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राजनीति: आतंक की आग में बच्चे

वर्तमान में विश्व में अठारह वर्ष से कम आयु के तीन लाख से भी अधिक ऐसे बच्चे हैं जिन्हें सैनिकों, शिविर श्रमिकों और गुलामों व तस्करों के रूप में कार्य करना पड़ रहा है। बच्चों का सैनिकों के रूप में उपयोग करना क्रूर और अमानवीय कृत्यों में से एक है और विश्व के कई देशों में यह चलन में है।

Author Updated: February 17, 2021 5:36 AM
Terrorismबच्‍चों को आतंकी संगठनों में शामिल करना चिंता की बात।

विवेक ओझा

क्या ऐसी दुनिया की कल्पना की जा सकती है जिसमें बच्चों को आतंकवादी, उग्रवादी या अलगाववादी जैसी संज्ञा देना जायज हो? युवा और वयस्क तो जानबूझ कर हानि-लाभ का आकलन कर और गुमराह हो कर भी आतंकी गतिविधि में शामिल हो जाते हैं, लेकिन क्या बच्चे भी खुद से फैसला कर आतंकवादी संगठनों में शामिल होते हैं? अगर इस बात का जवाब ह्यनहींह्ण में है तो फिर वे कौन लोग हैं जो बालकों के नाम पर आतंकवाद का कारोबार कर रहे हैं। हिंसा, उपद्रवों से घिरे देशों में जहां भुखमरी है, बेरोजगारी है वहां अभिभावकों को भी यह देखने का समय नहीं है कि उनके बच्चे कहां हैं और किस काम में इस्तेमाल हो रहे हैं।

सीरिया, लीबिया और अन्य अफ्रीकी देशों के लोग गृह युद्ध, नृजातीय युद्ध, प्राकृतिक आपदा, अवैध प्रवासन, शरणार्थी समस्या, जातीय संहार, आंतकवाद और ऐसी ही न जाने कितनी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ऐसे देशों में ही आतंकी संगठन नई भर्तियों और प्रशिक्षण के लिए प्रयोगशालाएं बनाते हैं, जहां से एक बालक को आतंकवादी का खिताब मिलता है।

हाल में इसी मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के उपस्थायी प्रतिनिधि ने बालक और सशस्त्र संघर्ष पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि बच्चों को विदेशी आतंकवादी लड़ाके का दर्जा देना मानवीय गरिमा को कलंकित करने और अमानवीयता को बढ़ावा देने वाला होगा। भारत ने इस बात की जरूरत को रेखांकित किया कि देशों को सशस्त्र संघर्षों से प्रभावित किशोरों के उनके मूल देशों में वापसी और पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए उचित दृषिटकोण विकसित करने और अपनाने की जरूरत है।

बच्चों को आतंकवादी मान कर उनसे पेशेवर आतंकियों जैसे निपटने की नीति निश्चित रूप से अमानवीय होगी। गौरतलब है कि सुरक्षा परिषद ने वर्ष 2014 में एक प्रस्ताव (संख्या 2178) पारित किया था जो यह परिभाषित करता है कि विदेशी आंतकवादी लड़ाका कौन है। विदेशी आतंकी लड़ाके को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जो अपने निवास के देश या राष्ट्रीयता के देश से भिन्न किसी अन्य देश की यात्रा आतंकवादी कृत्यों को अंजाम देने या उसकी योजना बनाने के लिए करता है या आतंकवादी प्रशिक्षण प्रदान करने या प्राप्त करने के लिए जाता है और उसका सशस्त्र संघर्ष से जुड़ाव होता है।

बच्चों को बहला-फुसला कर उन्हें आतंकी गतिविधियों में झोंकना आतंकी संगठनों के लिए मुश्किल काम नहीं है। आतंकी संगठन ऐसे बच्चों को जासूस, रसोइए, आत्मघाती हमलावर अथवा मानव सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में जो सबसे गंभीर बात सामने आती है, वह है पारराष्ट्रीय संगठित अपराधों को बढ़ावा मिलना। मानव तस्करी और आतंकी गतिविधि के लिए बाल दासता को बढ़ावा मिलना इसका सबसे विद्रूप रूप है। बाल अधिकारों पर 1924 की जिनेवा उदघोषणा और 20 नवंबर, 1959 को बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंगीकृत उदघोषणा में वर्णित बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित करने की बात की गई है।

मानवाधिकारों पर सार्वभौमिक उदघोषणा, 1948 और मानवाधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत सभी लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रता जिसमें बच्चों के अधिकार भी शामिल हैं, को सुरक्षित करने की बात की गई है। इस मामले में जाति, रंग, धर्म, भाषा आदि के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न करने का आवाहन किया गया है। इसके अलावा नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय संधि के अनुच्छेद 23 और 24 के तहत और आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय संधि के अनुच्छेद 10 के तहत बच्चों के विशेष अधिकारों और कल्याण के लिए आवश्यक कार्य किए जाने पर बल दिया गया है।

