पानी तक कितनी पहुंच

नई चिंता की बात यह है कि पानी की बढ़ती जरूरतों की वजह से देश के ज्यादातर हिस्सों में भूजल का स्तर साल दर साल नीचे जा रहा है। जाहिर है कि हर साल बारिश के दिनों में जितने भूजल का पुनर्भंडारण हो रहा है, उससे ज्यादा भूजल उलीचा जा रहा है। अंधाधुंध भूजल दोहन की इस प्रवृति ने एक नए संकट का सायरन बजा दिया है।

waterजल संकट से लोग परेशान। फाइल फोटो।

सुविज्ञा जैन

इस साल फरवरी से ही पारा चढना शुरू हो गया है। मौसम का यह रुख बता रहा है कि इस साल भीषण गर्मी पड़ सकती है। जब कभी ऐसा होता है तो जल संकट के आसार बनते हैं, यानी मानसून में अच्छी बारिश के बावजूद देश इस बार भी जल सुरक्षा को लेकर निश्चिंत नहीं है। वैसे तो जब भीषण गर्मी नहीं भी पड़ती है, तब भी देश जल संकट झेलता है और चिंताजनक यह है कि साल दर साल यह संकट बढ़ ही रहा है।

हर साल सूखे से प्रभावित क्षेत्रों की संख्या बढ़ रही है। वह समय आ गया है जब जल संरक्षण का काम प्राथमिकता पर लाना मजबूरी बनती जा रही है। फौरन सोच-विचार इसलिए और जरूरी है क्योंकि हाल में आइआइटी, गांधीनगर ने एक अध्ययन के बाद इस साल एक खास तरह का सूखा पड़ने का अंदेशा जताया है। उसने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस साल देश को फ्लैश ड्रॉट यानी छोटे-छोटे अंतराल के सूखे की समस्या से जूझना पड़ सकता है। इस तरह के सूखे में मानसून के गड़बड़ाने और तामपान बढ़ने से मिट्टी की नमी खत्म होने लगती है। इसका सबसे बुरा और सबसे ज्यादा असर खेती पर पड़ता है। याद रखा जाना चाहिए कि अपने देश में आधे से ज्यादा खेती आज भी वर्षा पर आधारित है। ऐसे में बारिश का गड़बड़ाना और तापमान का बढ़ना किसानों के संकट को और तीव्र बना सकता है।

पिछले कुछ दशकों के अनुभव से हम यह भी जान चुके हैं कि देश में पानी को लेकर निश्चिंतता का संबंध बारिश और गर्मी से भी ज्यादा इस बात से है कि हमारी जल भंडारण क्षमता कितनी है। बारिश के चार महीनों में ज्यादा से ज्यादा पानी को जमा करके ही हम बाकी आठ महीने सुकून से रह सकते हैं। जल संचयन या भंडारण वह चीज है कि अगर किसी साल मानसून सूखा भी निकल जाए, तब भी जल भंडारण के बल पर जल अभाव के संकट से बच सकते हैं। लेकिन पिछले कुछ साल से सरकारी जल विज्ञानी यह बताने लगे हैं कि यह समस्या जल प्रबंधन की बिल्कुल भी नहीं है, बल्कि देश में जल संसाधन ही कम हैं। यह बात एक विवाद खड़ा कर सकती है। लिहाजा यह देखा जाना चाहिए कि देश में क्या वाकई कुदरती तौर पर पानी की कमी है, या हकीकत यह है कि पानी तो है लेकिन हम अपने जल प्रबंधन में खामियों के कारण बारिश के दिनों में वर्षा जल जमा करके नहीं रख पाते?

हिसाब यह है कि देश की धरा पर हर साल औसतन चार हजार अरब घनमीटर पानी बरसता है। भारत के आबादी एक सौ अड़तीस करोड़ के आसपास है। यानी कुल बरसे पानी को आबादी से भाग देकर देखें तो देश में प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष दो हजार नौ सौ घनमीटर पानी प्रकृति से मिलता है। अगर विश्व में सर्वमान्य जल आवश्यकता का पैमाना देखें तो भारत आज भी अपनी न्यूनतम आवश्यकता दो हजार घनमीटर से डेढ गुना पानी प्रकृति से हासिल कर रहा है। लेकिन सरकारी जल विज्ञानियों का तर्क है कि वर्षा के रूप में जो पानी हमें प्रकृति से मिलता है, उसे हम पूरा का पूरा इस्तेमाल नहीं कर सकते। जल विज्ञानियों की दलील रहती है कि देश की भू आकृति और दूसरे कारणों से चार हजार हजार अरब घनमीटर पानी में से हम सिर्फ एक हजार आठ सौ अरब घनमीटर पानी को ही इस्तेमाल में आने लायक मानते हैं।

