ताज़ा खबर
 

अधिकारों के दंगल में दिल्ली

अगर हर फैसला उपराज्यपाल के हिसाब से होने लगे, तो चुनी हुई सरकार का मतलब कुछ नहीं रह जाएगा। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत आप के नेता आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं। दिल्ली के विधान में संशोधन करके उपराज्यपाल को ज्यादा ताकत देने के इस प्रयास से विपक्ष को भाजपा की केंद्र सरकार के खिलाफ गोलबंद होने का एक और मौका मिल गया है। आप के नेता इस पर निर्णायक लड़ाई के लिए सड़क पर आ चुके हैं।

Delhiनई दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान उपराज्यपाल अनिल बैजल, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। ( फोटो प्रवीण खन्ना / इंडियन एक्सप्रेस फाइल )

मनोज कुमार मिश्र

दिल्ली की मौजूदा आम आदमी पार्टी (आप) सरकार और उपराज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार के बीच अनवरत चल रही लड़ाई ने दिल्ली को फिर से 1993 में पहुंचा दिया है, जब यहां विधानसभा बनी थी। तब दिल्ली के एक-एक फैसले केंद्र सरकार करती थी। संसद ने दिल्ली को विधानसभा देने वाले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम-1991 में एक संशोधन करने का प्रस्ताव किया था। उसके तहत संसद में संशोधन विधेयक- ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन)-2021’ पास किया गया है।

इसके बाद दिल्ली सरकार का हर फैसला उपराज्यपाल की सहमति या जानकारी में ही अमल हो पाएगा। 1993 में विधानसभा की नियमावली बनाते समय तत्कालीन उपराज्यपाल पीके दवे ने मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना और विधानसभा अध्यक्ष चरतीलाल गोयल के अनुरोध पर आरक्षित विषयों- जमीन (दिल्ली विकास प्राधिकरण), कानून-व्यवस्था और दिल्ली पुलिस के कामकाज पर भी विधानसभा में उसी तरह चर्चा करने के लिए विधान बनाने की आजादी दी, जैसे अन्य विषयों में चर्चा करने का प्रावधान नियमावली में बन रहा था। आज हालात ऐसे बन गए हैं कि विधानसभा की जिस नियमावली पर सालों से अमल हो रहा है, वही बेमतलब हो गई है। अब तो गैर-आरक्षित विषयों पर भी फैसला करने से पहले उपराज्यपाल की सहमति लेनी होगी। वैधानिक रूप से दिल्ली सरकार का मतलब उपराज्यपाल कर दिया गया है।

यह तब किया गया है जब केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली सरकार है, जिसने दिल्ली को राज्य बनवाने के अभियान की शुरुआत की थी। कांग्रेस ने तो तब दिल्ली को पूर्ण राज्य बनवाने की मांग शुरू की, जब उसकी दिल्ली में सरकार रही और केंद्र में भाजपा की सरकार बनी। सन 2002 में तत्कालीन उपराज्यपाल ने अपने अधिकार बढ़वाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से दो परिपत्र जारी करवाए। उसका विरोध तब की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और कांग्रेस ने किया था। तब भी गृह मंत्रालय ने यही लिख कर भेजा था कि दिल्ली सरकार का मतलब उपराज्यपाल होता है। यही 4 अगस्त, 2016 को दिल्ली हाई कोर्ट ने भी कहा था।

उसके खिलाफ दिल्ली सरकार सुप्रीम कोर्ट गई और सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 4 जुलाई, 2018 को यह फैसला दिया कि दिल्ली में गैर-आरक्षित विषयों में फैसला लेने के लिए दिल्ली सरकार पूरी तरह स्वतंत्र है। दूसरे राज्यों के राज्यपालों की तरह ही दिल्ली के उपराज्यपाल को केवल उसकी सूचना (एड एंड एडवाइस) का अधिकार है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब भी दिल्ली की अफसरशाही पर किसका नियंत्रण हो, यह तय नहीं किया है। दिल्ली विधानसभा की नियमावली बनाने वाले संविधान के जानकार एसके शर्मा कहते हैं कि संविधान के जिस उनहत्तरवें संशोधन के तहत दिल्ली को विधानसभा मिली, उसमें यह भी लिखा हुआ है कि इसमें कोई भी संशोधन मूल विधान में संशोधन माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी दिल्ली के अधिकारों की लड़ाई इसलिए नहीं खत्म हुई, क्योंकि अभी बहुत सारी चीजें तय होनी रह गई हैं। सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ अधिकारियों की नियुक्ति और तबादलों के अधिकार पर फैसला देने वाली है। दूसरे, संविधान पीठ ने अपने फैसले में दिल्ली सरकार को मजबूती दी, लेकिन यह कह कर कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश ही रहेगी, राज्य नहीं बन सकती है, उसकी हद तय कर दी।

कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कोई भी विधेयक का प्रारूप या प्रशासनिक फैसलों की फाइल उपराज्यपाल के पास आखिरी क्षण में भेजी जा रही है, जिससे राजनिवास को उस पर कानूनी राय आदि लेने का समय नहीं मिल पाया। इतना ही नहीं, विधायी कार्य मनमाने तरीके से किए जा रहे हैं। जब मन में आया विधानसभा की बैठक बुला ली जाती है। दिल्ली विधानसभा में देश भर के मुद्दों पर कैसे चर्चा हो सकती है। किसी के भारत रत्न वापस लेने के प्रस्ताव या देश की किसी घटना पर दिल्ली विधानसभा में कैसे चर्चा हो सकती है। जिस उपराज्यपाल के नाम पर विधानसभा की बैठक बुलाई जाती है, उसी का निंदा प्रस्ताव विधानसभा कैसे पास कर सकती है।

राजनीतिक मंच से भले यह बोला जा सकता है, लेकिन विधानसभा चुनाव आयोग पर कैसे चर्चा कर सकती है। विधानसभा की समितियां विधानसभा के फैसलों को लागू करने में मददगार बनती हैं, इस सरकार ने इसे अफसरों को सबक सिखाने का एक माध्यम बना लिया। हर रोज दिल्ली सरकार के आला अधिकारी को विधानसभा की समितियों की बैठक में बुलाने से परेशान होकर एक मुख्य सचिव एमएम कुट्टी को अदालत की शरण में जाना पड़ा। भाजपा का कहना है कि यह संशोधन इसी के चलते हुआ है। मगर इस टकराव को दूसरी तरह से भी टाला जा सकता था। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार को पंगु बनाने का भारी विरोध होगा। इसकी शुरुआत हो चुकी है।

दिल्ली के विधान में केवल केंद्र शासित प्रदेश होने की समस्या नहीं है, अनेक विषयों पर स्पष्टता नहीं है। इसी का फायदा उठा कर केंद्र सरकार ने दिल्ली की चुनी हुई सरकार के अधिकारों में बेहिसाब कटौती कर दी। आप सरकार की समस्या यह रही है कि आला अधिकारी मुख्यमंत्री की सुनते ही नहीं, उपराज्यपाल की सुनते हैं। इतना ही नहीं, जिन अधिकारियों को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मुख्य सचिव बनवाया, उनमें से नवंबर, 2018 में मुख्य सचिव बने विजय कुमार देव के अलावा हर मुख्य सचिव से सरकार की लड़ाई होती रही। पहली बार सरकार बनने पर तत्कालीन मुख्य सचिव डीएम स्पोलिया को हटा कर एसके श्रीवास्तव को मुख्य सचिव बनवाया।

दुबारा 2015 में सरकार में आने पर वापस स्पोलिया को मुख्य सचिव बनवाया। उनके रिटायर होने पर गोवा के मुख्य सचिव रहे केके शर्मा को वहां से बुला कर मुख्य सचिव बनवाया गया। थोड़े ही दिन में उनके पास फाइल भेजनी बंद कर दी गई। उसके बाद बने एमएम कुट्टी को अपने अधिकार के लिए अदालत की शरण में जाना पड़ा। उसके बाद अंशु प्रकाश ने तो आरोप लगाया कि उन्हें 20 फरवरी, 2018 को मुख्यमंत्री की मौजूदगी में उनके सरकारी निवास पर आप विधायकों ने पीटा।

आप सरकार का आरोप है कि केंद्र सरकार उन्हें काम नहीं करने दे रही है और अधिकारियों के माध्यम से उपराज्यपाल सरकार के काम में अडंगा लगाते हैं। केंद्र शासित प्रदेश होने के चलते दिल्ली के अधिकारियों का कोई काडर नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के माध्यम से उपराज्यपाल का उन पर नियंत्रण है। दिल्ली सरकार इसी से बेबस हो जाती है। कई ऐसे मौके आए, जब उपराज्यपाल ने दिल्ली सरकार के फैसले को पलट दिया।

इस लड़ाई में अभी तो यही लग रहा है कि नुकसान केवल दिल्ली का हुआ है। राष्ट्रीय राजधानी अधिनियम-1991 में बहुत सारी चीजें साफ न होने की वजह से उस विधान में सरकारों ने प्रयास करके दिल्ली सरकार के अधिकारों में बढ़ोतरी करवाई। आप सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विषय साफ करवाया, लेकिन मामला वहीं पहुंच गया जहां से 1993 में शुरू हुआ था। उसके बाद के सारे प्रयास इस संशोधन से बेकार हो गए।

अगर हर फैसला उपराज्यपाल के हिसाब से होने लगे, तो चुनी हुई सरकार का मतलब कुछ नहीं रह जाएगा। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत आप के नेता आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं। दिल्ली के विधान में संशोधन करके उपराज्यपाल को ज्यादा ताकत देने के इस प्रयास से विपक्ष को भाजपा की केंद्र सरकार के खिलाफ गोलबंद होने का एक और मौका मिल गया है। आप के नेता इस पर निर्णायक लड़ाई के लिए सड़क पर आ चुके हैं। आने वाले काफी दिनों तक यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाता रहेगा।

Next Stories
1 भारतीय भाषाओं का सेतु
2 महिला सुरक्षा का संकट
3 रिश्तों का नया दौर और चुनौतियां
ये पढ़ा क्या?
X