स्कूल तो हैं पर शिक्षक नहीं

एक लाख स्कूलों में केवल एक शिक्षक और ग्यारह लाख शिक्षकों के पदों का रिक्त होना देश में ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शर्मनाक माना जाना चाहिए।

सांकेतिक फोटो।

एक लाख स्कूलों में केवल एक शिक्षक और ग्यारह लाख शिक्षकों के पदों का रिक्त होना देश में ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शर्मनाक माना जाना चाहिए। भारत आज इतना संसाधान-विहीन देश तो नहीं है कि वह बच्चों के लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था न कर सके।

यूनेस्को ने एक बार फिर भारत में शिक्षा की स्थिति और शिक्षकों की कमी को लेकर चिंता जताई है। यह कमी इतने वर्षों से चल रही है कि जब-जब ऐसे सर्वेक्षण या विश्लेषण देश के समक्ष आते हैं तो उसमें कोई नई बात नहीं लगती। किसी भी व्यवस्था की गतिशीलता जब शिथिल हो जाती है, तब उसकी बड़ी से बड़ी कमी और कमजोरी का भी सामान्यीकरण हो जाता है और उसे अलभ्य लक्ष्य के रूप में अलिखित ढंग से स्वीकार कर लिया जाता है। शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में है। स्कूलों और राज्य के विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति का उत्तरदायित्व राज्य सरकारों का है। केंद्र सरकार या उसके द्वारा स्थापित केंद्रीय नियामक संस्थाएं केवल आवश्यक दिशानिर्देश दे सकती हैं, पर उन पर अमल करना संघीय व्यवस्था में राज्य का अधिकार है, केंद्र इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

स्वतंत्रता के बाद देश में शिक्षा का जितना प्रचार-प्रसार हुआ है, उसे कठिन परिस्थितियों में प्राप्त की गई बड़ी उपलब्धि माना जाना चाहिए। आज ऐसा कोई वर्ग नहीं है जो अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में न पढ़ाना चाहता हो! लेकिन दुर्भाग्य से व्यवस्था उसका साथ देने में कमजोर पड़ गई है। व्यवस्था की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा दुष्परिणाम सरकारी स्कूलों की घटती साख है। यह देश की बौद्धिक संपदा की वृद्धि में बड़ा रोड़ा है। इक्कीसवीं सदी में कोई भी सभ्य और सतर्क देश अपने पचास प्रतिशत से अधिक बच्चों को व्यक्तित्व-विकास के अवसरों से वंचित रख कर प्रगति नहीं कर सकता है।

जिन स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात उचित नहीं होगा, वहां से बच्चे केवल प्रमाणपत्र ही प्राप्त करते हैं और आवश्यक ज्ञान, कौशल तथा व्यक्तित्व विकास से वंचित रह जाते हैं। एक लाख स्कूलों में केवल एक शिक्षक और ग्यारह लाख शिक्षकों के पदों रिक्त होना देश में ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शर्मनाक माना जाना चाहिए। भारत आज इतना संसाधान-विहीन देश तो नहीं है कि वह बच्चों के लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था न कर सके।
शिक्षकों की कमी की समस्या की जड़ें काफी गहरी हैं। इसके लिए कौन और कितना जिम्मेवार है, यह कोई छिपा तथ्य नहीं है। इलाहबाद उच्च न्यायालय ने 19 अगस्त, 2015 को एक आदेश में कहा था कि उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव अगले छह महीने में योजना तैयार करें कि कैसे सरकारी खजाने से वेतन लेने वाले हर व्यक्ति के बच्चे केवल सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे! सभी जानते थे कि ऐसा होगा नहीं, क्योंकि एकजुट होकर संभ्रांत और सरकारी व्यवस्था इसे होने नहीं देगी! और ऐसा ही हुआ। यही वर्ग सरकारी स्कूलों की मौजूदा स्थिति, साख की कमी और सामान्य-जन के अविश्वास के लिए पूरी तरह उत्तरदायी है। जब संभ्रांत वर्ग के बच्चों के लिए निजी स्कूल उपलब्ध हैं और वहां पढ़ाने के लिए शिक्षा-भत्तों के प्रावधान उपलब्ध हैं, तो फिर यह वर्ग सरकारी स्कूलों की फिक्र क्यों करेगा!

नई शिक्षा नीति-2020 के क्रियान्वयन के समय इस सच्चाई को स्वीकार करना सभी के और देश के हित में होगा। नई शिक्षा नीति विश्वास दिलाती है कि हर बच्चे को ऐसे स्कूल में शिक्षा मिलेगी जहां बुनियादी सुविधाएं होंगी, उचित छात्र-शिक्षक अनुपात में पूर्णकालिक, नियमित और प्रशिक्षित शिक्षक होंगे। वस्तुस्थिति यह है कि पिछले चार दशक से कई राज्यों ने नियमित पूर्णकालिक शिक्षकों की जगह विभिन्न पदनामों से अंशकालिक-अनियमित शिक्षक थोड़े से मानदेय पर नियुक्त करने का चलन बना लिया। इससे नियमित शिक्षकों के सेवानिवृत होने के साथ नियमित पद खाली होते गए। नौकरशाही को यह व्यवस्था बहुत रास आई। जब कोई देश शिक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील विषय पर फैसले केवल नौकरशाहों पर छोड़ देता है तब ऐसी घातक परिस्थितियां पैदा होती हैं। देश में धीरे-धीरे शैक्षिक और अकादमिक नेतृत्व के स्थान पर सिविल सेवा के अधिकारी स्कूल बोर्ड, पाठ्यपुस्तक बोर्डों, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) जैसी संस्थाओं में शीर्ष पदों पर सुशोभित होने लगे। यह क्यों होता गया, इसे जानना बहुत जरूरी है। क्या भारत की सिविल सेवा यह जिम्मेदारी स्वीकार करेगी कि आज जो विसंगतियां शिक्षकों की नियुक्तियों को लेकर उत्पन्न हुई हैं, उसकी जिम्मेवारी केवल उसकी और उसकी ही है?

