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विनिर्माण केंद्र बनने की चुनौती

आत्मनिर्भर भारत अभियान में विनिर्माण के तहत चौबीस क्षेत्रों को प्राथमिकता के साथ तेजी से बढ़ाया जा रहा है।

जयंतीलाल भंडारी

देश को विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए वित्त वर्ष 2022-23 के बजट में जो प्रावधान सुनिश्चित किए गए हैं, उनका सफलता पूर्वक और जल्द ही क्रियान्वयन जरूरी है। यह भी जरूरी है कि देश में डिजिटल कौशल विकास और स्किल इंडिया से संबंधित विभिन्न योजनाओं पर तेजी से काम हो।

विनिर्माण क्षेत्र को लेकर आई रिपोर्टों में कहा गया है कि अगर भारत को इस क्षेत्र में दुनिया का बड़ा केंद्र बनना है तो इसके लिए मौजूद चुनौतियों का रणनीतिक समाधान निकालने पर जोर देना होगा। इसके लिए पांच रणनीतियों की जरूरत बताई गई है। पहली, देश में मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत अभियान और उत्पादन से संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना को तेजी से बढ़ावा देना।

दूसरी, चीन से छिटके उद्योगों, कंपनियों और पूंजी को भारत में लाना। तीसरी, भारत की अर्थव्यवस्था को निर्यात आधारित बनाने की कोशिशों पर जोर। चौथी, भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) और क्वाड सुरक्षा संवाद को सफल बना कर उद्योग-कारोबार को तेजी से बढ़ाना और पांचवा यह कि कौशल विकास एवं स्किल इंडिया को कामयाब बना कर श्रम की गुणवत्ता और नई कार्य संस्कृति को उत्पादन का अभिन्न अंग बनाना।

उल्लेखनीय है कि इस समय दुनियाभर में भारत में बने उत्पादों की मांग बढ़ रही है। आत्मनिर्भर भारत अभियान में विनिर्माण के तहत चौबीस क्षेत्रों को प्राथमिकता के साथ तेजी से बढ़ाया जा रहा है। चूंकि अभी भी देश में दवा, मोबाइल, चिकित्सा उपकरण, वाहन और बिजली उपकरण उद्योग जैसे कई अन्य उद्योग चीन से आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं।

ऐसे में चीन के कच्चे माल का विकल्प तैयार करने के लिए पिछले डेढ़ साल में सरकार ने उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना के तहत तेरह उद्योगों को करीब दो लाख करोड़ रुपए आवंटन के साथ प्रोत्साहन सुनिश्चित किए हैं। अब देश के कुछ उत्पादक चीन के कच्चे माल का विकल्प बनाने में सफल हो रहे हैं। पीएलआइ योजना से अगले पांच वर्षों में देश में पांच सौ बीस अरब डालर यानी लगभग चालीस लाख करोड़ रुपए मूल्य की वस्तुओं का उत्पादन होगा।

चूंकि देश के कुल आयात में रक्षा सामान और उपकरणों के आयात पर भारी खर्च होता है। इसलिए देश में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और निर्यात को बढ़ाने के लिए तेजी से काम चल रहा है। इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि रक्षा मंत्रालय ने 21 अगस्त, 2020 से लेकर सात अप्रैल 2022 तक स्थानीय स्तर पर बनाए जाने वाले तीन सौ दस प्रमुख रक्षा उपकरणों की सूची जारी की है। इसके अलावा, कोरोना की चुनौतियों के बाद भारत का दवा उद्योग उत्पादन बढ़ा कर दुनिया के दो सौ से ज्यादा देशों को दवाइयां निर्यात कर रहा है। ऐसे में भारत को दुनिया के नए और बड़े दवा उत्पादन केंद्र के रूप में भी देखा जा रहा है।

यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि कोविड-19 को लेकर चीन के प्रति बढ़ी वैश्विक नाराजगी के कारण तमाम विदेशी कंपनियों ने चीन से अपना कारोबार समेटा लिया था। इधर, पिछले कुछ महीनों से चीन में फिर से कोरोना के मामले बढ़ने से कई औद्योगिक शहरों में उत्पादन ठप पड़ गया है। चीन की यह आपदा भारत के लिए बड़े अवसर के रूप में सामने आई है।

चीन से बाहर निकलते विनिर्माण, निवेश और निर्यात के मौके भारत की ओर आने लगे हैं। निसंदेह मार्च 2020 में शुरू किए आत्मनिर्भर भारत अभियान के बाद देश के उद्योगों को तेजी से बढ़ाने का मौका मिला है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि भारत विनिर्माण में चीन को पछाड़ सकता है। भारत में दुनिया में सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता वाले कम लागत के उत्पाद बनाए जा सकेंगे और विनिर्माण उद्योग जितनी अधिक बिक्री करेंगे, उससे अर्थव्यवस्था में उतने ही अधिक रोजगार सृजित होंगे।

