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गहराते संकट और समाज

आधुनिक समाज में व्यक्ति अपने निजी जीवन में संस्कृति, मूल्यों, परंपराओं इत्यादि से भयभीत रहने लगा है। पूंजीवाद के विस्तार ने उसमें भयभीत होने की आदत डाल दी है। इसलिए न तो वह अपने सार्वजनिक जीवन में संघर्षों का प्रभावी मुकाबला कर पा रहा है, न ही अपने निजी जीवन में स्वतंत्र निर्णय ले पा रहा है।

Coronavirus Test, COVID-19, National Newsकोरोना के बढ़ते मामलों के बीच रेलवे स्टेशन पर एक महिला का स्वाब सैंपल लेते हुए हेल्थ वर्कर। (फोटोः पीटीआई)

ज्योति सिडाना

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को वहां का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश व्यापक रूप से प्रभावित करता है। आज के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। महामारी ने पिछले डेढ़ वर्ष से सारे विश्व में तबाही मचा रखी है। ऐसे में जब विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा गई हैं तो भारत जैसे विकासशील और अन्य गरीब देशों की अर्थव्यवस्थाओं का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल नहीं है।

इसमें भी निम्न आय वर्ग और मध्यम आय वर्ग के जीवन पर जो असर पड़ा है, वह इन देशों को और गरीबी में धकेलने वाला साबित होगा। दरअसल, कोरोना के कारण देश के ज्यादातर राज्यों में लगभग पूर्णबंदी जैसे हालात हैं। हर तरह के कामकाज और कारोबार पर इसका प्रभाव अब नजर आने लगा है। घरेलू आपूर्ति और मांग प्रभावित होने से आर्थिक वृद्धि दर का प्रभावित होना स्वाभाविक है। फिर से लोगों की आजीविका पर असर पड़ने लगा है। बेरोजगारी तो पहले ही से चरम पर है। ऐसे में लोगों के की आय के रास्ते फिर से बंद हो रहे हैं। इसका असर बाजार में वस्तुओं की मांग पर पड़ रहा है। मांग घटने से उत्पादन में भी कमी आना स्वाभाविक है। यानी हम एक बार फिर से उसी संकट की ओर बढ़ रहे हैं जिससे पिछले साल रूबरू हो चुके हैं।

ऐसा नहीं है कि इस महामारी से निपटने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे, परंतु इन्हें पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। इस दिशा में जल्दी ही काफी कुछ करने की आवश्यकता है। स्थानीय स्तर पर अस्थायी रोजगार सृजन करने पर ध्यान देना होगा। विश्व बैंक के अनुसार महामारी के कारण भारत और अन्य विकासशील देश गरीबी के जाल में गहरे फंसते जाएंगे। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का कहना है कि कोरोना विषाणु सिर्फ एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट नहीं रहा, बल्कि ये श्रम बाजार के सामने भी बड़ा संकट बन कर उभरा है जो हर तबके के लोगों को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहा है।यही कारण है कि एक साल में बेरोजगारी ज्यादा बढ़ी है। उत्पादन गिरने के कारण मजदूरों का पलायन बढ़ा है। ये सब चीजें पटरी पर कब लौटेंगी, कुछ नहीं कहा जा सकता।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के अनुसार मार्च, 2021 में 7.62 करोड़ लोग नौकरी में थे, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 8.59 करोड़ थी। इस हिसाब से पिछले एक साल में 98 लाख नौकरी पेशा लोग बेरोजगार हुए थे। हालांकि यह आंकड़ा इससे ज्यादा भी हो सकता है। अगर गांवों की बात करें तो मार्च 2021 तक साठ लाख लोगों का काम-धंधा चौपट हो गया था। कोविड की दूसरी लहर पर काबू पाने के लिए पूर्णबंदी और कर्फ्यू जैसे कदमों से चालू महीने के पहले दो हफ्तों में ही बेरोजगारी दर बढ़ कर आठ फीसद से ज्यादा हो गई। श्रम भागीदारी घट कर चालीस फीसद रह गई।

आंकड़ों के मुताबिक 14 अप्रैल को बेरोजगारी दर 7.2 फीसद थी, जिसमें शहरी बेरोजगारी की दर 8.4 फीसद और ग्रामीण बेरोजगारी दर 6.6 फीसद थी। मार्च में बेरोजगारी दर 6.52 फीसद रही थी, जिसमें शहरी बेरोजगारी का आंकड़ा 7.24 फीसद और ग्रामीण बेरोजगारी का 6.17 फीसद था। आने वाले दिनों में इसका सर्वाधिक प्रभाव असंगठित क्षेत्र के बारह करोड़ कर्मचारियों पर पड़ेगा, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। अब समस्या यह है कि एक तरफ लोगों को नौकरियां जाने का डर है, तो दूसरी ओर बेरोजगारों को काम मिलने के आसार दूर-दूर तक नहीं हैं। यह स्थिति श्रम बाजार के सामने एक बड़ी चुनौती है।