शिक्षकों कि नियुक्ति, पदस्थापना और प्रशिक्षण को लेकर अनेक समस्याएं समय-समय पर ध्यान आकर्षित करती रही हैं। सन 1986 में बनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करते वक्त यह तय हुआ था कि देश में कोई भी ऐसा स्कूल नहीं होगा जिसमें कम से कम दो शिक्षक न हों। ‘आपरेशन ब्लैकबोर्ड’ नाम की परियोजना के अंतर्गत केंद्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों से आंकड़े मांगे और उसके आधार पर लगभग साढ़े पांच लाख प्राथमिक विद्यालयों को भवन निर्माण, शिक्षण सामग्री आदि के साथ एक लाख चौंतीस हजार शिक्षकों की नियुक्ति के लिए धनराशि मुहैया कराई। पैसा तो केंद्र का था, मगर सारे काम तो राज्य सरकारों को ही करने थे, जिनमें शिक्षकों की नियुक्ति, विद्यालयों में कमरे बनवाना, शिक्षण सामग्री की खरीद जैसे काम शामिल थे। पर कुछ वर्ष बाद अधिकांश राज्यों को जांच समितियां बनाने को मजबूर होना पड़ा और सारी परियोजनाएं लक्ष्यों से दूर होती चली गर्इं। उदाहरण के तौर पर, मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ ब्लाक में शिक्षकों के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में चर्चा के दौरान जब यह जानने की कोशिश की गई कि कि ‘सेकंड टीचर’ की नियुक्ति से ग्रामीण स्कूलों में कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ा, तो पता चला कि ऐसे शिक्षकों को शहरों में ही नियुक्त कर दिया। यानी कागजों में दो सौ आठ स्कूलों में दो शिक्षक थे, मगर वास्तव में वे वहां नहीं थे जहां उनकी आवश्यकता थी! उनका वेतन उस स्कूल से मिला दिखाया जाता था जिसमें वे शायद कभी गए ही नहीं थे।

आज संचार तकनीक ने पर्यवेक्षण में अनेक सार्थक सुधार कर दिए हैं। अब वह सब संभव हो गया है जो पहले जानना और सुधारना कठिन था। लेकिन आज भी किसी स्कूल का ठीक से चलना अधिकारियों की ईमानदारी, कर्तव्य-निष्ठा और समर्पण के परिमाण पर ही निर्भर करता है। जन-प्रतिनिधि यदि अपने क्षेत्र में शिक्षा को प्राथमिकता दें तो प्रशिक्षित और नियमित शिक्षकों की उपस्थिति हर स्कूल में निश्चित की जा सकती है। हर स्तर पर शिक्षकों की कमी से पूरी पीढ़ी प्रभावित होती है, लेकिन सबसे अधिक गांधी जी द्वारा इंगित ‘अंतिम पंक्ति’ में खड़े परिवार और उनके बच्चे प्रभावित होते हैं। यह ऐसा तथ्य है जो चर्चा में आना चाहिए और जिस पर विधान सभाओं और संसद में दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर बहस होनी चाहिए। यह ऐसी कमी है जो सामाजिक सुधार में देरी लाती है और सामजिक सद्भाव बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की गति को कुंद कर देती है। इससे समानता के अवसर प्रदान करने के संवैधानिक आश्वासन का उल्लंघन होता है, जो यही इंगित करता है कि हम स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान निर्माताओं को वह सम्मान नहीं दे पा रहे हैं जिसके वे हकदार हैं।

भारत के पुनर्निर्माण का सपना देखने वाले मनीषियों का सपना था कि शिक्षा के प्रकाश से भारत में सुनहरी सुबह लाई जा सकेगी और उसके लिए हर भारतवासी को समुचित अवसर प्रदान करने का कोई अन्य विकल्प है ही नहीं। इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण संविधान में निहित वह प्रावधान है जिसमें राज्य यानी सरकार से यह अपेक्षा की गई थी कि चौदह वर्ष तक के हर बच्चे के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करना उसका उत्तरदायित्व होगा। यदि सरकारें यह उत्तरदायित्व पूरी तरह निभातीं, समान स्कूल व्यवस्था को लागू करतीं, स्कूलों में समरूपता लातीं और शिक्षा में व्यापारीकरण को बढ़ावा न देतीं तो आज सरकारी स्कूलों की साख कहीं उच्च स्तर पर होती।

पढें राजनीति समाचार (Politics News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट