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राजनीति: वैश्वीकरण और शिक्षण संस्थान

शिक्षण संस्थानों से संबद्ध बुद्धिजीवियों को ‘आलोचनात्मक चिंतन की संस्कृति’ का वाहक कहा जाता है। सवाल है कि क्या आज के संदर्भ में भी यह कथन उतना ही सटीक है, जितना वैश्वीकरण और बाजारीकरण के दौर से पहले था? यह एक तथ्य है कि आज के दौर में शिक्षक और शिक्षण संस्थानों की भूमिकाओं का विश्लेषण और जरूरी व महत्त्वपूर्ण हो गया है।

Author Published on: February 21, 2020 12:06 AM
कॉलेज में परीक्षा देते छात्र (फोटो मनोज कुमार इंडियन एक्सप्रेस)

ज्योति सिडाना
वैश्वीकरण के दौर में विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, चिकित्सालय और प्राथमिक चिकित्सा केंद्र तक स्वतंत्र बाजार से संबद्ध हो गए हैं। इन सबके स्थानीय प्रबंधन ने इन संस्थाओं को कारोबार का स्वरूप दे डाला और यह अनुमान लगाया कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के मध्य की प्रतियोगिता अधिक योग्यता और क्षमता को उत्पन्न करेगी और उपभोक्ता (विद्यार्थियों) के सामने ढेरों विकल्प पैदा हो जाएंगे। इन स्थितियों ने शिक्षा और बाजार के बीच मजबूत संबंध बनाए। विकास की प्रक्रिया ने राज्य (सरकार) और शिक्षण पेशे के मध्य तनावों को जन्म दिया। चूंकि शिक्षण एकमात्र ऐसा पेशा है जो सरकार के विरुद्ध आलोचना को न केवल वैचारिक आधार देता है, अपितु उसे जनमत का रूप दे देता है। इसलिए हर बार सरकार शिक्षा के क्षेत्र में नियंत्रण की स्थितियों को उत्पन्न करती है।

इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि पब्लिक स्कूल उच्च वर्ग के बच्चों की और सरकारी स्कूल श्रमिक वर्ग के बच्चों की आवश्यकताओं की पूर्ति का माध्यम हैं। इस तरह असमानता को वैधता मिलती जाती है और शिक्षा का स्वरूप समाज में खंडात्मक विभाजन का प्रतिबिंब बन जाता है। आश्चर्यजनक स्थिति यह है कि राज्य समानतामूलक शिक्षा व्यवस्था स्थापित करने के लिए राजी तो है, पर संसाधनों के आभाव का हवाला देकर प्रयासों की उपेक्षा कर देते हैं। इसे राज्य का गुप्त एजंडा कहा जा सकता है। यह भी सत्य है कि वैश्वीकरण ने शिक्षा के प्रभावों को विवादों के घेरे में ला खड़ा किया है, क्योंकि यह शिक्षा ऐसे ‘ज्ञान समाज’ को स्थापित करती है जो सामान्य जन के लिए नहीं है। क्या इस प्रकार की शिक्षा सामाजिक विकास को संतुलित रूप दे सकेगी? आज के दौर में यह बड़ा प्रश्न बन कर उभरा है।

इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि समाज में आधुनिकीकरण हो रहा है और इसलिए समाज तेजी से बदल रहा है। लेकिन उस तेजी के साथ हमारे पाठ्यक्रम और अधिकांश विश्वविद्यालयों के शिक्षक नहीं बदल रहे हैं। जहां नए बदलाव दिख भी रहे हैं, वहां विरोध के स्वर उठ रहे हैं। दूसरी तरफ, समाज में हो रहे बदलावों को राज्य स्वीकार नहीं कर रहा है, इसलिए विश्वविद्यालयों में विरोध-प्रदर्शन जोर पकड़ रहे हैं।

विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई के केंद्र नहीं होते, अपितु सांस्कृतिक प्रबुद्धता और ज्ञान के केंद्र भी होते हैं। लेकिन आज वह सांस्कृतिक प्रबुद्धता चूंकि राज्य के पक्ष में नहीं है, इसलिए विश्वविद्यालयों में असंतोष पनप रहा है। जिन विश्वविद्यालयों में सांस्कृतिक प्रबुद्धता नहीं है, वे ठहराव की स्थिति में आ गए हैं। इसलिए हमें विश्वविद्यालयों को आधुनिकीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया में देखने की जरूरत है। क्या हम इस बदलाव को नई पीढ़ी तक अकादमिक गतिविधि में बदल कर पहुंचा पाने में समर्थ हैं? क्या ये जो बदलाव हैं, वे छात्रों की चेतना का हिस्सा बन रहे हैं? क्रिया के रूप में तो शायद ये हिस्सा बन भी जाएं, पर क्या ये बदलाव विचार के रूप में उनकी चेतना का हिस्सा बने हैं या नहीं, यह देखने की आवश्यकता है।

वास्तविकता यह है कि बदलावों को विचार में बदलने का दायित्व विश्वविद्यालयों का या उच्च शिक्षण संस्थानों का होता है और वे इसमें असफल हो रहे हैं। इसलिए इस बदलते संदर्भ में हमें विश्वविद्यालय की अवधारणा के विषय पर पुन: विचार करना पड़ेगा। सरकार ने उच्च शिक्षा को सभी की पहुंच में लाने के लिए डिग्री स्तर के सभी पाठ्यक्रम ऑनलाइन शुरू करने की घोषणा की है। इसके पीछे तर्क यह है कि इससे सबसे ज्यादा फायदा दूरदराज और पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को मिलेगा, जो अभी आर्थिक परेशानियों के चलते उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।

