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रईसी की जीत और चुनौतियां

ईरान में सक्रिय कट्टरपंथी अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत के खिलाफ हैं। इन ताकतों ने अमेरिका से बातचीत के हर प्रयास का विरोध किया। परमाणु करार टूटने के बाद इनके दबाव में ही ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी तेज किया गया। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इब्राहिम रईसी की जीत में अमेरिकी प्रशासन का अप्रत्यक्ष योगदान है और निश्चित तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन को इसका परिणाम भी पता होगा।

ईरान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी। फाइल फोटो।

ईरान में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आ गए हैं। सत्ता अब अति रूढ़िवादी इब्राहिम रईसी के हाथ में होगी। वे देश के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई के करीबी हैं। हालांकि राष्ट्रपति चुनाव में ईरानी मतदाताओं की उदासीनता इस समय चर्चा का विषय है, लेकिन इससे भी बड़ी चिंता की बात राष्ट्रपति चुनाव में उदारवादी ईरानी नेताओं का हाशिये पर जाना है। इसे लेकर वैश्विक समुदाय में बेचैनी पैदा होना स्वाभाविक है। राष्ट्रपति चुनाव में उदारवादी नेता अब्दुल नासिर हेम्माती हार गए। इब्राहिम रईसी ईरान के पहले राष्ट्रपति होंगे, जिन पर पदभार संभालने से पहले अमेरिकी प्रतिबंध लगा है। उन पर मानवाधिकार उल्लंघन और राजनीतिक कैदियों को मौत की सजा देने जैसे आरोप हैं। रईसी ऐसे वक्त में राष्ट्रपति चुने गए हैं, जब एक बार फिर वियना में ईरान के साथ वैश्विक ताकतें परमाणु करार को लेकर बातचीत कर रही हैं।

इब्राहिम रईसी राष्ट्रपति का चुनाव तो जीत गए हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय माहौल उनके अनुकूल नहीं है। घरेलू और बाहरी मोर्चों पर उनके लिए बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। सबसे ज्यादा मुश्किल आर्थिक मोर्चे पर है। दरअसल, ईरान के सामने आ रही आर्थिक चुनौतियां संकट को और बढाने वाली हैं। इसका सीधा असर मध्य-पूर्व की भू-राजनीति पर पड़ेगा। लेकिन यह भी सच्चाई है कि खराब होती ईरान की आर्थिक स्थिति ने ही यहां कट्टरपंथियों की ताकत बढाई है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की आर्थिक हालत चरमरा चुकी है और यही एक बड़ी वजह है कि ईरान के उदारवादी नेता हाशिए पर चले गए। इसलिए इन हालात में सत्ता परिवर्तन के लिए सिर्फ ईरान को जिम्मेवार मानना गलत होगा।

पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी नीतियों ने ईरान में कट्टरपंथियों की ताकत को खूब बढ़ाया। डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति ने उदारवादी ईरानी नेताओं को कमजोर करके रख दिया। जबकि ये उदारवादी नेता अमेरिका सहित कई पश्चिम देशों से बातचीत के समर्थक रहे हैं। निवर्तमान राष्ट्रपति हसन रोहानी की सरकार उदारवादी धड़ों की सरकार मानी गई। रोहानी ने पश्चिमी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाने की कम कोशिशें नहीं की। रोहानी सरकार ने ईरान और छह वैश्विक ताकतों के बीच परमाणु समझौते को अंजाम दिया था। यही नहीं, उनकी सरकार ने 2015 में हुए परमाणु करार को बचाए रखने की भी पूरी कोशिश की। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने रोहानी की कोशिशों पर पानी फेर दिया। ट्रंप की ईरान नीति के सामने रोहानी बेबस होते जा रहे थे।

दरअसल, ट्रंप के कुछ सलाहकार जिनके सऊदी अरब और इजरायल में बड़े आर्थिक हित हैं, ईरान से बेहतर संबंध कतई नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने अमेरिका-ईरान के रिश्ते सामान्य होने ही नहीं दिए। इतना ही नहीं, वे अपनी योजनाओं में काफी सफल भी रहे। वर्ष 2018 में अमेरिका ने ईरान के साथ परमाणु करार को तोड़ दिया। जबकि परमाणु करार में शामिल अन्य देश डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले के खिलाफ थे। ये देश आज भी परमाणु करार बहाल करने के लिए प्रयासरत हैं। ट्रंप के इस फैसले ने ईरान की घरेलू राजनीति में उदारवादियों को कमजोर किया।

इस घटनाक्रम के बाद ईरान की घरेलू राजनीति में तनाव बढ़ने लगा। अमेरिका से बातचीत के समर्थक उदारवादी ईरानी नेताओं पर कट्टरपंथी ताकतों का हमला तेज हो गया। ईरान में सक्रिय कट्टरपंथी अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत के खिलाफ हैं। इन ताकतों ने अमेरिका से बातचीत के हर प्रयास का विरोध किया। परमाणु करार टूटने के बाद इनके दबाव में ही ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी तेज किया गया। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इब्राहिम रईसी की जीत में अमेरिकी प्रशासन का अप्रत्यक्ष योगदान है और निश्चित तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन को इसका परिणाम भी पता होगा। ईरानी कट्टरपंथी दिल से डोनाल्ड ट्रंप को धन्यवाद दे रहे होंगे, जिनके कारण उदारवादी हाशिए पर चले गए। हालांकि कट्टरपंथियों की जीत सऊदी अरब के राज परिवार के लिए अच्छी खबर नहीं है। इजरायल भी इसे लेकर परेशान है। क्योंकि रईसी की जीत से सबसे ज्यादा खुश सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद हैं। उन्होंने रईसी को तुरंत बधाई दी। हालांकि सऊदी अरब के सहयोगी संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान से रिश्तों को सुधारने के मद्देनजर रईसी की जीत का स्वागत किया।

