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राजनीतिः फंसे हुए कर्ज से निजात की नई कवायद

रिजर्व बैंक ने छह महीनों के अंदर पचपन बड़े देनदारों से कर्ज वसूलने का निर्देश बैंकों को दिया है। साथ में यह भी कहा है कि यदि वे ऐसा नहीं कर पाते हैं तो वह चूककर्ता कंपनियों (देनदारों) के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करेगा। रिजर्व बैंक ने दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रथम चरण में बारह बड़े चूककर्ताओं की पहचान की है।

Author July 21, 2017 3:02 AM
भारतीय रिजर्व बैंक (फोटो सोर्सः इंडियन एक्सप्रेस)

सरकार ने अध्यादेश के जरिए रिजर्व बैंक को फंसे हुए कर्ज की वसूली के लिए चूककर्ता कंपनियों के विरुद्ध दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार दे दिया है। इस अध्यादेश का उद््देश्य है फंसे हुए कर्ज के मौजूदा गतिरोध को खत्म करना। इस कानून के पारित होने के बाद केंद्रीय बैंक चूककर्ता कंपनियों के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू कर सकता है। साथ ही, फंसे हुए कर्ज की समस्या को निपटाने के लिए बैंकों की तरफ से फैसला भी ले सकता है। इस संदर्भ में रिजर्व बैंक निगरानी समितियों का भी गठन कर सकता है, जिनका कार्य होगा फंसे हुए कर्ज की वसूली के लिए बैंकों और संयुक्त ऋणदाता फोरम को निर्देश देना। निगरानी समितियां तीन तरह से काम करेंगी। पहला, कर्जदाताओं को इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करना। दूसरा, चूककर्ता कंपनियों के साथ समझौता होने के बाद उसे अमलीजामा पहनाना। और तीसरा, फंसे हुए कर्ज के मसले का समाधान निकालना। इस परिप्रेक्ष्य में रिजर्व बैंक के फैसले को मानने के लिए बैंक बाध्य होंगे। गौरतलब है कि बैंकिंग अधिनियम की धारा 35-ए में रिजर्व बैंक के इन अधिकारों को परिभाषित किया गया है।

रिजर्व बैंक ने छह महीनों के अंदर पचपन बड़े देनदारों से कर्ज वसूलने का निर्देश बैंकों को दिया है। साथ में यह भी कहा है कि यदि वे ऐसा नहीं कर पाते हैं तो वह चूककर्ता कंपनियों (देनदारों) के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करेगा। रिजर्व बैंक ने दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रथम चरण में बारह बड़े चूककर्ताओं की पहचान की है। उल्लेखनीय है कि इन कंपनियों (चूककर्ताओं) के ये कर्ज उनकी निवल पूंजी से कई गुना अधिक हैं अर्थात ये कंपनियां बैंक-कर्ज में आकंठ डूबी हैं। इन कंपनियों को दी गई कर्ज की राशि बैंकों के कुल फंसे हुए कर्ज, जो लगभग 8 लाख करोड़ रुपए है, का लगभग पच्चीस प्रतिशत यानी 2,28,668 करोड़ रुपए है। इसमें से 6 लाख 80 हजार करोड़ रुपए सरकारी बैंकों के हैं, जिसमें से सत्तर प्रतिशत कर्ज बड़े कारोबारी घरानों के हैं। उल्लेखनीय है कि अप्रैल-दिसंबर 2016-17 के दौरान सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज में 1 लाख करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई है, जिसमें से ज्यादातर ऊर्जा, स्टील, सड़क, टेक्सटाइल व अन्य बुनियादी क्षेत्रों से जुड़े हैं।

भारतीय स्टेट बैंक ने कुछ दिन पहले भूषण स्टील के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में याचिका दाखिल कर दिवालिया प्रक्रिया शुरू की है, जिसमें एक अन्य सरकारी बैंक (पंजाब नेशनल बैंक) भी शामिल हो गया है। पंजाब नेशनल बैंक ने भूषण स्टील को कार्यशील पूंजी मुहैया कराई थी। दोनों याचिकाएं दिवालिया संहिता-2016 की धारा-7 के तहत दाखिल की गई हैं। भूषण स्टील के ऊपर करीब 46,000 करोड़ रुपए की देनदारी है, जो बीस से ज्यादा बैंकों की बकाया राशि है। इसमें सबसे ज्यादा रकम स्टेट बैंक की है।
दिवालिया प्रक्रिया के तहत कॉरपोरेट पुनर्गठन की शुरुआत के लिए सिफारिश की गई कंपनियों में भूषण स्टील भी शामिल है। भूषण स्टील ने इस साल एस-4 ए के तहत पुनर्गठन के लिए प्रयास किया था। रिजर्व बैंक की एस-4 ए योजना के तहत बैंकों को फोरेंसिक आॅडिट के माध्यम से यह साबित करना होता है कि प्रवर्तक की तरफ से जानबूझ कर चूक नहीं की गई थी। अगर आॅडिट में प्रतिकूल चीजें पाई जाती हैं तो एस-4 ए का क्रियान्वयन तब तक नहीं हो पाता है जब तक कि मालिकाना हक में बदलाव न किया जाए या दोषी प्रवर्तकों के साथ प्रबंधन की संलिप्तता न हो। सरकार की इस पहल से बैंक वाणिज्यिक रूप से तुरंत आवश्यक फैसले ले सकेंगे।

