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राजनीति: प्रदूषण से निपटने की चुनौती

सवाल है कि क्या कोरोना विषाणु ने प्रदूषण की मार झेलती दुनिया को वह मौका दिया है, जिसमें वह ठहर कर जीवनशैली में बदलाव करने पर विचार कर सके? दरअसल, अब हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हम अपनी जीवनशैली को कैसे बेहतर बनाएं, जिसमें पर्याप्त संसाधनों में रहते हुए पर्यावरण को भी बचाए रख सकें।

pollution and corona virusशहरों में बढ़ता प्रदूषण और कोरोना वायरस खतरनाक रूप में बदल रहे हैं (फाइल फोटो)

कोरोना विषाणु संक्रमण को रोकने के लिए दुनिया भर में उठाए गए पूर्णबंदी जैसे कदम से आबोहवा बदलने लगी है। दुनिया के कई हिस्सों से वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण कम हुआ है। बंदी का फायदा उठाते हुए प्रकृति अपनी मरम्मत करती नजर आ रही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों के अनुसार, देश के नब्बे से अधिक शहरों में पिछले कुछ दिनों में न्यूनतम वायु प्रदूषण दर्ज किया गया है। इसका पहला प्रभाव यह पड़ा कि सांस लेने के लिए साफ हवा मिलने लगी है। यही नहीं, फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने वाली नाइट्रोजन आॅक्साइड का उत्सर्जन भी काफी कम हो गया है।

नाइट्रोजन आक्साइड मुख्य रूप से वाहनों और कारखानों से निकलने वाले धुएं में होती है। लेकिन पूर्णबंदी की वजह से शहरों में साफ आसमान दिखाई दे रहा है और पर्यावरण की स्थिति काफी बेहतर हुई है। इससे पूरे देश के साथ-साथ दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर काफी कम हुआ है। देशव्यापी पूर्णबंदी के चलते वाहन, कारखाने और कार्बन उत्सर्जन करने वाले तमाम कारक बंद हैं। इसके साथ ही देशभर में निर्माण कार्यों जैसी गतिविधियों पर रोक लगी हुई है। पश्चिमी विक्षोभ के चलते बूंदाबांदी का क्रम भी जारी है। इन वजहों से भी प्रदूषण में कमी आई है। वरना दिल्ली-एनसीआर सहित देश के कई शहरों के लोग जहरीली हवा में सांस ले रहे होते।

जाहिर है, जो काम अब तक सरकार नहीं कर पाई, वह आज पूर्णबंदी के सकारात्मक परिणाम के रूप में देखने को मिल रहा है। तमाम कारखानों के बंद होने की वजह से गंगा-यमुना सहित तमाम नदियों का पानी अब साफ दिखने लगा है। देश की सबसे बड़ी और पवित्र माने जाने वाली गंगा में सबसे ज्यादा प्रदूषण कारखानों से निकलने वाले अवशिष्टों के कारण ही फैलता है। हालांकि, गंगा को साफ करने की कोशिश में सरकारों ने साल-दर-साल कितनी ही योजनाएं और समितियां बनार्इं, जम कर पैसा भी फूंका, लेकिन ऐसे नतीजे कभी नहीं दिखे, जो पूर्णबंदी के दौरान सामने आए हैं।

प्रदूषण में कमी जैसा बड़ा बदलाव पहले कभी देखने को नहीं मिला। साफ है, पूर्णबंदी ने यह संदेश दिया है कि लोग चाहें तो प्रदूषण को कम कर सकते हैं। यही वजह है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से तमाम लोगों ने अपनी सरकारों को कोरोना संकट टल जाने के बाद हर साल कुछ दिन का वक्त प्रकृति के लिए भी देने का विचार दिया है।

दुनिया भर में प्रदूषण को लेकर हर साल चौंकाने वाली रिपोर्टें आ रही हैं। वैश्विक निकाय संयुक्त राष्ट्र से लेकर पर्यावरण पर काम करने वाले संस्थान और विश्वविद्यालय तक पर्यावरण को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। लेकिन जब यह तथ्य सामने आता है कि हर साल वायु प्रदूषण की वजह से लाखों लोगों की मौत हो रही है, बच्चों को छोटी उम्र में ही कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, तो प्रदूषण से निपटने के सरकारों के कदम सवालों के घेरे में आ जाते हैं। स्टेट आॅफ ग्लोबल एअर, 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में साल 2017 में करीब बारह लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई थी। इसमें कहा गया है कि वायु प्रदूषण दुनिया भर में मृत्यु दर का पांचवां प्रमुख कारक है।