ऐसे पाठ्यक्रमों की शुरुआत फिलहाल वही संस्थान कर सकेंगे जो राष्ट्रीय वरीयता यानी नेशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआरएफ) में शीर्ष सौ स्थानों पर होंगे। अभी उच्च शिक्षा का कुल नामांकन अनुपात छब्बीस फीसद है, जबकि सरकार ने नई शिक्षा नीति में इसे सन् 2035 तक पचास फीसद तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। सरकार का मानना है कि ऑनलाइन डिग्री पाठ्यक्रम के शुरू होने के बाद उच्च शिक्षा के नामांकन में वृद्धि होगी।

क्या वास्तव में ऐसा संभव हो पाएगा? इसमें संशय इसलिए है कि जिस तबके को उच्च शिक्षा से जोड़ने की कोशिश है, क्या वह तकनीक के इस्तेमाल से वाकिफ है? क्या नई तकनीक तक उसकी पहुंच है? इसलिए यह सवाल उठता है कि कहीं इससे शिक्षक या बौद्धिक वर्ग को तकनीक से तो विस्थापित नहीं किया जा रहा?

अगर आजकल के पाठ्यक्रमों पर गौर करें तो यह साफ नजर आता है कि इनमें औद्योगिक-आधुनिकीकरण का वर्चस्व है और कृषि एवं स्थानीय रोजगार, व्यवसायों की उपेक्षा है। नई आर्थिक नीतियों ने शैक्षणिक लक्ष्यों में बुनियादी बदलाव किए हैं। वैश्वीकरण एवं निजीकरण के कारण उच्च एवं मध्य वर्ग के लिए शिक्षा के अवसर और निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का विस्तार हुआ है।

गुणवत्तामूलक शिक्षा पाने के लिए धन अनिवार्य शर्त बन गया है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन शिक्षक एवं बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। निजी शिक्षा पर होने वाला खर्च इतना अधिक है कि गरीब तबका अपनी आमद का एक बड़ा हिस्सा इस पर खर्च तो करता है, लेकिन उसका उत्थान खासतौर से आर्थिक रूप से, नहीं होता।

कोचिंग संस्थानों के संचालन ने शिक्षा को बड़े कारोबार में बदल डाला है। शिक्षा की इस प्रणाली ने वंचित आबादी में विशेष रूप से युवाओं में आक्रोश, हिंसा एवं आक्रामकता को जन्म दिया है। साथ ही, इस विचार को भी मजबूती दी है कि असमानता को कभी समाप्त नहीं किया जा सकता। देखा जाए तो वर्तमान में सुनने, बोलने और देखने वालों की संख्या तीव्र गति से बढ़ी है, जबकि सृजन, विवेचना, विश्लेषण और मूल्यांकन करने वाले शिक्षकों या बुद्धिजीवियों की संख्या धीरे-धीरे ठहराव के स्तर को प्राप्त कर रही है। परिणामस्वरूप ज्ञान एवं शिक्षा का सृजन एक ऐसे बाजार का हिस्सा बनता जा रहा है जहां विद्यार्थी और सामान्यजन असहाय परंतु खरीदने के लिए बाध्य क्रेता के रूप में सामने आते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में विकसित हुआ यह बाजार शिक्षक और ज्ञान को उस सांस्कृतिक पूंजी के निर्माता के रूप में स्थापित करता है, जिसे शासक वर्ग अपने वर्चस्व के लिए प्रयुक्त करने का इच्छुक है।

शिक्षण संस्थानों से संबद्ध बुद्धिजीवियों को ‘आलोचनात्मक चिंतन की संस्कृति’ का वाहक कहा जाता है। सवाल है कि क्या आज के संदर्भ में भी यह कथन उतना ही सटीक है, जितना वैश्वीकरण और बाजारीकरण के दौर से पहले था? यह एक तथ्य है कि आज के दौर में शिक्षक और शिक्षण संस्थानों की भूमिकाओं का विश्लेषण और जरूरी व महत्त्वपूर्ण हो गया है।

विश्व का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि प्रत्येक समाज में शिक्षकों, बुद्धिजीवियों ने सामाजिक परिवर्तन, ज्ञान, चेतना और सूचनाओं के वैश्विक विस्तार में, परिवर्तन की अग्रगामी एवं विरोधी शक्तियों के रूप में और आलोचनात्मक चेतना के विस्तार में एक सक्रिय भूमिका निभाई है। हिंदुत्व के विस्तार में शंकराचार्य की भूमिका, राजाओं के कर्तव्यों की व्याख्या में चाणक्य एवं द्रोणाचार्य की भूमिका, समाज सुधारक के रूप में बुद्ध, महावीर, कबीर, रैदास, महर्षि दयानंद सरस्वती आदि की भूमिका सामाजिक विकास की संकेतक है। फिर वर्तमान दौर में ऐसा क्या हो गया है कि क्रोध और हिंसा के इस युग में ऐसे बुद्धिजीवी उभार ले रहे हैं जो या तो तटस्थ रहते हैं या फिर मौन संस्कृति के पक्षधर नजर आते हैं।

परिवार, राजनीति, शिक्षण संस्थान, सड़क, समाज सभी जगह जो जोखिम और चुनौतियां उत्पन्न हुई हैं, उनका जवाब देने या सामना करने में अगर बुद्धिजीवी वर्ग ही असमर्थ अनुभव करेगा या चुप रहेगा, तो विश्वविद्यालयों की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिह्न लगना स्वाभाविक है।

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