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ग्रीष्म लहर की चुनौती

अगर तापमान में आधा डिग्री का इजाफा होता है तो लू का प्रतिकूल प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक पृथ्वी का तापमान एक डिग्री बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सन 2040 तक यह डेढ़ डिग्री तक बढ़ जाएगा। इससे उन देशों की स्थिति ज्यादा गंभीर होती जा रही है जिनकी ज्यादातर आबादी खेती या मजदूरी करती है। भारत इसी श्रेणी में है।

Draughtसुखार के कारण पानी के लिए मचा हाहाकार। फाइल फोटो।

सुविज्ञा जैन

दुनिया आपदाओं के नाजुक दौर से गुजर रही है। महामारी और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर तो हम पहले से जूझ ही रहे हैं। अब नया अंदेशा इस साल पड़ने वाली भीषण गर्मी से मचने वाली तबाही को लेकर खड़ा हो गया है। वैसे तो यह खतरा पूरी दुनिया के सामने है, लेकिन अपने देश के लिए यह ज्यादा चिंता की बात इसलिए है कि हम कृषि प्रधान देश हैं। कुछ वर्षों से हम साल दर साल पानी की किल्लत से भी बुरी तरह जूझ रहे हैं।

इसीलिए विश्वस्तर पर हुए शोध-सर्वेक्षणों में तापमान बढ़ने को लेकर भारत को भी आगाह किया गया है। तीव्र गर्मी का अंदेशा अचानक पैदा नहीं हुआ। पिछले दो दशकों से वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को लेकर आगाह कर रहे हैं कि बेजा औद्योगिक हरकतों के कारण बढ़ते कार्बन उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इससे नई-नई आपदाएं पैदा हो रही हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जल स्तर बढना उन्ही संकटों में एक है। पृथ्वी के बढ़ते तापमान ने मौसम की कुदरती चाल गड़बड़ा दी है। विश्वसनीय शोध निष्कर्ष हैं कि गर्मियां लंबी होने लगी हैं और मानसून चक्र बिगड़ने लगा है।

बढ़ते तापमान या हर साल बढ़ती लू के दौरों की संख्या का सीधा संबंध लू से मरने वालों की तादाद से भी है। भारत में 2015 में गर्मी की लपट से दो हजार मौतें हो गई थीं। वैसे पिछले दो दशकों में गरम हवाओं से हर साल सैंकड़ों मौतें होती रही हैं। यानी अब जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न संकट दस्तक दे चुका है। दरअसल, भारत की चिंता हाल में आई एक रिपोर्ट ने बढ़ाई है। अमेरिका की ओक रिज लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने एक शोध पत्र में इस साल भारत के कई इलाकों में गंभीर लू की आशंका जताई है।

इसमें कहा गया है कि भारत के कई प्रमुख कृषि आधारित राज्यों में लू के कारण मजदूरी और खेती का काम करना बहुत मुश्किल हो सकता है। रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के साथ मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता जैसे बड़े शहरों के नाम भी शामिल हैं जहां इस बार की गर्मियों में तेज लू का सामना करना पड़ सकता है। अब तक के शोधों के मुताबिक सिर्फ दो डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने से नागरिकों पर स्वास्थ्य के खतरे तीन गुना बढ़ जाते हैं। इसीलिए नए शोध में वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिण एशियाई देशों के लिए आगे के हालात अच्छे नहीं हैं। लिहाजा अगर हालात को बदतर होने से रोकना है तो पृथ्वी का तापमान कम रखने के उपाय करने के अलावा कोई और चारा है नहीं।

मानव शरीर पर गर्मी का सीधा असर देखें तो ज्यादा तापमान में बने रहने से शरीर को ठंडा रखने का कुदरती तंत्र गड़बड़ा जाता है। स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। अगर मौजूदा महामारी के लिहाज से देखें तो चिकित्साशास्त्रियों ने पाया है कि लू से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घटती है। इसीलिए गंभीर रोगों से ग्रस्त लोगों को लू से बचा कर रखने की जरूरत पड़ती है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) में दर्ज प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली मौतों के कारणों में तीसरे नंबर पर लू ही है।

