ड्रोन के बढ़ते खतरे

पूरी दुनिया इस आशंका से भयभीत है कि कहीं आतंकवादी भी ड्रोन का इस्तेमाल न करने लगे।

सांकेतिक फोटो।

अभिषेक कुमार सिंह

पूरी दुनिया इस आशंका से भयभीत है कि कहीं आतंकवादी भी ड्रोन का इस्तेमाल न करने लगें। अगर ऐसा हुआ तो उनकी धरपकड़ करने और इसके बाद उन्हें दंडित कर पाना नामुमकिन हो जाएगा। इस खतरे की आहट हमारे देश को मिल चुकी है। इस साल 27 जून को जम्मू में वायुसेना के अड्डे पर ड्रोन के जरिए ही आतंकी हमला किया गया था।

बीस साल तक तालिबान से आधी-अधूरी जंग लड़ने और नाकामी के कलंक के साथ अफगानिस्तान से वापस लौटती अमेरिकी सेना ने जाते-जाते पूर्वी अफगानिस्तान में एक ड्रोन हमला किया। दावा किया गया कि इस हमले में इस्लामिक स्टेट-खुरासान का एक आतंकी मारा गया। इस आतंकी गुट ने काबुल हवाई अड्डे पर फिदायीन हमला कर करीब डेढ़ सौ जानें ले ली थीं। इससे अमेरिका की खूब किरकिरी हुई। अमेरिका ने जवाबी ड्रोन हमला कर यह संदेश देने की कोशिश की कि तकनीक के बल पर वह जहां चाहे और जब चाहे, हमले कर सकता है। हालांकि तालिबान से बीस साल तक चले संघर्ष में मिली हार यह साबित कर रही है कि युद्ध इंसानी ताकत और जिजीविषा के बल पर ज्यादा लड़े जाते हैं, तकनीक तो उसमें सिर्फ एक सहयोगी की भूमिका ही निभा सकती है। लेकिन दुनिया भर में हो रहे तकनीकी विकास के बल पर दावे किए जा रहे हैं कि भविष्य में बड़े युद्ध रोबोट, कृत्रिम बुद्धि, ड्रोन आदि के दम पर लड़े जाएंगे। यही नहीं, आतंक से मुकाबले में भी यही तकनीकी विकास हमारे काम आएगा। खासतौर से ड्रोन को इसी नजरिये से देखा जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि ड्रोन का काम सिर्फ जंग लड़ना ही नहीं है। खोजबीन, निगरानी, जासूसी, आपूर्ति, फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी जैसे कई कामों में मानवरहित विमानों यानी ड्रोन की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई है। इसी के मद्देनजर हाल में भारत ने भी अपनी ड्रोन नीति में बड़े बदलाव किए हैं। इस ड्रोन नीति (उदारीकृत ड्रोन नियम, 2021) के तहत नए छोटे उद्यमों और अन्य हितधारकों को काफी लाभ होने की उम्मीद है, क्योंकि पहले की ड्रोन नीति (यूएएस नियमावली, 2021) में ड्रोन उड़ाने से पहले काफी ज्यादा कागजी औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती थीं।

ड्रोन उड़ाने के लिए इजाजत लेने के अलावा मुश्किल यह थी कि देश में उन्हें संचालित करने के लिए बहुत कम क्षेत्र उपलब्ध थे। पर अब नए नियमों के अनुसार ग्रीन जोन में ड्रोन उड़ाने के लिए कोई मंजूरी नहीं लेनी होगी। साथ ही, हवाई अड्डे के आसपास के इलाकों में आठ से बारह किलोमीटर के क्षेत्र में दो सौ फीट की ऊंचाई तक ड्रोन संचालन के लिए कोई मंजूरी नहीं लेनी होगी। इसके अलावा नई ड्रोन नीति में हवाई टैक्सी के संचालन के साथ-साथ खेती, खनन, बुनियादी ढांचों के निर्माण, निगरानी, परिवहन, मानचित्र बनाने, रक्षा और कानून लागू करने संबंधी कामकाज में ड्रोन का आसानी से इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे देश के दूरदराज और दुर्गम क्षेत्रों में रोजगार बढ़ सकता है और आर्थिक विकास को गति मिल सकती है। यही नहीं, इससे यह संभावना भी जगी है कि सूचना प्रौद्योगिकी और नवाचार के मामले में घरेलू मांग को देखते हुए वर्ष 2030 तक भारत वैश्विक ड्रोन केंद्र बन सकता है।

बेशक, अब ड्रोन को दुनिया भर में एक महत्त्वपूर्ण तकनीक के रूप में देखा जा रहा है। पर इसका सबसे विस्मयकारी और विवादास्पद पक्ष युद्ध में इसका इस्तेमाल है। इसमें सबसे बड़ी दुविधा ड्रोन के दोतरफा इस्तेमाल की है। यानी एक ओर जहां सरकारें अपने शत्रु देशों से जंग में इनका उपयोग कर सकती हैं, वहीं अपराध करने या आतंकवाद फैलाने के मकसद से अपराधी या आतंकी भी इनका बेजा इस्तेमाल कर सकते हैं। पूरी दुनिया इस आशंका से भयभीत है कि कहीं आतंकवादी भी ड्रोन का इस्तेमाल न करने लगें। यदि ऐसा हुआ तो उनकी धरपकड़ करने और उन्हें दंडित कर पाना नामुमकिन हो जाएगा।

