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राजनीतिः मुद्दा आतंकवाद की परिभाषा का

भारत ने वर्ष 1996 में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि को अपनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव रखा था, लेकिन अमेरिका, ओआइसी के सदस्य देशों और कुछ लैटिन अमेरिकी देशों के विरोध और मतभेद के चलते इस प्रस्ताव को अंगीकृत नहीं किया जा सका था।

भारत में आतंकवाद को प्रतिस्पर्धी उद्योग के रूप में न पनपने देने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी।

विवेक ओझा

संयुक्त राष्ट्र महासभा में आतंकवाद की एक सार्वभौमिक परिभाषा को लेकर भारत के संधि संबंधी प्रस्ताव को दक्षिण एशियाई देश नेपाल का समर्थन मिला है। नेपाल ने साफ कर दिया है कि वह 1996 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत द्वारा प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि के प्रस्ताव को पूर्ण समर्थन देगा। पिछले कुछ वर्षों से भारत ने लगातार पूरी दुनिया के देशों से इस संधि के समर्थन में सहयोग मांगा है। इस संधि के सार्वभौमिक समर्थन के लिए भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा, ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन, जी-20, इस्लामिक सहयोग संगठन (आइओसी) सहित सभी प्रमुख मंचों पर कूटनीतिक प्रयास किए हैं। ऐसे में नेपाल जैसा पड़ोसी देश जो हाल में चीन और पाकिस्तान के प्रभाव में दिखा है, से ऐसा समर्थन मिलने की बात इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह राजनीतिक और आर्थिक दोनों रूपों में विभाजित दक्षिण एशियाई देशों में अंतरराष्ट्रीय आंतकवाद की एक सार्वभौमिक परिभाषा वाले प्रस्ताव के पक्ष में सोचने की दिशा तय कर सकता है। वस्तुत: नेपाल सहित अन्य दक्षिण एशियाई देशों और आइओसी के सदस्य देशों पर इस संधि को पूर्ण समर्थन देने का दबाव हाल में बढ़ा है। जब से पाक प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) ने कमर कसी है, तब से दुनिया के कई देशों में आंतकवाद से निपटने की पारंपरिक मानसिकता में बदलाव देखे गए हैं।

नेपाल के इस बदले अंदाज और भारत के समर्थन के कारणों की पड़ताल अमेरिकी विदेश विभाग की पिछले साल नवंबर में जारी रिपोर्ट ‘कंट्री रिपोर्ट ऑन टेररिज्म 2018’ से की जानी चाहिए। इस रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि इंडियन मुजाहिदीन (आइएम) ने भारत के खिलाफ आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए नेपाल को अपना सबसे बड़ा अड्डा बना लिया है। उसने लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हरकत उल-जिहादी इस्लामी से भी गठजोड़ कर लिया है। रिपोर्ट कहती है कि आइएम का पहला मकसद भारत में आतंकी घटनाओं को अंजाम देना है। इसी के तहत उसने अपना दायरा बढ़ाते हुए नेपाल को अपना सबसे बड़ा केंद्र बनाया। इसके लिए उसे पाकिस्तान सहित मध्यपूर्व के देशों से पैसा भी मिलता है। इसलिए नेपाल भारत के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों में सुधार के लिए कुछ सकारात्मक मानसिकता प्रदर्शित करना चाहता है।

पिछले साल सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि को तत्काल स्वीकार करने, इस पर हस्ताक्षर करने और इसका समर्थन करने के लिए राष्ट्रों से अपील की थी। साथ ही, कई क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत ने इसे मूर्त रूप देने के लिए राष्ट्रों से सहयोग मांगा था, क्योंकि आतंकवाद की कोई सार्वभौमिक स्वीकृत परिभाषा नहीं होने की वजह से विभिन्न देशों के राष्ट्रीय कानूनों में आतंकवाद और आतंकवादियों से निपटने संबंधी प्रावधानों में अस्पष्टता बनी रहती है। इसीलिए भारत ने वर्ष 1996 में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि को अपनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव रखा था, लेकिन अमेरिका, ओआइसी के सदस्य देशों और कुछ लैटिन अमेरिकी देशों के विरोध और मतभेद के चलते इस प्रस्ताव को अंगीकृत नहीं किया जा सका था।

अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि (सीसीआइटी) संबंधी प्रस्ताव वैश्विक स्तर पर आतंकवाद से निपटने की एक वैधानिक रूपरेखा पेश करता है। यह सभी हस्ताक्षरकर्ता देशों पर बाध्यकारी दायित्व तय करने का प्रस्ताव करता है कि वे आतंकी समूहों के वित्तपोषण और उन्हें सुरक्षित पनाह देने का काम न करें। सीसीआइटी के मुख्य उद्देश्य उद्देश्यों की बात करें तो इसमें कुछ ठोस प्रावधान करने की बात की गई है। इस संधि में जिन प्रमुख बातों को रखा गया है उनमें पहली यह कि आतंकवाद की एक सार्वभौमिक परिभाषा, जिसे संयुक्त राष्ट्र के सभी एक सौ तिरानवे सदस्य देश अपने आपराधिक कानूनों में शामिल करें। दूसरी बात यह कि इसका उद्देश्य सभी आतंकी समूहों को प्रतिबंधित करना और सभी आतंकी शिविरों को खत्म करना है। इस संधि में राष्ट्रीय सरकारों से ऐसा करने का आह्वान किया गया है। तीसरी बात, सभी आतंकवादियों के खिलाफ विशेष कानूनों के तहत मुकदमा चलाने का प्रावधान करना और इसे राष्ट्रों पर बाध्यकारी बनाने को लेकर है।

भारत का मानना है कि सामान्य कानून और व्यवस्था से संबंधित नियम-कानूनों की बजाय विशिष्ट आतंक निरोधक कानूनों के जरिए ही इस समस्या से निपटा जा सकता है, वरना आतंकवादियों को संरक्षण के रास्ते खुले रहेंगे। यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि पाकिस्तान ने आतंकी संगठनों और उनके मुखियाओं के खिलाफ कानून व्यवस्था बनाए रखने के कानूनों के तहत कार्रवाई की है, न कि आतंकवाद निरोधक कानून, 1997 के तहत। इससे पाकिस्तान की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। पाकिस्तान ने मसूद अजहर और हाफिज सईद पर मुकदमा शांति के भंग करने के आरोपों के तहत चलाया है, न कि आंतकवाद निरोधक कानूनों के तहत।

चौथा सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि सीमा पार आतंकवाद को विश्वव्यापी स्तर पर एक प्रत्यर्पण योग्य अपराध बनाना, ताकि एक देश से भाग कर दूसरे देश में रह रहे आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई संभव हो सके। इस संदर्भ में भारत और अफगानिस्तान के बीच 2016 में हुई प्रत्यर्पण संधि का जिक्र आवश्यक है, जिसके अनुमोदन पत्र का दोनों देशों ने निर्णायक रूप से आदान-प्रदान पिछले साल नवंबर में किया था। इस प्रत्यर्पण संधि से भारत और अफगानिस्तान के बीच आतंकवादियों, आर्थिक अपराधियों और ऐसे ही अन्य अपराधियों के प्रत्यर्पण का कानूनी रास्ता खुल जाएगा। वैश्विक आंतकवाद से निपटने के लिए ऐसा ही विधिक सहयोग सभी राष्ट्रों के मध्य होना अपेक्षित है।

सीसीआइटी में इतने प्रभावी और समाधान आधारित प्रावधान होने के बावजूद इसके मार्ग में अवरोध बने हुए हैं और यह मूर्त रूप नहीं ले पा रहा है। सबसे पहले तो ओआइसी के सदस्य देशों के विरोध के चलते यह परवान नहीं चढ़ सका। ओआइसी देशों का मानना रहा है कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलनों को आतंकवाद की परिभाषा से बाहर रखा जाए, जैसे इजरायल और फिलस्तीन का युद्ध और इस आधार पर फिलस्तीन के उग्रवादी और आतंकी गुटों के कार्यकलापों को वैध ठहराया जाना। दूसरा, पाकिस्तान जैसे देश आतंकियों को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देखते हैं और आतंकी कृत्य को एक धर्म युद्ध के रूप में। पाक अधिकृत कश्मीर में आजादी की लड़ाई को पाकिस्तान एक जेहाद के रूप में देखता है। इसलिए वह भारत द्वारा प्रस्तावित इस संधि का विरोध करता है। इसी तरह कुछ लैटिन अमेरिकी देशों जैसे कोलंबिया, वेनेजुएला, क्यूबा और पेरू में साम्यवादी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए पृथकतावादी आंदोलन और उससे संबंधित कार्यों को आतंकी कृत्य और आतंकवाद की परिभाषा में शामिल न करने पर जोर दिया जाता रहा है। इन कारणों से सीसीआईटी पर वैश्विक सर्वसम्मति नहीं बन पाई है।

इन समस्त अवरोधों के बावजूद भारत जिस मुखरता से हर साल संयुक्त राष्ट्र महासभा के सालाना सम्मेलन में इस संधि को सभी देशों द्वारा अंगीकार करने और उसे वैधानिक रूप से बाध्यकारी बनाने के लिए प्रयासरत है, उसे देख कर तो लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब भारत इस संधि के पक्ष में अधिकतम समर्थन जुटा लेगा। इसके साथ ही भारत सहित वैश्विक स्तर पर आतंकी समूहों की रणनीति में आ रहे आमूलचूल बदलावों को ध्यान में रखते हुए भारत में आतंकवाद को प्रतिस्पर्धी उद्योग के रूप में न पनपने देने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी।

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