जाहिर है, अगर जबर्दस्त लू का अंदेशा जताया जा रहा है तो हमें अपने संवेदनशील नागरिकों के बचाव की तैयारियां पहले से करके रखने में लग जाना चाहिए। एक बड़े अंदेशे के मद्देनजर इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि भारत का लगभग आधा भू-भाग मार्च से लेकर जून तक के अंतराल में गरम हवा के थपेड़े झेलता है। कभी कभी यह दौर जुलाई तक भी खिंच जाता है। उत्तर भारत में हर साल औसतन पांच से छह लू के दौर आते हैं। कई बार लू की मियाद एक हफ्ते तक खिंच जाती है। गौरतलब यह भी है कि भारत में लू मई के महीने में चरम पर होती है।

बेशक पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों के अपने-अपने भूगोल हैं। सर्दी और गर्मी की असामान्य तीव्रता के पैमाने भी अलग हैं। इसीलिए इस सिलसिले में हमें भारतीय परिस्थितियों पर लगातार नजर रखने की जरूरत पड़ने वाली है। इस बारे में भारतीय मौसम विभाग के पैमानों के अनुसार अगर मैदानी इलाकों का अधिकतम तापमान चालीस डिग्री सेल्सियस तक और पहाड़ी क्षेत्रों में तीस डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तो लू चल पड़ती है। वहीं समुद्र के किनारे वाले क्षेत्रों में जब अधिकतम तापमान सैंतीस डिग्री सेल्सियस पहुंच जाए तो लू बन जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आज के हालात में अगर तापमान में आधा डिग्री का इजाफा होता है तो लू का प्रतिकूल प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक पृथ्वी का तापमान एक डिग्री बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सन 2040 तक यह डेढ़ डिग्री तक बढ़ जाएगा। इससे उन देशों की स्थिति ज्यादा गंभीर होती जा रही है जिनकी ज्यादातर आबादी खेती या मजदूरी करती है। भारत इसी श्रेणी में है। इसीलिए नई रिपोर्ट में दक्षिण एशियाई देशों को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट में इस तरफ भी घ्यान दिलाया गया है कि इन देशों के शहरों में बहुत कम लोगों तक एअर कंडीशनिंग जैसी सुविधाएं पहुंच पाई हैं। इन इलाकों में रह रही साठ फीसद आबादी खेती और मजदूरी में ही लगी है। उसके पास लू से बचाव का कोई विकल्प नहीं है।

भारत में पिछले कुछ साल में हुए जलवायु संबंधी कुछ अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने पाया है कि पिछले चार दशकों में लू लगातार बढ़ी है। सबसे बड़ी बढ़ोतरी इस सदी के पहले दशक खासतौर पर 2002 से 2012 के दौरान दर्ज की गई। देश के दक्षिणी और पश्चिमी इलाकों में अधिकतम तापमान वाले दिनों की संख्या भी बढ़ी है। इसी सिलसिले में भारतीय प्रबंधन संस्थान, अमदाबाद ने 2015 में एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन किया था।

उस अध्ययन से निकल कर आया था कि तीन डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने से संबंधित मौतों का आंकड़ा सत्तर फीसद बढ़ सकता है और सदी के अंत तक छह फीसद ताप बढ़ने से मौतों की दर एक सौ चालीस फीसद बढ़ने का अंदेशा है। ये आंकड़े निकट भविष्य में एक बड़ी आपदा की ओर इशारा कर रहे थे। हाल ही में आई नई रिपोर्ट पर गौर करें तो यह संकट वक्त से पहले ही आता नजर आ रहा है।

हमें यह मान लेने में संकोच नहीं करना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन की समस्या को लेकर देश में सजगता अब भी कोई बहुत ज्यादा नहीं है। लगता है कि इसे हम अभी भी दूर की बात मान कर चल रहे हैं। ऐसा कहने का आधार यह है कि पिछले एक दशक में लू से हजारों मौतों के बावजूद अभी भी लू को राष्ट्रीय आपदा का दर्जा नहीं दिया गया है।

सरकारी स्तर पर इसे सूखे के ही एक हिस्से के रूप में देखा जाता है। यह अच्छी बात है कि कई वायुमंडलीय विशेषज्ञ इस समय लू संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए नीतिगत ढांचा बनाने का सुझाव दे रहे हैं। भारतीय मौसम विभाग ने साल 2016 से गर्मी के पूवार्नुमान की सीमा बढ़ाई थी। उसी व्यवस्था के तहत मौसम विभाग अब चार हफ्तों की स्थिति की चेतावनी जारी करता है। लेकिन संकट आता देख जरूरत इस बात की है कि लू को आपदा का दर्जा दिया जाए और आपदा प्रबंधन के नुक्तों के लिहाज से कार्य योजना बनना शुरू हो।

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