ताज़ा खबर
 

जनसत्ता बारादरीः दिल्ली में भाजपा की लड़ाई कांग्रेस से है

विजय गोयल क्यों युवा एवं खेलमंत्री विजय गोयल की पहचान पुरानी दिल्ली की गलियों से निकली है। आम आदमी पार्टी की नीतियों के खिलाफ गोयल भाजपा के सबसे मुखर चेहरा हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों और दिल्ली में निवर्तमान सभी पार्षदों को टिकट न देने का तुरुप का पत्ता खेलने के बाद निगम चुनावों में भाजपा मैदान जीतने का दावा कर रही है। भाजपा की उम्मीदों, आम आदमी पार्टी पर उठे सवालों पर बात करने के लिए गोयल से बेहतर भला कौन हो सकता है।

खेलमंत्री विजय गोयल

लोकसभा चुनाव में विजय हासिल कर भाजपा ने केंद्र की कमान तो संभाल ली, पर उसकी नाक के नीचे से दिल्ली निकल गई थी। लोगों ने आंदोलन की राजनीति से निकली आम आदमी पार्टी को दिल्ली की अगुआई सौंपी। हाल में हुए पांच राज्यों के चुनावी नतीजों का असर दिल्ली के आगामी निगम चुनावों पर सीधे दिख रहा है। भाजपा दावा कर रही है कि आप अब लड़ाई में है ही नहीं और उसकी सीधी लड़ाई कांग्रेस से है। कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के तौर पर आई आम आदमी पार्टी को गोयल रेस से बाहर बता रहे हैं। निगम चुनावों की गहमागहमी के बीच बारादरी में केंद्रीय मंत्री और दिल्ली की जमीन से जुड़े नेता विजय गोयल ने बेबाकी से कहा कि लोगों का भरोसा तोड़ कर ‘आप’ बेसाख हो चुकी है। उन्होंने दावा किया कि विकास और काम के मामले में मोदी नेहरू से बहुत आगे बढ़ चुके हैं। सवाल-जवाब के इस कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र: एक आम शिकायत है कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में हम ओलंपिक खेलों के लायक श्रेष्ठ खिलाड़ी नहीं तैयार कर पा रहे। इसकी क्या वजह है और आपका मंत्रालय इस दिशा में क्या कर रहा है?
विजय गोयल: अव्वल तो, खेलों को सिर्फ मेडल से आंकना ठीक नहीं है। खिलाड़ियों का अपना प्रदर्शन होता है, वे मेहनत करते हैं। कई देशों के खिलाड़ी उनसे बेहतर करते होंगे, वह अलग बात है। अब देखना है कि उनके प्रदर्शन में विस्तार कितना हो रहा है। रियो ओलंपिक के लिए एक सौ बीस खिलाड़ी क्वालीफाई हुए, यह भी तो बड़ी बात है। इतना बड़ा जत्था ओलंपिक में पहले कभी नहीं गया। इसी तरह पैरा-ओलंपिक में सबसे ज्यादा खिलाड़ी क्वालीफाई हुए। दरअसल, हमारे यहां पिछले काफी सालों से खेलों पर किसी ने गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। खेलों को महत्त्व दिया नहीं गया। हमारे प्रधानमंत्री चाहते हैं कि खेलों का प्रसार हो। तो इस समय हमारे मंत्रालय का दो काम है- खेलों को बढ़ावा देना और दूसरा एक्सीलेंसेज स्पोर्ट्स पर ध्यान देना। ओलंपिक एक्सीलेंसेज स्पोर्ट्स के अंतर्गत आता है। आज की तारीख में एक भी ऐसा खिलाड़ी नहीं मिलेगा, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने जाता हो और वह कहे कि मुझे सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। ओलंपिक में कम मेडल आने को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री ने एक टास्क फोर्स का गठन किया है। 2020, 2024 और 2028 के लिए अभी से तैयारी शुरू हो गई है। हम चाहते हैं कि आठ साल की उम्र से ही खिलाड़ियों का चयन शुरू हो जाए। इसके लिए हमारे मंत्रालय ने स्पोर्ट टैलेंट सर्च पोर्टल तैयार किया है, जो जल्दी ही लांच होने वाला है। इसके जरिए आॅनलाइन सेलेक्शन होगा। इसके अलावा आठ-दस साल के एक हजार बच्चों के लिए पांच लाख रुपए सालाना की स्कॉलरशिप शुरू करने जा रहे हैं। इसमें आठ साल तक प्रशिक्षण दिया जाएगा। सबसे अधिक खिलाड़ी हमें मिलते हैं गांवों और जनजातीय इलाकों से, इसलिए कोशिश है कि वहां से ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ियों का चयन करें और उन्हें प्रशिक्षण दें। ऐसे अनेक प्रयास चल रहे हैं।

