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संतुलित विकास की चुनौती

उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर एक लाख तीस हजार करोड़ रुपए की जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं।

संतुलित विकास की चुनौती

हिमाचल और उत्तराखंड में जल विद्युत परियोजनाओं के लिए बनाए जा रहे बांधों ने पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंचाया है। टिहरी बांध को लेकर तो लंबा अभियान चला था। पर्यावरणविद और भू-वैज्ञानिक हिदायतें देते रहे हैं कि गंगा और हिमनदों से निकलने वाली सहायक नदियों की अविरल धारा बाधित हुई तो इनका पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा सकता है।

केन-बेतवा नदी जोड़ अभियान के बाद उत्तराखंड में देश की पहली ऐसी परियोजना पर काम शुरू हो गया है जिसमें हिमनद (ग्लेशियर) की एक धारा को मोड़ कर बरसाती नदी में पहुंचाया जाएगा। यदि यह परियोजना सफल हो जाती है तो पहली बार ऐसा होगा जब हिमालय का बर्फीला पानी किसी बरसाती नदी में सीधे बहेगा। हिमालय की अधिकतम ऊंचाई पर नदी जोड़ने की इस महापरियोजना का सर्वेक्षण शुरू हो चुका है।

परियोजना की विशेषता यह है कि पहली बार उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल की एक नदी को कुमाऊं मंडल की नदी से जोड़ कर बड़ी आबादी को पानी मुहैया कराया जाएगा। इससे एक बडेÞ भू-भाग को सिंचाई के लिए भी पानी मिलेगा। लेकिन इस परियोजना के लिए जिस सुरंग का निर्माण कर पानी नीचे लाया जाएगा, उसके निर्माण में हिमालय के शिखर-पहाड़ों को खोद कर सुरंग और नाले बनाए जाएंगे। इसके लिए मशीनों से पहाड़ों को छेदा जाएगा, जो हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नया बड़ा खतरा बन सकता है। बांधों के निर्माण से हिमालय क्षेत्र पहले ही खतरे में है और इस कारण कई बार पहाड़ी इलाकों में बाढ़, भू-स्खलन और केदरनाथ प्रलय जैसी आपदाओं का सामना पड़ा है।

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में पिंडारी हिमनद है। यह हिमनद दो हजार दो सौ मीटर की ऊंचाई पर एक बड़ा जलग्रहण क्षेत्र है। इसी से पिंडर नदी निकलती है। यह हिमनद लगभग तीन किलोमीटर लंबा और तीन सौ पैंसठ मीटर चौड़ा है। इसमें हमेशा पांच करोड़ लीटर पानी रोजाना रहता है। पानी की यही क्षमता इसे एक बड़ी नदी का रूप देती है। पिंडारी हिमनद भले ही कुमाऊं मंडल में पड़ता है, लेकिन पिंडारी हिमनद से मुक्त होते ही पिंडारी नदी गढ़वाल मंडल के चमोली जिले में प्रवेश कर जाती है।

यहां से एक सौ पांच किलोमीटर की दूरी तय कर यह नदी कर्णप्रयाग पहुंच कर अलकनंदा में मिल जाती है। यहीं कुमाऊं मंडल के बागेश्वर जिले की बैजनाथ घाटी में कोसी नदी बहती है, जो एक बरसाती नदी है। इसी नदी में हिमनद का बर्फीला पानी एक हजार आठ सौ मीटर की ऊंचाई पर एक लंबी सुरंग बना कर छोड़ा जाएगा। बताया जाता है कि पिंडर नदी के पानी की उपयोगिता कर्णप्रयाग तक लगभग नहीं है। इसलिए यहां से महज बीस लाख लीटर पानी रोजाना निकाल कर एक बहुत बड़े भू-भाग की आबादी को पेयजल और सिंचाई के लिए मुहैया करवाया जाएगा।

दरअसल, नैनीताल और अल्मोड़ा जिले में पेयजल की व्यवस्था कोसी नदी के पानी से होती है। इन दोनों जिलों में पेयजल की आपूर्ति के लिए नदी की सतह में पंप लगाए गए हैं, बावजूद इसके पानी की कमी बड़ी समस्या बनी हुई है। दावा किया रहा है कि इस परियोजना के माध्यम से पिंडर नदी का पानी कोसी में प्रवाहित हो जाएगा, तो दोनों जिलों की आबादी को जीवनदान मिल जाएगा। लेकिन इस कथित तात्कालिक लाभ के बहाने जो पिंडर नदी समूचे देश की आबादी के लिए धर्म और संस्कृति का हिस्सा बनी हुई है, उसके अस्तित्व पर संकट गहरा जाएगा। पिंडर घाटी की धार्मिक, सांस्कृतिक महिमा और इसकी सुंदरता का चित्रण यहां के लोकगीतों में भी मिलता है। पिंडर को अधिक दूरी से भी देखें, तो इसकी गहरी तलहटी इतनी निर्मल व पारदर्शी है कि इसमें पड़े पत्थर साफ दिखाई देते हैं।