ईरान में सक्रिय उदारवादी नेताओं का नजरिया रईसी को लेकर अच्छा नहीं है। 1979 की ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद कई चुनाव हुए। लेकिन सबसे कम मतदान इस बार हुआ। 2017 में हुए चुनाव के मुकाबले इस बार मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की भीड़ कम थी। पांच करोड़ नब्बे लाख मतदाताओं में से दो करोड़ नवासी लाख मतदाताओं ने ही मतदान किया। रईसी को एक करोड़ उनयासी लाख मत मिले हैं। मतदान प्रतिशत का कम होना बताता है कि ईरान में असंतोष बढ़ा है। मतदान में हिस्सा नहीं लेने वाले असंतुष्ट आबादी में शामिल हैं। हालांकि खामेनई और रईसी समर्थकों का दावा है कि कम मतदान प्रतिशत का प्रमुख कारण ईरान विरोधी क्षेत्रीय और पश्चिमी शक्तियों का ईरान के भीतर हस्तक्षेप है। कम मतदान प्रतिशत का एक कारण कोरोना भी बताया जा रहा है। लेकिन यह भी सच्चाई है कि कई ईरानी नेताओं ने राष्ट्रपति चुनाव के बहिष्कार की अपील भी की थी। निश्चित तौर पर इस अपील का भी असर मतदान पर पड़ा है।

ईरान लंबे समय से आर्थिक मोर्चे पर गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। कट्टरपंथियों की जीत के बाद ईरान पर अंतराष्ट्रीय दबाव और बढ़ सकता है। इससे आर्थिक हालात और बदतर हो सकते हैं। ईरान की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा स्रोत तेल कारोबार है, जो वर्षों से अमेरिकी प्रतिबंधों की मार झेल रहा है। पिछले एक साल में ही ईरान की अर्थव्यवस्था लगभग बारह फीसद सिकुड़ी है। यही नहीं, ईरानी रियाल का अवमूल्यन भी हुआ है। इस कारण ईरानी के व्यापारिक समुदाय का मनोबल कमजोर पड़ा है। फिर, अमेरिकी प्रतिबंधों का सीधा असर ईरान के मध्यवर्ग पर पड़ा है। यह तबका लगातार पश्चिम से बातचीत का पक्षधर रहा है। इसने ईरान में उदारवादी ताकतों का समर्थन किया।

लेकिन अमेरिकी प्रशासन की नीतियों ने इस उदारवादी मध्यवर्ग की ही कमर तोड़ दी। अमेरिकी प्रतिबंधों से यह वर्ग खासा प्रभावित हुआ है। वर्तमान में ईरानी मध्य वर्ग कुल आबादी का तीस फीसद रह गया है, जो पहले पैंतालीस फीसद से ज्यादा था। चिंता की दूसरी बात ईरान में बढ़ती गरीबी भी है। लगभग तीन करोड़ ईरानी गरीबी की चपेट में हैं। मध्यवर्ग का बड़ा हिस्सा गरीबी की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों से ईरान में विकास कार्य भी प्रभावित हुए हैं। देश में सड़क निर्माण से जुड़ी चौदह बड़ी कंपनियों में से तेरह कंपनियां दिवालिया हो गई हैं। इसका असर ईरानी रेवोल्यूशनरी गार्ड पर प़ड़ा है। रेव्ल्यूशनरी गार्ड से जुड़ी निर्माण कंपनी खात्म-अल-अनबिया ने कई निर्माण कार्य अपने हाथों में ले लिया है। दिलचस्प बात है कि रेवोल्यूशनरी गार्ड भी अभी तक ईरान की खराब होती अर्थव्यवस्था के लिए ईरान के उदारवादी नेताओं को जिम्मेवार ठहराती रही है।

इब्राहिम रईसी की जीत अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की लिए नई समस्या लेकर आ सकती है। बाइडेन प्रशासन ईरान से संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में काम करना चाहता है। परमाणु करार बहाल करने के लिए बाइडेन प्रशासन सहमत होता नजर आ रहा है। बाइडेन इस बात को भलिभांति समझ रहे हैं कि चीन और रूस बहुत ही चालाकी से पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक अपने प्रभाव को बढ़ा रहे हैं। बाइडेन प्रशासन अफगानिस्तान में भी ईरानी घुसपैठ से चिंतित है। सीरिया से लेकर इराक तक में ईरान समर्थित गुटों की ताकत बढ़ी है। इन हालात में ईरान की सत्ता में आई तब्दीली से बाइडेन प्रशासन कैसे निपटेगा यह समय बताएगा।

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