचित मात्रा में धन लेकर बहुत बड़े गरीब तबके तक पहुंचाने की योजनाएं बन सकती हों तो इसे आर्थिक विषमता की खाई पाटने की दिशा में एक कारगर कदम ही माना जाएगा।

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