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शराब की बिक्री से किसका भला होगा?

इस कोरोना काल में सरकार की चिंता लोगों के रोजगार बचाने की होनी चाहिए। उनकी जान बचाने के साथ-साथ उन्हें स्वस्थ्य रखने के प्रयत्न करने चाहिए। पर हैरानी है कि सरकार शराब से आमदनी बढ़ाने में लगी हुई है!

सांकेतिक फोटो।

विजय गोयल

जो सरकार कोरोना महामारी के दौरान लोगों तक दवा नहीं पहुंचा पाई, वह लोगों के घर शराब पहुंचाएगी। दिल्ली सरकार का इसके पीछे तर्क है कि इससे लोग महामारी के दौरान शराब की दुकानों पर लाइन लगाने से बच जाएंगे, शराब की बिक्री बढ़ने से सरकार की आमदनी बढ़ेगी, उससे दिल्ली वासियों की सेवा की जाएगी। सरकार को शराब से आमदनी बढ़ाने की चिंता है, लेकिन दिल्ली में तेजी से पैर पसारती नशे की लत पर लगाम लगाने की फुरसत नहीं है। नई आबकारी नीति में शराब की बिक्री बढ़ाने के लिए 838 पुरानी दुकानों को बंद करके नई दुकानें खोली जा रही हैं।

दिल्ली सरकार को शराब से पांच हजार करोड़ रुपए राजस्व मिल रहा है। मार्च, 2021 में जब नई आबकारी नीति दिल्ली सरकार ले आई, जिसमें अन्य बदलावों के साथ-साथ शराब खरीदने वालों की उम्र पच्चीस साल से घटा कर इक्कीस साल करना तय किया, तब सरकार का अनुमान था कि इस नई आबकारी नीति से शराब से आमदनी करीब दो हजार करोड़ रुपए बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ मद्य निषेधालय का बजट घटा कर एक करोड़ रुपए कर दिया गया है। अगर शराब की बिक्री को ही प्राथमिकता देना है तो मद्य निषेधालय को बंद ही कर देना चाहिए। जबकि पहले यह तय था कि शराब से होने वाली आमदनी का एक फीसद शराब के खिलाफ प्रसार-प्रचार पर खर्च किया जाएगा।

पहले शहर में जगह-जगह महात्मा गांधी के होर्डिंग्स लगाए जाते थे, जिन पर गांधीजी का कथन ‘शराब शरीर और आत्मा दोनों का नाश करती है’ लिखा होता था। महात्मा गांधी ने कहा था कि साध्य के लिए किस साधन का इस्तेमाल किया जा रहा है, इसका उसके परिणाम पर सीधा असर होता है। शराब घर-घर पहुंचा कर लोगों को बीमार बना कर, उनके घरों की पूंजी का इस कोरोना महामारी के संकट में शराब की भेंट चढ़ा कर दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार कैसा समाज बना रही है। क्या यही नई तरह की राजनीति है? देश में मद्य निषेध के आंदोलन चलाए गए। लोगों ने कहा कि हमें शराब नहीं शिक्षा चाहिए।

आबकारी नीति में मंदिर और दूसरे धर्मस्थल या स्कूल के सौ गज के दायरे में शराब की दुकान खोलने पर पाबंदी है। अब जब घर-घर शराब पहुंचाई जाएगी तो इस तरह की पाबंदी का क्या मतलब रह गया है। आरोप है कि कुछ शराब कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार ने शराब की होम डिलिवरी का फैसला किया है। कहा जा रहा है कि शराब घर-घर पहुंचाने से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलेगा। इसी तरह के बेतुके तर्क सालों पहले तब दिए जाते थे, जब हमारी ‘लोक अभियान’ संस्था ‘लॉटरी’ बंद करने का आंदोलन चला रही थी। तब कहा जा रहा था कि लॉटरी बंद होने से हजारों लोगों का रोजगार चला जाएगा। इतना ही नहीं, सरकार को लॉटरी से काफी राजस्व मिलता है, उससे जन-उपयोगी काम कराए जाते हैं। 1997 में तब के प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल ने लॉटरी बंद करने के लिए अध्यादेश जारी कराया और 1998 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संसद में विधेयक लाकर लॉटरी को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया।

