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राजनीतिः प्रतिस्पर्धी उद्योग बनता आतंकवाद

भारत पिछले कुछ वर्षों में आतंकी गतिविधियों को संपूर्ण भारत में फैलने से रोकने और कश्मीर घाटी तक सीमित रखने में सफल रहा है। मगर दूसरी ओर वैश्विक आतंकवाद के स्वरूप और कार्यपद्धति में आ रहे नए बदलावों के कारण आतंरिक सुरक्षा के सामने नए खतरे उत्पन्न होने की संभावना भी बढ़ गई है।

Author Published on: June 5, 2020 12:50 AM
आज आतंकवादी संगठन अपने आतंकी मिशनों के लिए वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के नए-नए तरीके खोज रहे हैं।

विवेक ओझा

जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक ने हाल ही में कहा कि नियंत्रण रेखा के पार पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में तीन सौ से ज्यादा आतंकवादी मौजूद हैं और वे भारत में घुसपैठ की फिराक में हैं। इसलिए भारतीय सुरक्षा बलों ने वहां सक्रिय लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिद्दीन आदि से निपटने के लिए नए अभियान चलाए हैं। दरअसल, कश्मीर घाटी में आतंकवाद विश्व के अन्य हिस्सों की तरह एक प्रतिस्पर्धी उद्योग के रूप में उभर रहा है। जिस प्रकार आतंकवाद के खात्मे के लिए कठोर दमनात्मक कार्रवाइयां की गई हैं, उससे आतंकियों को अपनी रणनीति, संसाधनों, आतंकी भर्ती प्रणालियों, आतंकी कृत्यों को नए और आश्चर्यजनक रूपों में पेश कर लाइम लाइट में आने का दबाव बढ़ा है।

भारत सरकार के गृह मंत्रालय का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी जो कि हिज्बुल मुजाहिदीन और हुर्रियत का अभिभावक संगठन है, वह कश्मीर घाटी में पृथकतावादी और कट्टर विचारधारा के प्रसार के लिए जिम्मेदार है। इसके साथ ही यह हिज्बुल मुजाहिदीन को सभी प्रकार के सहयोग और समर्थन लगातार उपलब्ध करा रहा है। यह हिज्बुल मुजाहिदीन को भर्ती, फंडिंग, हथियारों की आपूर्ति, आश्रय और लॉजिस्टिक्स समर्थन प्रदान करते हुए पाया गया है, जबकि जमात-ए-इस्लामी का गठन धार्मिक मदरसों में शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया था। पिछले वर्ष भारतीय सुरक्षा बलों ने हिज्बुल मुजाहिदीन के एक ओवरग्राउंड वर्कर यानी जमीनी कार्यकर्ता को किश्तवाड़ जिले से गिरफ्तार और उससे भारी मात्रा में गोला-बारूद, पिस्तौल, मैगजीन और चीनी ग्रेनेड जब्त किया गया था। इसके घर को आतंकवादियों के सहयोग के प्रयोग में लाया जा रहा था। ओवरग्राउंड वर्कर ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से आतंकी घटना में तो संलग्न नहीं होते, लेकिन आतंकवादियों के सहायक की भूमिका अदा करते हैं। ये ऐसे व्यक्ति हैं, जो आतंकी विचारधारा से धर्म और मौद्रिक लाभों के आधार पर प्रभावित होते हैं और आतंकियों के लिए अपने घरों में शरण देने, उनके लिए विभिन्न आवश्यक उपकरण जैसे मोबाइल, सिम, हथियार, अन्य आवश्यक रसद मुहैया कराने में परोक्ष रूप से लगे होते हैं। इनमें धर्म के आधार पर युवाओं को गुमराह कर आतंकी गुटों में भर्ती कराने के लिए सक्रियता देखी गई है। कश्मीर में जमीनी कार्यकर्ताओं ने आतंकियों की भर्ती और प्रशिक्षण में सहायक की भूमिका निभाई है। ये विभिन्न प्रकार के वाहनों और आतंकियों के लिए हथियारों की आपूर्ति करते हैं। दक्षिणी कश्मीर में सक्रिय हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी गुटों के जमीनी कार्यकर्ताओं के नेटवर्क पर नियंत्रण के उद्देश्य से भारत सरकार ने 2019 के प्रारंभ में कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा दिया। यह संगठन अपने जमीनी कार्यकर्ता की सहायता से कश्मीर में

अलगाववाद और पत्थरबाजी के साथ ही आतंकवादियों को सहयोग देने के कार्य में लिप्त पाया गया था।
मई माह में तीन बड़ी मुठभेड़ें सुरक्षा बलों द्वारा की गर्इं, जिनमें हिज्बुल के कमांडर रियाज नायकू समेत चार आतंकियों को सुरक्षा बलों ने ढेर किया। सुरक्षा बलों की इस अतिसक्रियता से आतंकी संगठन प्रतिशोध की भावना से भरे हुए हैं। ऐसे में सीआरपीएफ, बीएसएफ के गश्ती दल और चौकियों को आतंकियों ने निशाना बनाया। इसके मूल में पाकिस्तान की बौखलाहट को देखा जा सकता है। कोरोना वायरस की मार और गंभीर आर्थिक तंगी के बावजूद कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है।

