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नवब्राह्मणवाद से मुक्ति की ज्योति

46 साल पहले आचार्य श्रीराम शर्मा ने आगरा के आंवलखेड़ा गांव से आकर हरिद्वार के सप्त-ऋषियों की तपोभूमि सप्त-सरोवर में अखंड दीपक की स्थापना कर अखिल विश्व गायत्री तीर्थ शांति कुंज की नींव डाली थी।

आचार्य श्रीराम शर्मा

46 साल पहले आचार्य श्रीराम शर्मा ने आगरा के आंवलखेड़ा गांव से आकर हरिद्वार के सप्त-ऋषियों की तपोभूमि सप्त-सरोवर में अखंड दीपक की स्थापना कर अखिल विश्व गायत्री तीर्थ शांति कुंज की नींव डाली थी। यह अखंड दीपक आचार्यश्री ने अपनी जन्मभूमि आंवल खेड़ा में 1926 की बसंत पंचमी को प्रज्वलित किया था। 1971 में आगरा-मथुरा की जगह उन्होंने अपनी कर्मभूमि के रूप में हरिद्वार को चुना। श्रीराम शर्मा महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर स्वतत्रंता आंदोलन में कूद पड़े और कई बार जेल भी गए। आजादी के बाद उन्होंने गांधी के विचारों को धरातल पर उतारने की कोशिश की। शांतिकुंज के रूप में आज यह संस्था वटवृक्ष के रूप में खड़ी है। आध्यात्मिक साधना के साथ मानव को शिक्षित, संस्कारवान, स्वावलंबी और सजग नागरिक बनाने का कार्य इस संस्था में किया जा रहा है। यहां वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ, स्वच्छता अभियान, दहेज विरोधी अभियान, आदर्श विवाह, युवा जागृति अभियान, निर्मल गंगा जन अभियान, कृषि संवर्धन अभियान, कुटीर उद्योग संरक्षण-संवर्धन अभियान जैसे कई सामाजिक अभियान चलाए जा रहे हैं।
भारतीय संस्कृति में आई कुरीतियों के खिलाफ शांतिकुंज ने पूरे देश में अभियान छेड़ा।

जाति-प्रथा को तोड़ने और नारी जागरण के क्षेत्र में क्रांतिकारी काम किए। नारी जागरण की शुरुआत श्रीराम शर्मा ने अपने घर से की। उन्होंने अपनी पत्नी और बेटी को गायत्री मंत्र से दीक्षित किया और उनका यज्ञोपवित संस्कार करवाया। उस वक्त महिलाओं के लिए गायत्री मंत्र का जाप करना और यज्ञोपवित धारण करना सनातन धर्म में वर्जित था। आचार्य ने सनातन धर्म में कर्मकांड कराने वाले पुरोहितों की परिभाषा बदल डाली। हिंदू धर्म में धार्मिक कर्मकांड कराने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को ही है। लेकिन आचार्यश्री ने इस प्रथा को जाति-उन्मूलन अभियान चलाकर तोड़ा। आदिवासियों, पिछड़ों, दलितों और समाज के अन्य उपेक्षित वर्गों को वैदिक कर्मकांड की शिक्षा-दीक्षा देकर उन्हें पुरोहित के रूप में स्थापित किया। आज शांतिकुंज में विभिन्न जातियों से जुड़े लोग वैदिक कर्मकांड कराने वाले पुरोहित के रूप में देखे जा सकते हैं।

युवकों में छात्र जीवन से ही भारतीय वैदिक संस्कृति का बीजारोपण करने के लिए शांतिकुंज भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का आयोजन हर वर्ष देश के सभी स्कूल-कॉलेजों में करवाता है। इसके अतिरिक्त शांतिकुंज में अध्यापक शिक्षण सत्र, परिवार निर्माण सत्र, संगीत साधना शिविर, तीर्थ सेवन सत्र, योग और साधना सत्र निरंतर चलते रहते हैं। सामूहिक विवाह, सामूहिक यज्ञोपवित और सामूहिक मुंडन समारोह शांतिकुंज में कराए जाते हैं। 1994 में अखिल विश्व गायत्री परिवार, शांतिकुंज के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा के उत्तराधिकारी के रूप में उनके दामाद डाक्टर प्रणव पंड्या ने संस्था की कमान संभाली और 2002 में डॉक्टर पंड्या ने शांतिकुंज को नई दिशा देने के लिए देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना की। इस विश्वविद्यालय में वैदिक संस्कृति से जुड़े ऋषियों के साथ-साथ आधुनिक विषय भी पढ़ाए जाते हैं। डॉक्टर पंड्या मूलत: गुजरात के रहने वाले हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा मध्य प्रदेश में हुई। वे बीएचईएल भोपाल और हरिद्वार में एमबीबीएस मेडिसिन चिकित्सक रहे।

आज शांतिकुंज सामाजिक परिर्वतन को लेकर आचार्यश्री के आदर्श वाक्यों – मानव मात्र एक समान, नर और नारी एक समान, जाति वंश एक समान, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है, को लेकर पूरे संसार को बदलने के अभियान में जुटा है। गायत्री साधना और यज्ञ साधना का वैज्ञानिक महत्त्व लोगों को समझाने के लिए ब्रह्मवर्चस्व शोध संस्थान की स्थापना की गई। आज शांतिकुंज भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी आस्था रखने वाले लोगों के लिए श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। भारतीय संस्कृति को नवब्राह्मणवाद की जिन खोखली और संकीर्ण जंजीरों ने जकड़ रखा था, उसे तोड़ने का काम काफी हद तक शांतिकुंज ने किया। संस्थान का मानना है कि अगर हम धर्मसापेक्ष होकर समाज में भेदभाव दूर करें तो समतामूलक समाज बनेगा।

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