मुकेश भारद्वाज: आम अनुभव है कि खेल का मतलब सिर्फ क्रिकेट होकर रह गया है। दूसरे खेलों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। इससे पार पाने के लिए आप क्या उपाय कर रहे हैं?
विजय गोयल: पहले से अब खेलों को लेकर स्थितियां बदली हैं। माता-पिता बच्चों को खेलों के प्रति प्रोत्साहित नहीं कर रहे। वे उनसे कहते हैं कि तुम सिर्फ कैरिअर पर ध्यान दो। अब बच्चे खेलते भी नहीं और खेल के मैदान भी नहीं बचे। पिछले दिनों राज्यों के खेलमंत्रियों के साथ बैठक हुई, तो उसमें भी इसे लेकर चिंता जाहिर की गई। शहरों में जो भी खेल के मैदान थे, उन पर मॉल और दूसरे तरह के व्यावसायिक भवन बनाए जाने लगे हैं। सरकारें चाहती हैं कि ऐसा करने से उन्हें राजस्व मिलेगा। अब हमारी योजना है कि गांवों में खेल के मैदान विकसित किए जाएं। मनरेगा के अंतर्गत भी एक योजना है, जिसमें एक इलाके में खेल के मैदान के लिए पांच लाख रुपए तक देते हैं।
अब हम चाहते हैं कि सिर्फ क्रिकेट नहीं, हॉकी, फुटबॉल, कबड्डी, खोखो आदि स्थानीय खेलों को भी बढ़ावा मिले। यह साल फुटबॉल का है। अभी हमने गोवा में फुटबॉल किया, इसी तरह स्कूलों में फीफा की तरफ से कराने जा रहे हैं। एक लाख से ऊपर बच्चों तक फुटबॉल को लेकर जाने का इरादा है। इसके लिए स्कूलों से संपर्क शुरू हो चुका है। अभी जो शुरुआती गेम हुए उनमें फुटबॉल की हमारी रैंकिंग भी थोड़ी सुधरी है। कबड्डी और कुश्ती काफी लोकप्रिय खेल हो चुके हैं। लोग अलग-अलग लीग लेकर आ रहे हैं, बेशक वे उसमें बिजनेस देख रहे हैं, पर हमारे खेल को तो प्रोत्साहन मिल रहा है न।
अनुराग अन्वेषी: क्या वजह है कि खेलों में पुरुष खिलाड़ियों की तुलना में महिला खिलाड़ियों की कमाई कम होती है?
विजय गोयल: ऐसा कोई भेदभाव तो नहीं है। ओलंपिक में चाहे वह महिला हो या पुरुष बराबर का पुरस्कार मिलता है। निजी प्रयास से कराए जाने वाले खेलों में ऐसा होता हो, तो मैं नहीं कह सकता। सरकार की तरफ से ऐसा कोई भेदभाव नहीं है।

राजेंद्र राजन: अभी दिल्ली में नगर निगम के चुनाव होने वाले हैं। भाजपा के कई नेताओं के बयान आ चुके कि पुराने पार्षदों को टिकट नहीं देंगे। ऐसी क्या मजबूरी है?
विजय गोयल: मजबूरी तब कहा जाता जब पुरानों को ही लेना हो। नयों को लेने में तो कोई मजबूरी नहीं हो सकती। अगर पुराने लोगों को ही लिया जाता तो आप कहते कि ऐसी क्या मजबूरी थी कि सभी पुरानों को लिया गया। यह तो पार्टी ने तय किया है कि नए लोग आएं। नए लोगों को अवसर मिले। जब नए लोगों को अवसर देना है, तो क्यों न सभी पुराने लोगों को बदल दिया जाए।