अगर राजस्व अर्जित करने का ही सवाल होता, तो महात्मा गांधी के गृहराज्य गुजरात में शराब पर स्थायी पाबंदी नहीं लगती। बिहार जैसे पिछड़े राज्य की राजग सरकार ने अप्रैल 2016 से शराब पर पाबंदी लगा दी। लोग राज्य की तंगहाली और शराब की तस्करी आदि के आधार पर शराबबंदी हटाने की मांग करते रहे, लेकिन सरकार ने अपना इरादा नहीं बदला। हरियाणा में भी चौधरी बंशीलाल ने शराबबंदी की थी, लेकिन शराब माफिया ने उसे सफल नहीं होने दिया। वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना के प्रसार में नशे की भी भूमिका है। खुद अरविंद केजरीवाल सरकार ने पिछले साल कोरोना महामारी के दौरान 5 मई, 2020 को शराब पर सत्तर फीसद उपकर लगा दिया था। लेकिन महीने भर में ही 9 जून, 2020 को उसे हटा कर जीएसटी को बीस से बढ़ा कर पच्चीस प्रतिशत कर दिया। इससे शराब पड़ोसी राज्यों के मुकाबले सस्ती हो गई और दिल्ली में इसकी बिक्री बढ़ गई।

कुछ साल पहले भी शराब की होम डिलिवरी की सुविधा दी गई थी, लेकिन उसके लिए साधन तय न करने से वह योजना सिरे नहीं चढ़ पाई। इस बार सरकार ने इसे लोकप्रिय बनाने के लिए शराब का होम डिलिवरी ऐप्प शुरू किया है, जिसके जरिए आॅनलाइन बुक कराया जा सकता है, जैसे घर के अन्य सामान इंटरनेट से बुक करा कर मंगाए जाते हैं। तर्क दिया जा रहा है कि बहुत सारे लोग लंबी लाइन और भीड़ के चलते शराब की दुकानों पर न जाकर ब्लैक में शराब खरीदते हैं। उन्हें दुकान पर लेने में झिझक होती है। संभव है, कुछ युवाओं का इस योजना का समर्थन मिले, लेकिन घर की महिलाओं से पता करें कि उन पर शराब का प्रसार बढ़ने से क्या बीतेगी।

यह कौन तय करेगा कि इस शराब के साथ देसी और मिलावटी शराब न घरों में पहुंचाई जाए। मिलावटी शराब से आए दिन लोगों के मरने की खबर आती है। अभी तक बहुत सारे लोग घर वालों से छिप कर या कभी-कभार शराब पीते थे। अब वे आसानी से हर रोज घर पर मंगा कर शराब पीने लगेंगे। जो शराब डिलिवरी मैन लेकर जाएंगे उन पर क्या दिल्ली सरकार की मुहर लगी होगी कि उस शराब के साथ दूसरी देसी शराब नहीं ले जाएगा। ज्यादा शराब पीने से लोग बीमार होंगे तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। इस बात की सरकार गारंटी लेगी कि इससे जो आमदनी होगी उसका उपयोग सरकार अपने प्रचार में रुपया फूंकने के बजाय जन सेवा के लिए करेगी।

जब कोरोना से संक्रमण दर बत्तीस फीसद था, तब कोई विज्ञापन नहीं आया था, अब संक्रमण दर एक फीसद हो गया है, तो अखबारों में हेल्प लाइन के होर्डिंग जारी किए हैं। कोरोना बंदी या लॉकडाउन में शराब का बिक्री जारी रखने का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है, सरकार कभी इसका सही आकलन करेगी? जब कोरोना मरीजों की संख्या हर रोज तीन हजार के पार चली गई थी और अस्पतालों में आॅक्सीजन से लेकर भर्ती होने के लिए अफरातफरी मची थी, तब तो सरकार लोगों के घरों में दवा या दूसरे जरूरी सामान भिजवाना तो दूर, कोरोना से जुड़ी सूचना तक नहीं भिजवा पा रही थी। तब दवाओं की होम डिलीवरी नहीं सूझी।

इस कोरोना काल में सरकार की चिंता लोगों के रोजगार बचाने की होनी चाहिए। उनकी जान बचाने के साथ-साथ उन्हें स्वस्थ्य रखने के प्रयत्न करने चाहिए। पर हैरानी है कि सरकार शराब से आमदनी बढ़ाने में लगी हुई है! कोरोना अभी खत्म नहीं हुआ है। उसकी तीसरी लहर आने की आशंका है। कोरोना के बाद लोग ‘ब्लैक फंगस’ से प्रभावित हो रहे हैं। लोगों ने अपने जीवन की गाढ़ी कमाई संकट के समय अपने और अपनों को बचाने के लिए जोड़ रखी होगी, सरकार उन्हें देने के बजाय शराब जैसी बुराई की भेंट चढ़ाने का एक और इंतजाम कर रही है। दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने का दावा करने वाली सरकार इसे शराब में डुबोने में लगी है। कायदे में तो दिल्ली जैसे छोटे राज्य, जहां राजस्व के काफी बड़े स्रोत पहले से मजबूत हैं, उसे और बेहतर बना कर दिल्ली को शराब रहित दुनिया की सबसे बढ़िया राजधानी बनाना चाहिए।
(लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)

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