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राजनीति: कृषि नीतियां और विकास

केंद्र और राज्य सरकारें कृषि को घाटे वाला क्षेत्र कह कर उसे उबारने की बात तो करती हैं, लेकिन कृषि घाटे में क्यों बनी रहती है? किसानों की माली हालात के लिए जिम्मेदार कौन है? किसानों की दी जाने वाली सुविधाएं क्या किसानों के लिए मुफीद हैं? ऐसे तमाम सवाल हैं, जिन पर गौर करने की जरूरत है।

खेतों में काम करता भारतीय किसान। (फोटो -इंडियन एक्सप्रेस)

इस साल रबी की लाखों एकड़ फसल बेमौसम बरसात के कारण बर्बाद हो गई। मार्च महीने में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में घनघोर आंधी-तूफान और ओले पड़े। इससे गेंहू, जौ, सरसों, अलसी, अरहर, मटर, आलू और सब्जियों की लाखों एकड़ जमीन में लहलहातीं फसलें जमीन पर लोटने या पानी में डूब कर सड़ने लगीं। उत्तर प्रदेश सरकार ने जिलाधिकारियों को जायजा लेने और उसके मुताबिक किसानों को राहत देने की बात कही है। कुदरत किसानों पर आए दिन कहर ढाती रहती है।

केंद्र और राज्य सरकारें तुरंत राहत देकर मरहम लगाने की कोशिश करती हैं। यह एक रिवाज की तरह आजादी के बाद से निभाया जा रहा है। इससे किसानों को फौरी तौर पर कुछ राहत तो मिल जाती है, लेकिन उनकी मूल समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। आजादी के बाद से अब तक केंद्र में कोई ऐसी सरकार नहीं आई, जिसने खेती-किसानी को सबसे कठिन और अनिश्चित धंधे से निकाल कर सरल और निश्चित आय का बनाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया हो। केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों में किसानों को लालीपॉप थमाने के अलावा कोई ठोस नीति या योजना नहीं रही। इसलिए समस्याएं लगातार बढ़ती जाती हैं।

दरअसल, भारत सहित दुनिया के सभी देशों की नीतियां खेती-किसानी के प्रति नकारात्मक रही हैं। मौजूदा विकास का मॉडल सुख-सुविधाओं से संपन्न शहर पर आधारित है। गांवों को विकसित करके उन्हें पूर्ण सक्षम बनाने की योजना, भारतीय कृषि नीति का हिस्सा कभी नहीं रही। गौरतलब है कि आजादी के पहले भारत का किसान गांव छोड़ कर शहरों की ओर पलायन करने की कभी नहीं सोचता था।

कुदरत की मार और विदेशी शासन की किसान-विरोधी नीतियों के कारण भी किसान अपना पुस्तैनी गांव और एकमात्र परिवार का सहारा खेती छोड़ने के लिए नहीं सोचता था। ऐसा क्या हो गया कि आजादी के बाद किसान धीरे-धीरे अपना पुस्तैनी काम-धंधा छोड़ कर शहर-कस्बों की ओर रुख करने लगा? शायद केंद्र और राज्य सराकारों ने कभी इस बारे में संजीदगी से सोचा ही नहीं।

विकसित देशों में कृषि वहां की अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंग नहीं है, इसलिए वहां कृषि और किसानी उनकी योजनाओं में कोई खास महत्त्व नहीं रखते। इसके बावजूद विकसित देशों के किसानों को वहां की सरकारें जो सुविधाएं, राहत, छूट और मदद देती हैं, उससे वहां का किसान अमन-चैन और सम्मान की जिंदगी जीता है। इसलिए कुदरत का कहर या अन्य समस्याओं की वजह से वहां का किसान आत्महत्या नहीं करता और न ही अनिश्चिय के भंवर में डूबता-उतराता है। पर वैश्विक स्तर पर कृषि की जो नीतियां चल रही हैं, वे किसानों के लिए किसी भी तरह फायदेमंद और राहत देने वाली नहीं हैं।

केंद्र की मौजूदा सरकार दावा कर रही है कि उसकी कृषि नीति पिछली सरकारों से बेहतर और किसानों को खुशहाली देने वाली है। अगर ऐसा है, तो गांव छोड़ कर अच्छी सुख-सुविधाओं और बेहतर आमदनी की आस में शहर आए लोग अपने गांव लौट क्यों नहीं रहे हैं? जबकि पिछले बहत्तर वर्षों में खादान्न उत्पाद बढ़ा है और केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से विविधता लाने के मकसद से फसल की किस्मों की उपलब्धता सुनिश्चित की गई। इससे जहां फसलों में पोषण की मात्रा बढ़ी, वहीं उनमें जलवायु परिवर्तन का सामना करने की सामर्थ्य भी बढ़ जाती है। लेकिन दूसरी ओर, मोनसेंटो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को बुला कर भारतीय कृषि और किसानों को बर्बाद करने के कदम विश्व व्यापार संगठन के समझौते के तहत उठाए गए।