बाल अधिकारिता का संरक्षण मूल अधिकारों, मानवाधिकारों, मानव गरिमा के संरक्षण और मानव पूंजी के निर्माण की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है। इसी भावना को ध्यान में रख कर 20 नवंबर, 1989 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव संख्या 44/ 25 के तहत इस संधि को अंगीकृत किया गया और इसे विश्व के राष्ट्रों के समक्ष हस्ताक्षर और समर्थन के लिए प्रस्तुत किया था। इसमें संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुरूप विश्व में स्वतंत्रता, न्याय और शांति की नींव रखने के लिए बाल अधिकारिता को सुनिश्चित करने पर बल दिया गया है।

इसके अनुच्छेद 6 में ही यह प्रावधान भी है कि राज्य पक्षकार बच्चों के उत्तरजीविता और उनके विकास के लिए अधिकतम संभव उपाय को सुनिश्चित करेंगे। यहां यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि विश्व भर में अलग-अलग प्रकार के युद्ध अथवा गृह युद्ध हो रहे हैं। म्यांमा में रोहिंग्या समस्या, सीरिया में शरणार्थियों की समस्या, ईरान, इराक और अफगानिस्तान के आंतरिक उपद्रव और अफ्रीकी देशों में होने वाली नृजातीय समस्याओं में बाल अधिकारों का उल्लंघन होता है और बालकों के अस्तित्व पर खतरा बना रहता है। इसीलिए बालकों के उत्तरजीविता को सुरक्षित करने और उनके बहुआयामी विकास को भी सुनिश्चित करने के लिए सभी सदस्य राष्ट्रों को उपयुक्त प्रयास करने के लिए निर्देशित किया गया है।

बाल अधिकार संरक्षण संधि संयुक्त राष्ट्र का एक बड़ा वैश्विक प्रयास है। इसके जरिए बाल अधिकारिता संरक्षण को एक वैश्विक आंदोलन बनाने के विचार के साथ महत्त्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। इस संधि में सदस्य देशों के बच्चों को सभी प्रकार की यातनाओं, आर्थिक शोषण और मादक द्रव्य पदार्थों के अवैध उपयोग से रक्षा करने के लिए प्रभावी कदम उठाने पर जोर दिया गया है। इसी क्रम में 12 जनवरी 2002 को बाल अधिकार संरक्षण को मजबूती देने के उद्देश्य से सशस्त्र युद्ध में बच्चों की संलग्नता से संबंधित संधि पर वैकल्पिक प्रोटोकॉल अमल में आया था। यह प्रोटोकॉल सदस्य देशों में होने वाले विद्रोही आंदोलनों में बच्चों को युद्ध में सम्मिलित न करने के लिए आवाहन करता है।

बाल सैनिकों की विविध प्रकार की समस्याएं रही हैं। खासकर अफ्रीकी देशों में गृह युद्ध और नृजातीय युद्ध में बाल सैनिकों का इस्तेमाल किया गया। वर्तमान में विश्व में अठारह वर्ष से कम आयु के तीन लाख से भी अधिक ऐसे बच्चे हैं जिन्हें सैनिकों, शिविर श्रमिकों और गुलामों व तस्करों के रूप में कार्य करना पड़ रहा है। बच्चों का सैनिकों के रूप में उपयोग करना क्रूर और अमानवीय कृत्यों में से एक है और विश्व के कई देशों में यह चलन में है। 18 जनवरी 2002 को एक अन्य प्रोटोकॉल लागू किया गया था जो बाल वेश्यावृत्ति, अश्लील साहित्य और बाल दासता को प्रतिबंधित करता है। यूनिसेफ के अनुसार विश्व में प्रत्येक वर्ष लगभग दस लाख बच्चों, जिनमें अधिकांश लड़कियां हैं को यौन व्यापार में धकेल दिया जाता है।

भारत में नक्सलियों और माओवादियों तथा उत्तर पूर्व के राज्यों में सक्रिय अलगाववादी समूहों द्वारा बाल सैनिकों की भर्ती और उन्हें हिंसक गतिविधियों में लगाने की रिपोर्टें आती रही हैं। एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स ने वर्ष 2013 की रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि भारत में जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्वी भारतीय राज्यों में कम से कम तीन हजार बाल सैनिकों को हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने के मकसद से उग्रवादी संगठनों में भर्ती किया जा चुका है।

भारत ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा था कि भारत में ऐसा कोई आतंकी या अलगाववादी समूह नहीं है जो बालकों को सैन्य अभियान के लिए भर्ती करता हो। भारत ने 5 नवंबर 2004 को सशस्त्र संघर्षों में बालकों की संलग्नता पर वैकल्पिक प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए थे और 30 नवंबर 2005 को इसका समर्थन भी कर दिया था। इसके बावजूद 2005 के बाद से छत्तीसगढ़ जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बाल सैनिकों की भर्ती के आरोप मानवाधिकार संगठनों ने भारत पर लगाए हैं।

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