परियोजना के रचनाकारों का यह भी दावा है कि इस हिमनद का पानी गंगा की तरह नैसर्गिक औषधीय गुणों से युक्त है। अतएव इसके पानी को पीने से लोग तो नीरोगी रहेंगे और इससे सिंचित फसलें भी पौष्टिक होंगी। काया को नीरोगी रखने वाले इस जल की उपयोगिता को हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों साल पहले समझ लिया था। इसकी महिमा वरदान बनी रहे, इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मृत्यु शैया पर लेटे व्यक्ति को गंगाजल पिलाने का नियम बनाया गया। हालांकि अब जागरूकता के अभाव में इसे एक परंपरा का स्वरूप दे दिया गया है। हिमालय की कोख से गंगा निकलती हो या पिंडर, इनका पानी इसलिए शुद्धतम माना जाता है क्योंकि इनमें गंधक जैसे खनिजों की मात्रा सर्वाधिक है।

यही कारण है कि पानी सदा पीने लायक बना रहता है। इनका पानी खराब नहीं होने के कारण वैज्ञानिक भी हैं। खासतौर से गंगा के पानी में ‘बैट्रिया फोर्स’ नामक जीवाणु पाया जाता है, जो पानी के अंदर रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अवांछनीय पदार्थों को निगलता रहता है। नतीजतन जल की शुद्धता बनी रहती है। इनके अलावा भी कुछ भू-गर्भीय रासायनिक क्रियाएं भी इस पानी को शुद्ध बनाए रखने का काम करती हैं। ये पानी में हानिकारक कीटों को नहीं पनपने देती हैं। बावजूद इसके यह पानी हिमालय से उतर कर नीचे आता है तो नदियों में बहाई जा रही गंदगी के चलते दूषित होने लग जाता है। ऐसे में पिंडर का पानी जब कोसी में बहेगा, तब यह जल निर्मल नहीं रह जाएगा।

हम जानते हैं कि पहले से ही विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन की बड़े पैमाने पर बर्बादी हुई है। इसलिए इस तरह की आशंकाएं पैदा होना स्वाभाविक है कि ऐसी परियोजना से पिंडर हिमनद और पिंडारी नदी कहीं अपना अस्तित्व ही न खो दें। दरअसल, हर बार मानसून में हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में भू-स्खलन, बादल फटने और बिजली गिरने की घटनाएं निरंतर सामने आ रही हैं। पहाड़ों के दरकने के साथ छोटे-छोटे भूकंप भी देखने में आ रहे हैं।

उत्तराखंड और हिमाचल में बीते सात साल में एक सौ तीस बार से ज्यादा छोटे भूकंप आए, जो रिक्टर पैमाने पर तीन से कम तीव्रता होते हैं, इसलिए इनका तात्कालिक बड़ा नुकसान देखने में नहीं आता, लेकिन इनके कंपन से दरारें बढ़ती जा रही हैं। नतीजतन भू-स्खलन और चट्टानों के खिसकने जैसी आपदाएं भी बढ़ रही हैं। ये छोटे भूकंप हिमालय में किसी बड़े भूकंप के आने का स्पष्ट संकेत माने जाते हैं। बड़े भूकंप जो रिक्टर पैमाने पर छह से आठ तक की तीव्रता के होते हैं, उनसे पहले छोटे-छोटे भूकंप आते हैं।

हिमाचल और उत्तराखंड में जल विद्युत परियोजनाओं के लिए बनाए जा रहे बांधों ने पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंचाया है। टिहरी बांध को लेकर तो लंबा अभियान चला था। पर्यावरणविद और भू-वैज्ञानिक हिदायतें देते रहे हैं कि गंगा और हिमनदों से निकलने वाली सहायक नदियों की अविरल धारा बाधित हुई तो इनका पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा सकता है। लेकिन विकास के लिए ऐसी चेतावनियों को नजरअंदाज किया जाता रहा है। गौरतलब है कि 2013 में केदारनाथ दुर्घटना के बाद ऋषि-गंगा परियोजना पर भी बड़ा हादसा हुआ था। इस हादसे ने डेढ़ सौ लोगों के प्राण तो गए ही, संयंत्र भी पूरी तरह ध्वस्त हो गया था, जबकि इस संयंत्र का पनचानवे फीसद काम पूरा हो गया था।

उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों पर एक लाख तीस हजार करोड़ रुपए की जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इन संयंत्रों की स्थापना के लिए लाखों पेड़ों को काट कर नदियों पर बांध बनाने के लिए गहरे गड्ढे खोदे जाते हैं और उन पर खंबे व दीवारें खड़ी की जाती हैं। इन गड्ढों की खोदाई में मशीनों से जो कंपन होते हैं, वे पहाड़ की परतों की दरारों को खाली कर देता है और पेड़ों की जड़ों से जो पहाड़ गुंथे होते हैं, उनकी पकड़ भी इस कंपन से ढीली पड़ जाती है। नतीजतन पहाड़ों के ढहने और हिमखंडों के टूटने की घटनाएं पूरे हिमालय क्षेत्र में लगातार बढ़ रही हैं।

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