मोनसेंटो के बीज परंपरागत बीजों से अधिक पैदावार तो देते हैं, लेकिन वे अगली बार बोने के लिए बेहतर नहीं होते और उससे जमीन के बंजर होने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है। इससे किसान दोहरी मार का शिकार हुआ। एक तो वह मोनसेंटो के बीज बोकर अपने खेतों की उर्वरा-शक्ति गंवा बैठा, वहीं परंपरागत बीजों के अनुकूल उसकी जमीन नहीं रह गई। इसी दौरान बिजली, पानी, खाद, उत्पाद का उचित दाम न मिलने, बिचौलियों के जरिए ठगे जाने और मंहगाई की मार जैसी समस्याएं किसानों को खेती छोड़ कर शहर की ओर पलायन करने पर मजबूर करती रही हैं।

वैश्विक स्तर पर विकास का मॉडल ही किसानों को खेती छोड़ने पर मजबूर करता है। गौरतलब है कि विकास के वैश्विक मॉडल को ही पिछले बहत्तर सालों से केंद्र सरकारें अपनाई हुई हैं। यह मॉडल किसानों को खेती से बेदखल कर उन्हें शहरों के लिए दिहाड़ी मजदूर बनाने वाला है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन कहते थे कि देश प्रगति के रास्ते पर तब तेजी से बढ़ेगा जब 2022 तक कम से कम अड़तीस प्रतिशत किसानों को खेती से बेदखल कर शहरों में दिहाड़ी मजदूर के रूप में लाया जाए, क्योंकि शहरों में दिहाड़ी मजदूरों की जरूरत है।

भारत की पहचान एक कृषि प्रधान देश की रही है। यहां की संस्कृति, भाषा, भाव, रीति-रिवाज, मान्यताएं और परंपराएं कहीं न कहीं कृषि से सीधे जुड़ते हैं। पर आजादी के बाद कृषि की जगह उद्योग-धंधों को हर तरह से प्रोत्साहित किया गया और किसानी और किसान को हर तरह से हतोत्साहित। इसी का परिणाम है कि लाखों की तादाद में किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हुए हैं। नेशनल स्कीम पॉलसी कहती है कि कृषि से देश की अर्थव्यवस्था को कोई खास फायदा नहीं हो रहा है। इसलिए उन क्षेत्रों को बढ़ावा देने की जरूरत है, जिनसे अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार मिले। आमतौर पर यह बात ठीक कही जाएगी, क्योंकि जिस क्षेत्र से आमदनी कम हो या बहुत कम हो, उस पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं। लेकिन गहराई से चिंतन करने से इस बात में कोई दम नजर नहीं आता।

सन 1970 में गेंहू का दाम पचहत्तर रुपए प्रति कुंतल था और 2015 में इसका दाम साढ़े चौदह सौ रुपए के आसपास था। इन पैंतालीस सालों के दौरान सरकारी नौकरी-पेशा लोगों के वेतन में 120-150 गुने की वृद्धि हुई। जबकि किसान की आमदनी में महज उन्नीस गुने की वृद्धि हुई। सरकारी कर्मचारियों को स्वास्थ्य भत्ता चार लाख अस्सी हजार रुपए मिलता है, सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारियों, जजों, कर्मचारियों को इक्कीस हजार रुपए अतिरिक्त भत्ता मिलता है। लेकिन किसानों के लिए न कोई भत्ता है, न कोई योजना, जिससे वे भी बिना तनाव के जी सकें।

अरबों रुपए पूंजीपतियों को बैंक दे देते हैं और न लौटाने पर उनकी न तो कुर्की होती है और न उन्हें परेशान किया जाता है। पर किसान को दस-बीस हजार के ऋण के लिए परेशान किया जाता है और उनके खेत, घरेलू सामान और मकान की कुर्की तक होती है। सवाल है कि जिसे अन्नदाता कहा जाता है, उसी के साथ ऐसा दोहरा और गैरइंसानी व्यवहार? क्या किसान ईमानदारी के साथ कठिन मेहनत करके देश को अन्न नहीं खिलाता?

केंद्र और राज्य सरकारें कृषि को घाटे वाला क्षेत्र कह कर उसे उबारने की बात तो करती हैं, लेकिन कृषि घाटे में क्यों बनी रहती है? किसानों की माली हालात के लिए जिम्मेदार कौन है? किसानों की दी जाने वाली सुविधाएं क्या किसानों के लिए मुफीद हैं? ऐसे तमाम सवाल हैं, जिन पर गौर करने की जरूरत है। कृषि वैज्ञानिक भी मानते हैं कि घाटे वाली खेती की सबसे बड़ी वजह किसान से ताल्लुक रखने वाली सरकारी नीतियां, उसके साथ दोहरा बर्ताव, उसकी उपेक्षा और खेती-किसानी को सबसे निम्न स्तर का मान कर उसके लिए कोई ठोस योजना न बनाना है। कृषि लागत और कृषि-उत्पाद के दाम में अंतर को भी समझने की जरूरत है। केंद्र और राज्य सरकारें जब तक कृषि के प्रति सकारात्मक और व्यावहारिक नीति नहीं बनातीं, तब तक, कृषि और कृषक को डूबने से बचाया नहीं जा सकता।

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