बात यही खत्म नहीं होती। इस्तेमाल के लिए उपलब्ध इस एक हजार आठ सौ अरब घनमीटर में भी हम सिर्फ एक हजार एक सौ दस अरब घनमीटर पानी को ही अपनी पहुंच में ला पाए हैं। अगर जल की इस मात्रा को देश की कुल आबादी से भाग दें तो इस समय प्रति व्यक्ति वास्तविक जल उपलब्धता सात सौ सनतानवे घनमीटर निकल कर आती है। जबकि आजादी मिलने के समय यह आंकड़ा पांच हजार घनमीटर प्रति व्यक्ति था। यानी आज हम कह सकते हैं कि ज्यों-ज्यों आबादी बढ़ रही थी, त्यों-त्यों जल संकट बड़ा हो रहा था। इसीलिए विशेषज्ञों को समीक्षा करनी चाहिए कि पिछले सालों में जल प्रबंधन के मोर्चे पर हुआ क्या है?

सीधा-सा सवाल यह है कि दावे के मुताबिक एक हजार आठ सौ अरब घनमीटर इस्तेमाल योग्य जल का पूरा भंडारण हम कर क्यों नहीं पा रहे हैं? ये सरकारी आंकड़े ही हैं कि देश के मुख्य बांधों की वर्षा जल भंडारण क्षमता सिर्फ दो सौ सत्तावन अरब घनमीटर ही है। यह अलग बात है कि बारिश के दिनों में बांधों, जलाशयों में भंडारित जल के अलावा करीब चार सौ अरब घनमीटर पानी जमीन सोख कर अपन गर्भ में जमा कर लेती है और इस भूजल को हम पूरे साल उलीच कर इस्तेमाल करते हैं। लेकिन नई चिंता की बात यह है कि पानी की बढ़ती जरूरतों की वजह से देश के ज्यादातर हिस्सों में भूजल का स्तर साल दर साल नीचे जा रहा है।

जाहिर है कि हर साल बारिश के दिनों में जितने भूजल का पुनभंर्डारण हो रहा है, उससे ज्यादा भूजल उलीचा जा रहा है। अंधाधुंध भूजल दोहन की इस प्रवृति ने एक नए संकट का सायरन बजा दिया है। हालांकि यह अच्छी बात है कि सरकारी जल विज्ञानी इस बात को छुपा नहीं रहे हैं, बल्कि दो साल पहले ही नीति आयोग की वाटर कंपोजिट इंडेक्स रिपोर्ट में आगाह कर दिया गया था कि भूजल पर अत्यधिक निर्भरता के कारण देश के इक्कीस शहरों के पास पीने के पानी का भी टोटा पड़ जाएगा। हिसाब लगा कर बाकायदा तारीख भी बता दी गई थी कि सन 2020 तक यह संकट आ जाएगा। वह तारीख गुजर चुकी है, लेकिन ज्यादा पता नहीं चला कि इस समय भूजल स्तर की वास्तविक स्थिति है क्या? यानी इस साल गर्मियों में देश में पानी को लेकर अगर हाहाकार मचा तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

यह मान लेने में संकोच नहीं होना चाहिए कि जल भंडारण के उपाय करने में सबसे ज्यादा अड़चन बांध विरोधी अभियानों ने डाली। पिछले तीन दशकों में तो बांध विरोधी अभियानों का तांता लगा रहा। लेकिन उस दौरान इस बात पर बहस कम हुई कि जल भंडारण के लिए बांधों या जलाशयों का विकल्प क्या है? अलबत्ता बाद में यह जरूर कहा जाने लगा कि बड़े बांधों की बजाय पारंपरिक तालाबों की व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए। लेकिन जब उस तरफ सोचा गया तो पता चला कि अच्छे भले पुराने तालाबों को जिंदा बनाए रखने का काम ही शहरीकरण की भेंट चढ़ा चला जा रहा है। देश में जल भंडारण के लिए जो पांच हजार बड़े और मझोले बांध उपलब्ध हैं।

दरअसल वक्त के साथ पुराने बांधों में गाद मिट्टी जमा हो जाती है और इससे उनकी जल संभरण क्षमता और कम हो जाती है। भारत के बहुत से बांध अपनी मियाद पूरी कर चुके हैं। ऐसे में बांधों का विकल्प फौरन ही तलाशने की दरकार है। छोटे बांधों के पक्ष में माहौल बनाने की जरूरत है। इसके अलावा दूसरा कोई चारा भी नहीं है। इजराइली जल विज्ञानी माईकेल इवेनारी ने सिद्ध किया था कि छोटी जल संरचनाएं लाभ लागत के हिसाब से मुनाफे का सौदा हैं। जबकि हम यही मानते रहे हैं कि बड़े बांध ही आर्थिक रूप से व्यावहारिक हैं। वैसे भी देश की मौजूदा माली हालत के मद्देनजर बड़े बांधों की परियोजनाओं के लायक हम बचे नहीं हैं।

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