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राजनीतिः अगर धरती को बचाना है

जंगल जिस रफ्तार से नदारद हो रहे हैं उसी रफ्तार से नदारद होते रहे तो आक्सीजन कहां से मिलेगी? यदि ये जंगल नहीं रहेंगे तो आकाश में कार्बन डाइआक्साइड की एक सघन परत सतत जमती जाएगी। उस कार्बन डाइआक्साइड के कारण वातावरण का तापमान बढ़ रहा है। अगर तापमान बढ़ता चला गया तो इस धरती पर से जीवन का अंत निश्चित है।

सांकेतिक फोटो

‘द ह्यूमन डाइमेंशन आॅफ क्लाइमेट चेंज’ रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन की वजह से एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर आने वाले संकट के बारे में कहा गया है कि इससे कुछ शहरों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है। भारी वर्षा इस क्षेत्र को तबाही की ओर ले जा रही है। इन शहरों में भारत के मुंबई, चेन्नई, सूरत और कोलकाता भी शामिल हैं। एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) और जर्मनी के ‘पाट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेंट रिसर्च’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भी जलवायु परिवर्तन से एशियाई देशों में होने वाली बारिश में पचास फीसद तक बढ़ोतरी होगी। इस सदी के अंत तक एशिया-प्रशांत क्षेत्र के तापमान में छह डिग्री तक इजाफा दर्ज किया जाएगा। वहीं चीन, तजाकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन के उत्तर-पश्चिम का तापमान आठ डिग्री तक बढ़ जाएगा। बारिश के कारण एशिया प्रशांत के उन्नीस शहरों के आसपास समुद्र के स्तर में एक मीटर तक वृद्धि होगी। इनमें से सात शहर तो केवल फिलीपींस में मौजूद हैं। ये डूब जाएंगे। भारी बाढ़ के कारण सबसे ज्यादा आर्थिक क्षति झेलने वाले बीस बड़े शहरों में से तेरह एशिया में हैं। इन शहरों में बाढ़ से होने वाली क्षति साल-दर-साल बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण क्षेत्र में कम दिनों में अधिक बारिश होगी।

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गुजरात और राजस्थान के कुछ इलाकों में न केवल मूसलाधार बारिश हुई, बल्कि वर्षा कई दिन तक लगातार जारी रही। अमदाबाद में इस महीने हुई वर्षा ने 112 साल का रिकार्ड तोड़ दिया है। ऐसे में नदी-नालों का उफनना स्वाभाविक है। इसी तरह राजस्थान में सिरोही, जालौर, पाली और बाड़मेर सहित ग्यारह जिले बाढ़-प्रभावित हैं। शुष्क क्षेत्रों में अतिवृष्टि अगर जलवायु परिवर्तन का परिणाम है तो इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है, क्योंकि 2015 के आखिर में अतिवृष्टि ने इसी तरह चेन्नई को पानी में डुबो दिया था। पिछले करीब एक दशक से राजस्थान के बाड़मेर और कुछ अन्य जिलों में जलस्तर तुलनात्मक रूप से ऊपर उठा है और बारिश होने पर दलदल की स्थिति पैदा हो जाती है।

जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश अपना रास्ता बदल रही है। अब राजस्थान और गुजरात के रेगिस्तानी इलाकों में जहां सूखा रहता था वहां भारी बारिश और बाढ़ आ रही है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के सूखे इलाके भी भारी बारिश और बाढ़ का कहर झेल रहे हैं। आइआइटी, मुंबई ने बारिश के 112 साल के आंकड़ों का हिसाब लगा कर बताया है कि देश के कुल 632 में से 238 जिलों में बरसात का पैटर्न बदल चुका है। बदले हुए पैटर्न को राजस्थान और गुजरात में देखा जा सकता है। सन 1901 से 2013 के बीच राजस्थान में 9 प्रतिशत तो गुजरात में 26.2 प्रतिशत ज्यादा बारिश दर्ज की गई है। आइआइटी, मुंबई की यह रिपोर्ट आने के तुरंत बाद अमेरिका स्थित मैसाचुएट्स इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी ने भी अपने एक शोध में बताया कि पिछले पंद्रह सालों में भारत के उत्तरी और मध्य इलाकों में अच्छा पानी बरसा है, लेकिन इसका जोर उन इलाकों में ज्यादा है जो हाल तक सूखे रहते थे। आज जरूरत इस बात की है कि अब हमें इस चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। महाराष्ट्र और कर्नाटक में पानी के संचय और निकासी के पुख्ता इंतजाम करना चाहिए। इन इलाकों में नए सिरे से खेतीबाड़ी करने की व्यवस्था करनी होगी।

