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तीस्ता सीतलवाड गिरफ्तारी मामला: कानून के शासन की उलटबांसी

तीस्ता सीतलवाड गिरफ्तारी प्रकरण की न्यायिक विसंगतियों में झांकने के लिए, अब लगभग भुला दी गई बेस्ट बेकरी कांड की जाहिरा शेख को याद करना होगा। फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय के दखल से तीस्ता मामले में न्याय का वक्ती तौर पर पथ-प्रदर्शन हुआ है, और तीस्ता को हिरासत में लेने पर उतारू गुजरात पुलिस की मनमानी […]

Author February 27, 2015 11:00 PM
तीस्ता सीतलवाड गिरफ्तारी प्रकरण की न्यायिक विसंगतियों में झांकने के लिए, अब लगभग भुला दी गई बेस्ट बेकरी कांड की जाहिरा शेख को याद करना होगा। (स्रोत-एक्सप्रेस)

तीस्ता सीतलवाड गिरफ्तारी प्रकरण की न्यायिक विसंगतियों में झांकने के लिए, अब लगभग भुला दी गई बेस्ट बेकरी कांड की जाहिरा शेख को याद करना होगा। फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय के दखल से तीस्ता मामले में न्याय का वक्ती तौर पर पथ-प्रदर्शन हुआ है, और तीस्ता को हिरासत में लेने पर उतारू गुजरात पुलिस की मनमानी पर लगाम लगी है। पर किसी को भ्रम नहीं पालना चाहिए कि इससे मोदी-शाह संचालित इस पुलिस की 2002 से चली आ रही बुनियादी रणनीति बदलने जा रही है, जिसके तहत सांप्रदायिक जनसंहार और झूठी मुठभेड़ों में राज्य की आपराधिक सांठगांठ पर परदा डालने के लिए अपराधियों को अभियोजक, पैरोकारों को अपराधी और गवाहों को मूकदर्शक बनाने का खेल धड़ल्ले से चलाया जाता रहा है।

अकस्मात नहीं कि जो पुलिस गुजरात जनसंहार के आरोपियों को कानून की पहुंच में लाने के भागीरथ प्रयत्न से प्रमुखता से जुड़ी रही तीस्ता को फर्जी शिकायत पर गिरफ्तार करने की जल्दबाजी में नजर आई, उसने इसी दौरान एक के बाद एक वंजारा जैसे झूठी मुठभेड़ के हत्यारोपी पुलिस अफसरों के जमानत पर छूटते जाने के विरुद्ध अपील की कानूनी जुंबिश तक भी नहीं की। माना जाता है कि ये तथाकथित मुठभेड़ें आतंकवादियों से निपटने के नाम पर तत्कालीन मोदी-शाह प्रशासन को ‘माचो’ छवि प्रदान करने के क्रम में आयोजित की गर्इं, जिसकी पुष्टि स्वयं वंजारा ने एक वर्ष पूर्व जेल से जारी अपने बयान में की थी। यहां तक कि इन मुठभेड़ों में सह-आरोपी पुलिस अधिकारी पीपी पांडे को जमानत पर छूटते ही राज्य की कानून-व्यवस्था का प्रमुख बना दिया गया है। जबकि जनसंहार मामलों के वरिष्ठ जांच अधिकारी सतीश वर्मा को कर्तव्य के साथ खड़े रहने के एवज में प्रताड़ित करने के लिए हत्या के फर्जी आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। कल उनकी गिरफ्तारी की भी खबर आ जाए तो ताज्जुब नहीं।

खुद अमित शाह को भी सीबीआइ ने फर्जी मुठभेड़ मामलों में षड्यंत्र का दोषी ठहरा कर गिरफ्तार किया था। उनके विरुद्ध बाकायदा आरोपपत्र भी दाखिल हुआ। इस जनवरी में मुंबई की विशेष अदालत के नए जज ने शाह को सुनवाई शुरू होने से पहले ही इस टिप्पणी के साथ आरोपमुक्त कर दिया कि उन्हें सियासी वजहों से मुकदमे में लपेटा गया है। ताज्जुब है कि शाह और सीबीआइ, दोनों ने अदालती आदेश पर चुप्पी साध ली। न शाह ने इससे राजनीतिक फायदा उठाने वाली स्वाभाविक मुहिम चलाई और न ही सीबीआइ ने फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील करने की कानूनी पहल की। सीबीआइ के मुताबिक उसने तो सारे तथ्य विशेष अदालत के सामने रख दिए थे, अब अपील में नया क्या कहें? इस तर्क को मानें तो सीबीआइ को किसी भी मामले में कभी अपील करनी ही नहीं चाहिए। आरोप-मुक्त शाह का सार्वजनिक बहस से परहेज और सीबीआइ का अपील न करना अकारण तो नहीं हो सकते।