भारत पिछले कुछ वर्षों में आतंकी गतिविधियों को संपूर्ण भारत में फैलने से रोकने और कश्मीर घाटी तक सीमित रखने में सफल रहा है। साथ ही जम्मू और कश्मीर के संबंध में भी एक ठोस और यथार्थवादी नीति को सफलतापूर्वक लागू करने में सफल रहा है, लेकिन दूसरी ओर वैश्विक आतंकवाद के स्वरूप और कार्यपद्धति में आ रहे नए बदलावों के कारण आतंरिक सुरक्षा के सामने नए खतरे उत्पन्न होने की संभावना भी बढ़ गई है। दरअसल, हाल के दशकों में आतंकवाद एक संगठित अपराध और अपराधियों के नेटवर्क के साथ ही एक प्रतिस्पर्धी उद्योग के रूप में उभरा है। सैकड़ों आतंकवादी समूह प्राथमिकता के तौर पर अपने संरक्षण और बढ़ावा देने वाले देशों, संगठनों और समूहों की नजर में बने रहना चाहते हैं। हाल के वर्षों में आइएसआइएस की सक्रियता ने भारत में भी आतंकी समूहों में प्रतिस्पर्धा बढ़ा दी है। यही कारण है कि आतंकी समूहों द्वारा भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने के नए तरीके अपनाए जा रहे हैं।

यही नहीं, आतंकी गतिविधियों के लिए भूमि पर कब्जा करने की नई रणनीति भी आतंकियों ने अपनाई है। वैश्विक पटल पर देखें तो यमन के हूती विद्रोहियों ने राजधानी साना समेत कई भागों पर कब्जा कर यमन सरकार समेत सऊदी अरब का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया है। इसी प्रकार इस्लामिक स्टेट ने इराक और सीरिया के महत्त्वपूर्ण इलाकों पर कब्जा किया है। तालिबान नेटवर्क और आइएसआइएस खोरासन ने अफगानिस्तान के हिस्सों को कब्जे में लिया है। तालिबान तो 1996 से 2003 तक अफगानिस्तान में सत्ता भी संभाल चुका है। इसी प्रकार सोमालिया में अल-शबाब और नाईजीरिया में बोको हराम जैसे आतंकी संगठन इस्लामिक साम्राज्य के निर्माण की मंशा से अपने-अपने देश के अलग-अलग हिस्सों पर कब्जा करने के प्रयास में लगे हुए हैं। इसी क्रम में आइएसआइएस ने जम्मू-कश्मीर में अपना एक प्रांत बनाने का दावा पिछले वर्ष किया था।

आज आतंकवादी संगठन अपने आतंकी मिशनों के लिए वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के नए-नए तरीके खोज रहे हैं। इसमें एक प्रमुख तरीका है राज्य प्रायोजित आतंकवाद के जरिए देश की सत्ता से ही पूंजी प्राप्त करना। मसलन, पाकिस्तान द्वारा लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों को वित्तीय सहयोग मिलना, लेबनान के हिज्बुल्ला नामक आतंकी संगठन, जिस पर खाड़ी देशों में आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप है, को ईरान द्वारा वित्त पोषण, सीरिया के विद्रोहियों को अमेरिका द्वारा वित्तीय सहयोग आदि। आइसिस जैसे आतंकी संगठन अपने कब्जे वाली भूमि से पेट्रोलियम तेल के कुओं से तेल बेच कर धन प्राप्त करने के प्रयास कर चुके हैं।

आज उद्यमशीलता के रूप में आतंकियों द्वारा प्रतिस्पर्धा की जा रही है। आतंकी संगठनों द्वारा नए आतंकियों की भर्ती और नए आतंकी संगठनों का निर्माण उनकी उद्यमशीलता जैसी प्रवृत्ति को दर्शाता है। मसलन, अबु बक्र अल बगदादी द्वारा इस्लामिक स्टेट की स्थापना, आसिम उमर द्वारा 2014 में अल कायदा इन दि इंडियन सबकांटिनेंट की स्थापना और दक्षिण एशिया में आतंकवाद फैलाने में इसकी भूमिका सुरक्षा बलों द्वारा स्पष्ट की जा चुकी है। इसके साथ ही आतंकी गतिविधियों के प्रतिस्पर्धी तरीके भी गढ़े गए हैं। आतंकवादियों ने अन्य आतंकी गुटों से अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए हिंसक गतिविधियों के नए-नए तरीके अपनाएं हैं, जिनमें आइइडी, वाहन बम, सुसाइड बॉम्बर और फिदाइन हमले शामिल हैं। विश्व भर में आतंकवादी संगठनों द्वारा अपनी विचारधाराओं के प्रसार और नए आतंकियों की भर्ती के लिए सोशल मीडिया और इंटरनेट का प्रयोग किया जा रहा है।

भारत सहित वैश्विक स्तर पर आतंकी समूहों की रणनीति में आ रहे इन बदलावों को ध्यान में रखते हुए भारत में आतंकवाद को प्रतिस्पर्धी उद्योग के रूप में न पनपने देने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी। आसूचना इकाइयों के मध्य बेहतर समन्वय, आतंकी गतिविधियों, योजनाओं, षड्यंत्रों की पहचान करना, आतंकी अभियानों के लिए नई भर्ती प्रक्रिया के नेटवर्क को तोड़ कर स्थानीय युवाओं को आजीविका के बेहतर विकल्प देना, आतंकी गतिविधियों को संचालित होने देने में सहायक कारकों जैसे अग्रणी संगठनों, जमीनी कार्यकर्ताओं के नेटवर्क पर मारक कार्यवाही करना और सुरक्षा बलों को अत्याधुनिक तकनीक, हथियार, सुरक्षा उपकरणों से लैस करना आदि कई अन्य प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं। आतंकी समूहों के संबंध में कोई भी रणनीति तभी सफल हो पाएगी, जब हम घरेलू स्तर पर विभिन्न समुदायों के बीच आपसी सौहार्द और सरकार के प्रति विश्वास बनाए रखें।

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