कुपोषण, शराब और शारीरिक निष्क्रियता की तुलना में वायु प्रदूषण की वजह से ज्यादा मौतें होती हैं। हर साल सड़क दुर्घटना या मलेरिया की तुलना में वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों से ज्यादा लोग मरते हैं। ऐसे में इन सारी तस्वीरों और आंकड़ों को देख कर पूर्णबंदी के दौरान ढेरों कष्ट और पीड़ा झेलते हुए भी लोगों का इस बात को लेकर खुश होना स्वाभाविक है कि चलो, सांस लेने के लिए साफ हवा तो मिलने लगी।

लेकिन सवाल है कि क्या कोरोना विषाणु ने प्रदूषण की मार झेलती दुनिया को वह मौका दिया है, जिसमें वह ठहर कर जीवनशैली में बदलाव करने पर विचार कर सके? दरअसल, अब हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हम अपनी जीवनशैली को कैसे बेहतर बनाएं, जिसमें पर्याप्त संसाधनों में रहते हुए पर्यावरण को भी बचाए रख सकें। पर्यावरणविदों का मानना है कि सरकार को पर्यावरण की कीमत पर विकास के मामले में इस संकेत को खतरे की घंटी के तौर पर लेना चाहिए। गौरतलब है कि इस समय तकरीबन सवा सौ करोड़ लोगों के साथ भारत में पूर्णबंदी के जरिए कोरोना से लड़ाई लड़ी जा रही है। इससे सामान्य दिनों में वायु गुणवत्ता सूचकांक पचास फीसद से भी कम हो गया है।

यह ठीक है कि बीते कुछ सालों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकरों ने कई कदम उठाए। लेकिन फिर भी वायु प्रदूषण से निपटने में हम फिसड्डी साबित हुए। जाहिर है, हमारे प्रयासों और इच्छाशक्ति में कहीं न कहीं कमी रही होगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि हमारी सरकारें एक-दूसरे पर दोषारोपण करने के बजाय देश हित में ठोस कदम उठाएं। लेकिन अफसोस की बात है कि प्रदूषण जैसे गंभीर विषय को भी इतने सालों में सरकारें केवल कुछ तात्कालिक उपायों के सहारे ही हल करना चाहती हैं।

वास्तव में अगर हमारी सरकारें प्रदूषण से लड़ना चाहती हैं तो उन्हें इस समस्या के प्रति एक परिपक्व और ईमानदार नजरिया अपनाना होगा। समस्या की जड़ को समझ कर उस पर प्रहार करना होगा, लोगों के सामने हल रखने होंगे, उन्हें विकल्प देने होंगे न कि महज फरमान। गौर करने वाली बात यह है कि आबादी के लिहाज से सबसे ज्यादा नुकसान भारत का ही होने वाला है। इसलिए भारत को अपनी जिम्मेदारी बखूबी समझते हुए तत्काल कुछ सार्थक और ठोस उपाय करने होंगे, जो कोरोना जैसी महामारियों से बचाने के साथ पर्यावरण को भी बचाएं। अगर पर्यावरण बचेगा, तभी हम महामारियों से बच पाएंगे।

वायु प्रदूषण को निश्चित रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। दुनिया के कई देशों ने तो इसमें काफी हद तक सफलता पाई भी है। लेकिन इसके लिए हम सभी नागरिकों और संगठनों से लेकर निजी कंपनियों और सरकारों तक को एक साथ मिलकर प्रयास करना होगा। सबको अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा। भारत में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए नियम-कानूनों की कोई कमी नहीं है। पर समस्या इन पर ईमानदारी से अमल की है। प्रदूषण नियंत्रण संबंधी कानूनों को आज तक कहीं भी सख्ती से लागू नहीं किया गया। सवाल है कि क्या जिस तरह से पूर्णबंदी लागू कराने को लेकर सरकार ने तत्परता और सख्ती दिखाई, वैसा ही कदम दूसरे मामलों में नहीं उठाया जा सकता?

आज जब देश भर की सारी गतिविधियां ठप हैं और वायु प्रदूषण में लगातार कमी आ रही है, तब कम से कम केंद्र और राज्य सरकारों को अपने यहां प्रदूषण से संबंधित विस्तृत अध्ययन करने की जरूरत है, ताकि दिल्ली सहित पूरे देश में पूर्णबंदी के बाद प्रदूषण में कमी लाने के लिए भी ऐसे ही ठोस कदम उठाए जा सकें। पूर्णबंदी के इस दौर से आमजन और सरकारों को यह सबक लेना चाहिए कि कुछ सख्त और सकारात्मक कदमों को उठाने भर से वायु प्रदूषण को काफी कम किया जा सकता है।

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