भारत की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था देश को विनिर्माण केंद्र बनाने में प्रभावी भूमिका निभा रही है। कोविड-19 और यूक्रेन संकट की चुनौतियों के बीच पिछले वित्त वर्ष 2021-22 में भारत का उत्पाद निर्यात 419.65 अरब डालर और सेवा निर्यात 249.24 अरब डालर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचना इस बात का संकेत है कि अब भारत निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता जा रहा है। जैसे-जैसे भारत के निर्यात बढ़ रहे हैं, विनिर्माण क्षेत्र को भी तरक्की के मौके मिल रहे हैं।

यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया का चौगुटा यानी क्वाड भी भारत के उद्योग-कारोबार के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकता है। इससे भी भारत को विनिर्माण केंद्र बनाने का बड़ा आधार मिलेगा। इसके साथ-साथ उद्योग कारोबार के विस्तार के लिए भारत जिस त्रिआयामी रणनीति पर चल रहा है, उससे भी विनिर्माण का प्रमुख केंद्र बनने की संभावनाएं प्रबल होंगी।

ये तीन महत्त्वपूर्ण आयाम हैं- चीन के प्रभुत्व वाले व्यापार समझौतों से अलग रहते हुए नार्डिक देशों जैसे संगठनों के व्यापार समझौते का सहभागी बनना, पाकिस्तान को किनारे करते हुए क्षेत्रीय देशों के संगठन बिम्सटेक (बे आफ बंगाल इनीशिएटिव फार मल्टी सेक्टोरल टेक्नोलाजिकल एंड इकोनामिक कोआपरेशन) को प्रभावी बनाना और मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की दिशा में बढ़ना।

भारत ने संयुक्त अरब अमीरात और आस्ट्रेलिया के साथ एफटीए को मूर्तरूप दे दिया है। अब यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, कनाडा, खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के छह देशों, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और इजराइल के साथ एफटीए के लिए प्रगतिपूर्ण वार्ताएं अच्छे भविष्य के संकेत दे रही हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्ष 2022-23 के केंद्रीय बजट के तहत अब विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) की नई अवधारणा और नए निर्यात प्रोत्साहनों से देश को विनिर्माण का प्रमुख केंद्र बनाने के प्रयासों को गतिशीलता मिली है। सेज का मूल लक्ष्य निर्यात को बढ़ावा देना रहा है, लेकिन सेज इसमें लक्ष्य के अनुरूप योगदान नहीं दे पाए।

ऐसे में इसी वर्ष 2022 से सेज की नई अवधारणा के तहत सरकार ने उत्पादकों और निर्यातकों को विशेष सुविधाएं देने की बात कही है। सेज में खाली जमीन का इस्तेमाल घरेलू व निर्यात विनिर्माण के लिए हो सकेगा। सेज में पूर्णकालिक पोर्टल के माध्यम से सीमा और उत्पाद शुल्क मंजूरी की सुविधा होगी। उत्पादन शुरू करने के लिए जरूरी हर तरह की मंजूरी भी वहीं मिलेंगी।

इस प्रक्रिया में राज्यों को भी शामिल किया जाएगा। ढांचागत खासकर आपूर्ति शृंखला से जुड़ी सुविधाएं बढ़ने से उत्पादन लागत कम होगी और भारतीय वस्तुएं अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसानी से मुकाबला कर सकेंगी। रेल, सड़क, बंदरगाह जैसी सुविधाओं के नेटवर्क से भारतीय लागत वैश्विक स्तर की हो जाएगी। सेज के तहत निवेश को आकर्षित करने के मकसद से लाए गए ‘प्लग एंड प्ले माडल’ के तहत नए उपक्रमों की स्थापनाओं को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। प्लग एंड प्ले व्यवस्था के तहत उद्योगों को बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी और उद्योग सीधे उत्पादन शुरू कर सकेंगे।

यह भी उल्लेखनीय है कि देश को विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए वित्त वर्ष 2022-23 के बजट में जो प्रावधान सुनिश्चित किए गए हैं, उनका सफलता पूर्वक और जल्द ही क्रियान्वयन जरूरी है। यह भी जरूरी है कि देश में डिजिटल कौशल विकास और स्किल इंडिया से संबंधित विभिन्न योजनाओं पर तेजी से काम हो।

विनिर्माण क्षेत्र का वैश्विक केंद्र बनने की संभावनाओं को साकार करने के लिए जरूरी है कि आत्मनिर्भर भारत अभियान और मेक इन इंडिया को सफल बनाने पर जोर दिया जाए। इसके अलावा उत्पाद लागत घटाने, स्वदेशी उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए शोध एवं नवाचार पर ध्यान देने, कानूनों को और सरल बनाने, अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण की रफ्तार तेज करने, आपूर्ति शृंखला की लागत कम करने और श्रमशक्ति को डिजिटल कौशल योग्यता से युक्त करने की भी जरूरत है।

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