मृणाल वल्लरी: नए चेहरे लाने के पीछे कहीं यह वजह तो नहीं कि उनको लेकर लोगों में जो नाराजगी है, उससे बचा जा सके?
विजय गोयल: अगर मैं आपकी ही बात मान लूं तो भी तो यह फैसला उचित ही कहा जा सकता है। पार्टी ने अच्छा-बुरा छांटने के बजाय सबको बदल दिया। मेरा मानना है कि दिल्ली नगर निगम की संस्कृति को बदलने की जरूरत है। पिछले चालीस-पचास साल से एक ही संस्कृति चली आ रही है। दिल्ली नगर निगम की ओर कभी सरकारों ने ध्यान नहीं दिया। आम आदमी पार्टी सरकार के समय में दिल्ली बहुत तेजी से स्लम में बदलती जा रही है। गैरकानूनी कॉलोनियों में जाकर देखिए कि किस तरह चार-चार मंजिला इमारतें बन गई हैं। सारी पटरियां और सड़कें घिर गई हैं। पिछले सालों का इनके पास न तो कोई अनुभव था न इन्होंने कोई प्रयास किया कि दिल्ली का विकास हो। जितने प्यार से लोग लेकर आए थे केजरीवाल साहब को, अब उन्हें उतनी ही नफरत से देखने लगे हैं।

सूर्यनाथ सिंह: केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच लगातार तनाव बने रहने की वजह से भी कई काम नहीं हो पाए। नगर निगम का काम भी उससे प्रभावित हुआ। क्या आपको लगता है कि जब तक यह तनाव बना रहेगा, दिल्ली का विकास हो पाएगा?
विजय गोयल: इसीलिए हम चाहते हैं कि यह टकराव ही न रहे। अभी हम एमसीडी का चुनाव जीतेंगे, फिर दिल्ली में सरकार बनाएंगे। फिर केंद्र के साथ दिल्ली सरकार कंधे से कंधा मिला कर विकास के काम करेगी। अगर आप सिर्फ लड़ाई करेंगे, तो विकास नहीं हो पाएगा। विकास के लिए दोनों पहियों को साथ मिल कर चलना होगा। इसलिए अब ज्यादा जरूरी हो गया है कि दिल्ली में भाजपा की सरकार आ जाए।

मनोज मिश्र: भाजपा शुरू से दिल्ली को राज्य का दर्जा देने की मांग करती रही है, मगर पिछले दो चुनावों से आपने उसे एजेंडे से हटा दिया।
विजय गोयल: अब स्थिति उससे भी पीछे चली गई है। अब यह सोचना पड़ेगा कि कोई राज्य सरकार किस तरह अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर सकती है। केंद्र में भाजपा की सरकार है और दिल्ली में कोई ऐसी सरकार हो, जो उसे काम करना मुश्किल कर दे, तो फिर कैसे काम हो पाएगा।

मृणाल वल्लरी: दिल्ली प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष चुनते समय ऐसी क्या विवशता थी कि बाहर के व्यक्ति को यह जिम्मेदारी देनी पड़ी?
विजय गोयल: अब दिल्ली में बाहर-अंदर का सवाल नहीं रह गया है। केजरीवाल साहब उत्तर प्रदेश के थे, यहां आकर मुख्यमंत्री बन गए। शीला दीक्षित भी बाहर से आई थीं। यह अब सब पार्टियों के अंदर होने लगा है। मनोज तिवारी सांसद तो बन ही गए हैं। अगर पब्लिक आपको स्वीकार कर लेती है तो आप बाहर के नहीं रह जाते।