इस खतरे की आहट हमारे देश को मिल चुकी है। इस साल 27 जून को जम्मू में वायुसेना के अड्डे पर ड्रोन के जरिए ही आतंकी हमला किया गया था। इस हमले ने यही साबित किया कि ऊंचे दर्जे की तकनीक जब सुलभ होने लगती है तो वह कुछ अच्छाइयों के साथ बुराइयों को भी लेकर आती है। यह भारत में ड्रोन से किया गया पहला आतंकी हमला था। इसके बाद जांच एजेंसियों की सलाह पर राज्य सरकार ने जम्मू-कश्मीर में ड्रोन की उड़ानों पर रोक लगा दी थी। लोगों को अपने ड्रोन पुलिस थानों में जमा कराने को कह दिया गया। यहां तक कि कृषि, पर्यावरण संरक्षण और आपदाग्रस्त क्षेत्रों में सर्वेक्षण और निगरानी गतिविधियों के लिए ड्रोन का उपयोग करने वाले सरकारी विभागों को उनका उपयोग करने से पहले स्थानीय पुलिस थाने को सूचित करने के लिए कहा गया। लेकिन इतनी सावधानियों के बावजूद जून से लेकर जुलाई के मध्य पाकिस्तान से सटी सरहद के आसपास के इलाके में कई बार ड्रोन आते रहे। इससे देश में ड्रोन से पैदा होने वाले खतरे की घंटी साफ सुनी जा रही है।

पिछले करीब ढाई दशक से दहशतगर्द भी आतंक फैलाने के लिए इनके इस्तेमाल की कोशिशें करते रहे हैं। लेकिन जहां तक युद्ध में ड्रोन के इस्तेमाल की बात है तो ऐसे मानवरहित स्वचालित छोटे विमानों के उदाहरण हमें पहले विश्वयुद्ध के दौर में भी मिल जाते हैं। ड्रोन के जरिये युद्ध लड़ने की सटीक कोशिशें अमेरिका में बीती सदी के नब्बे के दशक में ही शुरू कर दी थीं। तब अमेरिकी सेना ड्रोन का इसेमाल सैन्य निगरानी के लिए करती थी। हालांकि वर्ष 2000 से पहले तक ड्रोन का ज्यादातर इस्तेमाल निगरानी से जुड़े कार्यों में ही होता था, लेकिन 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर अलकायदा के आतंकी हमले ने सब कुछ बदल दिया। इस हमले के बाद अमेरिका ने अपने सैन्य ड्रोन पर हथियार लगाने शुरू कर दिए थे। फिर 2001 में अफगानिस्तान में तालिबान पर हमले के लिए पहली बार ड्रोन का प्रयोग किया गया था। बाद में अमेरिका ने इराक, पाकिस्तान, सोमालिया, यमन, लीबिया और सीरिया में भी ड्रोन हमले किए।

एक रिपोर्ट के अनुसार 2029 तक दुनियाभर में अस्सी हजार से ज्यादा निगरानी ड्रोन और दो हजार से ज्यादा हमलावर ड्रोन खरीदे जाएंगे। इनमें भी अमेरिका, चीन, रूस, इजरायल, भारत, फ्रांस, आॅस्ट्रेलिया आदि देशों में सैन्य ड्रोन के प्रयोग में काफी ज्यादा इजाफा होने के संकेत हैं। यह बात इससे समझी जा सकती है कि पिछले साल जब अमेरिका ने भारत को चार अरब डॉलर में 30 सीगार्डियन (निहत्था नौसैनिक संस्करण) देने की पेशकश की, तो उधर खबर मिली कि चीन अपने दोस्त पाकिस्तान को चार सशस्त्र ड्रोन की आपूर्ति करने की प्रक्रिया में है। इसके अलावा वह पाकिस्तान के साथ संयुक्त रूप से 48 जीजे-2 ड्रोन के उत्पादन की योजना भी बना रहा है। ये ड्रोन चीन के डिजाइन किए गए ड्रोन विंग लूंग-2 का सैन्य संस्करण हैं। बन जाने के बाद इनका इस्तेमाल पाकिस्तानी वायुसेना करेगी। चीन का यह सशस्त्र ड्रोन हवा से जमीन पर मान करने वाली मिसाइल से लैस है। हालांकि चीन पहले से ही एशिया और पश्चिम एशिया में कई देशों में ड्रोन विंग लूंग-2 बेच रहा है। फिलहाल इसका प्रयोग लीबिया में जारी गृहयुद्ध में यूएई समर्थित बलों द्वारा त्रिपोली में तुर्की समर्थित सरकार के खिलाफ किया जा रहा है।

यह तो तय है कि एक देश के तौर पर हमारी सरकार को भी ड्रोन के सैन्य इस्तेमाल और आतंकी वारदातों में उनके प्रयोग को लेकर सजग रहना होगा। खासतौर से शत्रु पड़ोसी के रहते इस मामले में ज्यादा सतर्कता की जरूरत है। उल्लेखनीय है कि बीते दो सालों से पंजाब में 70-80 बार ड्रोन देखे जा चुके हैं। कुछ मामलों में उन्हें मार गिराया गया है। इसलिए एक तरफ हमें खुद को आधुनिक ड्रोन से लैस करना होगा, तो दूसरी तरफ ड्रोन के खतरों से निपटने की तैयारी भी करनी होगी।

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