रिजर्व बैंक द्वारा दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने से चूककर्ता कंपनियों में खलबली मच गई है। लैंको इन्फ्राटेक को इस प्रक्रिया में शामिल करने के बाद उसने आपूर्तिकर्ताओं की बैंक गारंटी को भुनाना शुरू कर दिया है। वैसे, बैंक गारंटी भुनाना गैर-कानूनी है। फिर भी वह ऐसा कर रही है। ऐसी धोखाधड़ी से आपूर्तिकर्ताओं की माली हालत बिगड़ रही है। आपूर्तिकर्ताओं का कंपनी पर भरोसा भी कम हुआ है। लैंको के दो आपूर्तिकर्ताओं ने बैंक गारंटी भुनाने के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय से स्थगनादेश भी हासिल किया है। फिर भी लैंको अब तक 15.82 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी भुना चुकी है। लैंको पर कुल 55,000 करोड़ रुपए का कर्ज है, जिसमें से 11,000 करोड़ रुपए का कर्ज दिवालिया प्रक्रिया के घेरे में है। लैंको को सबसे अधिक कर्ज देने वाले बैंक आइडीबीआइ लिमिटेड ने हाल ही में राष्ट्रीय कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के पास कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया याचिका दायर की है।
दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने के बाद कंपनियों के हजारों खुदरा निवेशकों और कुछ शीर्ष संस्थागत निवेशकों के सैकड़ों करोड़ रुपए डूबने की आशंका उत्पन्न हो गई है। दिवालिया प्रक्रिया में जाने का मतलब है कि उनके पास सुरक्षित कर्जदाताओं का भुगतान करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। कॉरपोरेट ढांचे के मुताबिक किसी कंपनी के दिवालिया होने पर इक्विटी शेयरधारकों को सबसे अंत में भुगतान किया जाता है। इस तरह, इक्विटी निवेशकों को कुछ भी मिलने की उम्मीद नहीं है। बारह में से दो कंपनियां, मसलन एस्सार स्टील और भूषण स्टील ऐंड पॉवर सूचीबद्ध नहीं हैं। इरा इन्फ्रा भी करीब एक साल से ठीक-ठाक कारोबार नहीं कर पा रही है। दिवालिया प्रक्रिया के लिए चिह्नित बारह में से नौ कंपनियों के कुल खुदरा निवेशकों की संख्या 8,84,784 है। दो लाख रुपए से कम मूल्य के शेयर रखने वाले व्यक्ति को खुदरा निवेशक कहा जाता है।

मोनेट इस्पात के सबसे कम 24,793 खुदरा निवेशक हैं, जबकि लैंको इन्फ्राटेक के सबसे अधिक 2,62,638 ऐसे निवेशक हैं। खुदरा निवेशकों की मोनेट इस्पात में हिस्सेदारी 7.72 प्रतिशत है, जबकि ज्योति स्ट्रक्चर में यह 47.76 प्रतिशत। कई संस्थागत निवेशकों की भी इन कंपनियों में हिस्सेदारी है। देश के सबसे बड़े संस्थागत निवेशक भारतीय जीवन बीमा निगम की एबीजी शिपयार्ड, एमटेक आॅटो, भूषण स्टील, जेपी इन्फ्राटेक, आलोक इंडस्ट्रीज और ज्योति स्ट्रक्चर में 1 से 3.65 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी है। इन कंपनियों के शेयरों में हाल में दस से पचास प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है, जिसके कारण इन कंपनियों में खुदरा निवेशकों के शेयरों की कीमत 1,299 करोड़ रुपए से घट कर 971 करोड़ रुपए रह गई है, जबकि भारतीय जीवन बीमा निगम के शेयरों की कीमत 181 करोड़ रुपए से घट कर 142 करोड़ रुपए रह गई है।

फंसे हुए कर्ज की वसूली के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक ने बहुआयामी रणनीति बनाई है। एकबारगी निपटान योजना के अलावा जान-बूझ कर कर्ज नहीं चुकाने वाले बड़े चूककर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामले चलाए जा सकते हैं। कुछ क्षेत्रों के लिए ब्याज दरों में कमी के विकल्प पर भी विचार किया जा रहा है। कमजोर बैंकों में सुधार के लिए ज्यादा सहयोग देने पर भी काम चल रहा है। केंद्रीय बैंक ने त्वरित समाधान के लिए संयुक्त कर्जदाता मंच (जेएलएफ) पर नए सिरे से काम करने का भी प्रस्ताव किया है, ताकि इसके जरिए ज्यादा कर्ज वाले कंपनियों के पुनर्गठन पैकेज को मंजूरी दी जा सके। अगर फंसा हुआ कर्ज सौ करोड़ रुपए से ज्यादा है तो जेएलएफ को अनिवार्य रूप से गठित करने का प्रावधान है। इस क्रम में दिवालिया प्रक्रिया को सबसे प्रभावशाली कदम माना जा सकता है, क्योंकि जिस तरह से भूषण स्टील, मोनेट इस्पात और लैंको इन्फ्राटेक में हड़कंप मचा हुआ है उससे लगता है कि इस नए विकल्प की मदद से फंसे हुए कर्ज की वसूली करने में रिजर्व बैंक और बैंकों को निश्चित ही सफलता मिलेगी।

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