बांग्लादेश में हर साल भयंकर बाढ़ें आ रही हैं, विचित्र प्रकार की बाढ़ें आती हंै। नदियां उलटी दिशा में बहती हैं क्योंकि सागर उतना पानी नहीं ले सकता। वे बांग्लादेश की सारी फसल नष्ट कर देती हैं। बांग्लादेश गरीब है, और ये बाढ़ें हजारों लोगों को, हजारों पशुओं को जान से मार डाल रही हैं, हजारों मकान तबाह हो रहे हैं और अब बांग्लादेश कुछ नहीं कर सकता। नेपाल से यह कहना कि ये पेड़ मत काटो, उसकी शक्ति से बाहर है। पहली बात, नेपाल इन वृक्षों को काटना रोक भी दे, तो भी नुकसान तो हो ही चुका है। और दूसरी बात, नेपाल इन वृक्षों के कटने पर रोक नहीं लगा सकता। उसने उन्हें आने वाले तीस वर्षों के लिए बेच डाला है। वह उनके बदले में पैसे ले चुका है ताकि वह जीवित रह सके। इसी तरह की परिस्थिति दुनिया के अनेक इलाकों में है। पूरी दुनिया में उष्णकटिबंधीय जंगल दो करोड़ हेक्टेयर प्रतिवर्ष की रफ्तार से नदारद हो रहे हैंं- कैलीफोर्निया का आधा क्षेत्र। और कैलीफोर्निया अमेरिका के सबसे बड़े प्रदेशों में एक है। अगले बीस या तीस सालों में सभी उष्ण कटिबंधीय जंगल विनष्ट हो जाएंगे।

जंगल जिस रफ्तार से नदारद हो रहे हैं उसी रफ्तार से नदारद होते रहे तो मनुष्य जाति की समझ में नहीं आएगा कि आक्सीजन कहां से मिलेगी? और दूसरी तरफ आप जो कार्बन डाइआक्साइड छोड़ते हो उसे ये जंगल पी जाते हैं। यदि ये जंगल नहीं रहेंगे तो आकाश में कार्बन डाइआक्साइड की एक सघन परत सतत जमती जाएगी। उस कार्बन डाइआक्साइड के कारण वातावरण का तापमान बढ़ रहा है। वह पहले जितना होता था उससे कुछ डिग्री अधिक हो गया है। अगर तापमान बढ़ता चला गया तो इस धरती पर से जीवन का अंत निश्चित है। बिना सोचे-समझे वृक्षों की कटाई हो रही है, घटिया दर्जे के कागजों के लिए। आप जीवन को नष्ट कर रहे हैं। इसकी भी संभावना है कि हिमालय की बर्फ पिघलने लगे। ऐसा समूचे अतीत में कभी नहीं हुआ है। यदि ऐसा हुआ तो सागर कई फुट ऊपर उठ जाएगा और सभी तटवर्ती शहरों को डुबो देगा- जैसे न्यूयार्क, लंदन, सानफ्रांसिस्को, एमस्टरडम, मुंबई और कोलकाता। आने वाले तेरह वर्षों में विश्व की जनसंख्या में तीस से चालीस प्रतिशत तक वृद्धि होने की संभावना है। साढ़े सात अरब से बढ़ कर नौ अरब लोग हो जाएंगे। जनसंख्या की यह वृद्धि संसार के लगभग आधे हिस्से में पानी की जरूरत दोगुनी कर देगी और हमारे पास उतना पीने का पानी नहीं है। अन्न का भी भारी संकट पैदा हो जाएगा।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट कहती है कि प्रतिवर्ष साठ लाख हेक्टेयर कृषियोग्य और चराऊ जमीन बंजर जमीन में परिवर्तित हो रही है, और प्रतिवर्ष दो करोड़ हेक्टेयर जमीन की उत्पादकता शून्य हो रही है। प्रतिवर्ष सैकड़ों पौधे और जानवरों की जातियां नामशेष हो रही हैं। यह संख्या आसानी से हजारों में बदल सकती है, चूंकि जंगल और चारागाह जमीन से गायब हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट में जिन बुनियादी समस्याओं की चर्चा की गई है वे वास्तव में एक व्यापक समस्या का कुछ अंश हैं। पर रिपोर्ट वास्तविक समस्याओं की उपेक्षा करती है। वह कहती है कि राष्ट्रों को मिलजुल कर काम करना चाहिए लेकिन जड़ों की तरफ ध्यान नहीं देती कि इस धरती के पर्यावरण को कौन सबसे ज्यादा बिगाड़ रहा है। अमेरिका में विश्व की पांच फीसद आबादी रहती है लेकिन ग्रीनहाउस गैसों के कुल उत्सर्जन में उसका लगभग एक चौथाई योगदान है। बहरहाल, यदि हमें सचमुच इन समस्याओं का कुछ समाधान खोजना है तो अभी, इसी समय करना चाहिए, अन्यथा भविष्य होगा ही नहीं। जीवन अलग-अलग द्वीपों की भांति नहीं होता। सारी दुनिया का जीवन धरती के पर्यावरण पर निर्भर है।
हजारों वर्ष से मनुष्य मनमाने ढंग से जीता रहा है और उसने धरती के संसाधनों का बेहिसाब दुरुपयोग किया है। अब यह और संभव नहीं है। यदि हमें अपनी धरती को बचाना है तो नई पीढ़ी को सिखाना होगा कि अपने रहन-सहन और आधुनिक विकास के जो तौर-तरीके उसने अपनाए हैं उन्हें वह न अपनाए।

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