दीपक रस्तोगी: आप अटलजी के समय में भी मंत्री रहे और अब मोदी जी के साथ हैं। ऐसी कौन-सी चीजें हैं, जो तब लागू नहीं हो पार्इं और अब उन्हें होना चाहिए।
विजय गोयल: अटलजी और मोदीजी दोनों विकास के हिमायती रहे हैं। मोदीजी के पास बहुमत है, इनके पास समय अधिक है। अटलजी के समय खेल मंत्रालय में मुझे उतनी जिम्मेदारी नहीं थी, जितनी आज है। तब मैं राज्यमंत्री था। इसलिए आज मैं ज्यादा काम कर रहा हूं। ऐसे-ऐसे काम किए हैं मैंने जो पिछले चालीस सालों से नहीं हुए थे। मसलन, मैंने एनएसएस, नेहरू युवा केंद्र आदि की बैठकें कीं और उन्हें बेहतर बनाने का प्रयास कर रहा हूं।
मनोज मिश्र: आप पहली बार मंत्री बने थे तो शाहजहानाबाद को विकसित करने के लिए कमर कसी थी। आपकी शुरुआती राजनीतिक पहचान चांदनी चौक और पुरानी दिल्ली से बनी। आज चांदनी चौक को भीड़भाड़ से मुक्त कर उसकी विरासत बचाने के लिए क्या करेंगे?
विजय गोयल: यह मैं बहुत ईमानदारी से कहता हूं कि विरासत और राजनीति में से किसी एक को चुनना हो तो मैं विरासत को चुनूंगा। शाहजहानाबाद को विकसित करने की जिम्मेदारी मिलेगी तो उसके लिए मंत्री पद छोड़ दूंगा। हमने जिस तरह चांदनी चौक में हवेलियों को सहेजा वह कोई और नहीं कर सकता है। शाहजहानाबाद विकास बोर्ड ने 2015 में कहा कि इन हवेलियों से एक पैसे की कमाई नहीं हो रही है। कपिल सिब्ब्ल जब उस क्षेत्र की अगुआई कर रहे थे तो एक र्इंट भी नहीं रखी। निगम चुनावों में जीत के बाद अब अगर एमसीडी में भाजपा आती है तो चांदनी चौक का पूरी तरह से कायाकल्प होगा। मैंने अपनी लड़ाई यहीं से शुरू की थी। अतिक्रमण के खिलाफ जुलूस निकाला, लोगों को इकट्ठा किया। जगमोहन तक को लेकर गया। लाखों रुपयों के साइन बोर्ड उखार कर फेंक दिए और लोगों ने एक शब्द तक नहीं बोला। तभी से यह अहसास हो गया कि लोगों के लिए काम करेंगे तो उनका समर्थन मिलेगा। मैंने देश भर में लॉटरी बंद करने का आंदोलन किया और यह सफल हुआ। 1947 से लेकर आज तक एक ही सामाजिक बुराई है, जो बंद हो पाई है।

राजेंद्र राजन: आप अभी केंद्र की राजनीति का चेहरा हैं। ताजा माहौल के बाद क्या दिल्ली की राजनीति में आना चाहेंगे?
विजय गोयल: यह पार्टी तय करती है कि किसे कहां, कैसे और कितना काम करना है। मुझे राजस्थान से सांसद बनने का मौका दिया गया, साथ ही दिल्ली के लिए भी काम करना है। राजस्थान के लिए मुझे उतना ही काम करना है, जितना बतौर सांसद करना चाहिए। दिल्ली के लिए तो काम करना ही है।

सूर्यनाथ सिंह : क्या आपको लगता है कि आम आदमी पार्टी से भरोसा टूटने के बाद आंदोलनों से निकली राजनीति पर भी लोगों का भरोसा टूटा है?
विजय गोयल: मैं तो आपको अपने घर की बात बताता हूं। एक समय था कि मेरा बेटा भी आम आदमी पार्टी को पसंद करने लगा था। उसे उम्मीद थी कि ये बेहतर काम करेंगे। आज उसकी उम्मीद दूटी है और आज के समय में वह ‘आप’ से नफरत करता है। यही हाल जनता का है।

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App