विश्व बैंक का कहना है कि यदि भारत में फिर से पूर्णबंदी हुई और प्रतिबंध लंबे खिंच गए तो आर्थिक परिणाम विश्व बैंक के अनुमान से कहीं ज्यादा बुरे हो सकते हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए एक ही रास्ता है कि भारत सबसे पहले महामारी को फैलने से रोके। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सभी को भोजन, चिकित्सा और आर्थिक सुरक्षा मिल सके। क्योंकि इसका सबसे अधिक असर असंगठित क्षेत्र पर पड़ेगा और हमारी अर्थव्यवस्था का पचास फीसद जीडीपी इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में असंगठित क्षेत्र को नजरअंदाज करना भारी गलती होगी और इसके भयानक दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

अमेरिकी अर्थशास्त्री जेरेमी रिफकिन ने 1995 में अपनी पुस्तक ‘द एंड आॅफ वर्क’ में लिखा था कि सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार के कारण दुनिया भर में बेरोजगारी बढ़ेगी और इससे विनिर्माण, कृषि और सेवा क्षेत्रों में लाखों नौकरियां समाप्त हो जाएंगी। साथ ही शारीरिक श्रम से जुड़े रोजगार, खुदरा और थोक क्षेत्र की नौकरियों पर मशीनीकरण और रोबोटों के इस्तेमाल का विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। हालांकि कॉरपोरेट प्रबंधकों और ज्ञान श्रमिकों के एक छोटे से अभिजात वर्ग को उच्च तकनीकी विश्व अर्थव्यवस्था के लाभ प्राप्त हो सकते हैं, परंतु मध्य वर्ग सिकुड़ता रहेगा और कार्यस्थल भी अधिक तनावपूर्ण हो जाएगा। संभवत: यह कहा जा सकता है कि आज उनका यह तर्क मूर्त रूप लेता नजर आ रहा है। अंतर सिर्फ इतना है कि इसके लिए केवल तकनीक ही जिम्मेदार नहीं है, अपितु देश में रोजगार अवसरों और भविष्य के लिए दूरगामी नीतियों की भी कमी है।

जब युवा पीढ़ी रोजगार पाने में असमर्थ रहती है तो वह स्वयं को समाज के लिए अर्थहीन मानने लगती है। उसे लगने लगता है कि विकास प्रक्रिया में उसकी कोई सहभागिता नहीं है। परिणामस्वरुप वे निराशा, तनाव और स्वयं को समाप्त करने के फैसले की ओर अग्रसर होने लगते हैं। ऐसे में कल्याणकारी राष्ट्र की अवधारणा पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। देखा जाए तो आधुनिक समाज में व्यक्ति अपने निजी जीवन में संस्कृति, मूल्यों, परंपराओं इत्यादि से भयभीत रहने लगा है। पूंजीवाद के विस्तार ने उसमें भयभीत होने की आदत डाल दी है। इसलिए न तो वह अपने सार्वजनिक जीवन में संघर्षों का प्रभावी मुकाबला कर पा रहा है, न ही अपने निजी जीवन में स्वतंत्र निर्णय ले पा रहा है। इन पक्षों ने व्यक्ति को असुरक्षित, भयभीत और कहीं न कहीं हिंसा की वैधता का समर्थक बनाया है।

इस तरह के समाज को तनाव से भरे समाज (स्ट्रेस सोसाइटी) की संज्ञा दी जा सकती है, जहां हर कोई तनाव में है। कोई रोजगार न मिलने के कारण या नौकरी से हटा दिए जाने के कारण तनाव में है, तो कोई अपने परिजन को खोने के कारण, या फिर परीक्षा होने या न होने के कारण या फिर महामारी की चपेट में आ जाने के खौफ से त्रस्त है। ऐसे में राज्य, समाज और प्रशासन को इस दिशा में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।

पहले ही बहुत देर हो चुकी है। अब इन सब मुद्दों को केंद्र में लाने की जरूरत है। अकादमिक चिंतन और व्यापक विमर्श होना चाहिए, जिसमें सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित हो, तभी समाज में उत्पन्न भटकाव और असंतुलन को समाप्त किया जा सकता है। इस दिशा में शिक्षकों को भी दोहरी भूमि निभाने की आवश्यकता है।

पहली, वे अपने विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक, उदारवादी, समतामूलक व तनाव रहित व्यवहार प्रणाली का हिस्सा बनने में सहायता करें और दूसरा, विद्यार्थियों को अतीत, वर्तमान और भविष्य की समस्त विचारधाराओं की गहन समीक्षा व विश्लेषण करना सिखाएं। इन दोनों पक्षों की समग्रता से ही युवा वर्ग दूरदृष्टि से युक्त बन पाएगा और अपने व्यक्तित्व का समग्र विकास कर पाएगा। तभी उसमें उत्पन्न होने वाले नकारात्मक विचारों, क्रोध और तनाव को रोक पाना संभव होगा और नवाचार व सृजनशीलता को उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनाया जा सकेगा।

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