सीबीआइ की कार्यशैली से परिचित जानते हैं कि शाह जैसी राजनीतिक हस्ती के विरुद्ध सबूतों की छानबीन और गिरफ्तारी और उन्हें आरोपपत्र में शामिल करने का निर्णय जांच एजेंसी के सर्वोच्च स्तर पर ही लिया गया होगा। उस समय सीबीआइ के मुखिया होते थे एपी सिंह, जिन्हें सेवानिवृत्ति के बाद मनमोहन-सोनिया सरकार ने संघ लोक सेवा आयोग की सदस्यता से पुरस्कृत किया। पर भ्रष्टाचार के गंभीरतम आरोपों से घिरे इस अफसर को बजाय जवाबदेह ठहराने के, मोदी सरकार ने उपरोक्त अदालती टिप्पणी की आड़ में इस्तीफा देकर चुपचाप निकल जाने का चोर दरवाजा इस्तेमाल करने दिया। जाहिर है, इस प्रकरण में सभी की दिलचस्पी एक दूसरे के पापों को ढंकने में है।

अब भी तीस्ता की गिरफ्तारी पर सर्वोच्च न्यायालय से रोक का मतलब यह नहीं कि अब गुजरात पुलिस के जांचकर्ताओं को कानूनी प्रावधानों और प्रक्रियाओं को नए सिरे से पढ़ने की जरूरत महसूस हो रही होगी।

कानून का शासन’ का मतलब उनके लिए तो सत्ताधारियों का इशारा समझना ही पहले भी रहा और आगे भी वही स्थिति रहेगी। दरअसल, राज्य में मोदी-शाह के लंबे शासन में गुजरात पुलिस का मनोबल और कार्यशैली दोनों रसातल में पहुंचा दिए गए हैं। आज केंद्र सरकार में भी इस जोड़ी का दबदबा राज्य में उनके दौर की तार्किक परिणति को ही संभव कर रहा है।

अपराध जगत का शाश्वत नियम है कि अपराधी अपने किए के निशान छोड़ जाता है। कई बार रसूखदार अपराधी इन निशानों को ढंकने के प्रयास में स्वयं को और भी उलझा लेता है। इसके बावजूद, 2002 के सांप्रदायिक जनसंहार के संदर्भ में सत्ताधारी राजनीतिकों के एजेंडे के प्रति वरिष्ठतम जांचकर्ताओं तक का समर्पण अपूर्व ही कहा जाएगा। सीबीआइ के पूर्व निदेशक राघवन के नेतृत्व में गठित जांच समिति ने अमदाबाद की गुलबर्गा सोसायटी में पूर्व हाईकोर्ट जज और सांसद रहे एहसान जाफरी की नृशंस हत्या का औचित्य साबित करने के लिए विधिशास्त्र को सिर के बल खड़ा कर दिया।

उन्मादी सांप्रदायिक गिरोह से घिरे जाफरी ने टेलीफोन पर तमाम प्रशासनिक और राजनीतिक केंद्रों से जान बचाने की गुहार की थी, और हत्यारों को निरुत्साहित करने के अंतिम प्रयास-स्वरूप, आत्मरक्षा में, अपनी लाइसेंसशुदा बंदूक से हवा में फायर किए थे।

राघवन के निष्कर्षों के अनुसार इस तरह जाफरी ने स्वयं भीड़ को अपनी हत्या के लिए उकसाया, जबकि हत्यारों का मंतव्य इसी से स्पष्ट हो जाता है कि उस हमले में जाफरी समेत उनहत्तर जानें ली गई थीं। आज तीस्ता के पीछे हाथ धोकर पड़ी गुजरात पुलिस का भी यही तर्क नजर आता है। तीस्ता पर इसी गुलबर्गा सोसायटी में म्यूजियम के नाम पर जमा की गई रकम को गबन करने का आरोप लगाया गया है- क्या गुलबर्गा सोसायटी के हत्यारों को सजा दिलाने की पैरवी में सक्रियता दिखा कर तीस्ता ने स्वयं अपनी गिरफ्तारी को दावत नहीं दी है!

तीस्ता-गिरफ्तारी जैसे प्रकरण, गुजरात 2002 के संदर्भ में, न्याय-व्यवस्था की विसंगतियों की टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरी दास्तान लंबे समय तक कहते रहेंगे। इस क्रम में कितने ही अध्याय अभी लिखे जाने की दस्तक दे रहे हैं। मैंने इस लेख के शुरू में यों ही नहीं कहा था कि हमें बेस्ट बेकरी की जाहिरा शेख के मामले को टटोलना होगा। दरअसल, जाहिरा शेख को नहीं, उसके ‘विश्वासघात’ को।

संक्षेप में जाहिरा शेख प्रकरण: एक मार्च 2002 की सुबह वडोदरा की बेस्ट बेकरी को सांप्रदायिक हिंसा पर उतारू पांच सौ की भीड़ ने घेर लिया और भीतर छिपे लोगों में से चौदह को मौत के घाट उतार दिया। उन्नीस वर्षीय चश्मदीद गवाह जाहिरा शेख ने धमकियों और प्रलोभनों के बीच कई बार अपना बयान बदला और अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने अदालत से झूठ बोलने के आरोप में उसे एक वर्ष की कैद और पचास हजार रुपो जुर्माने की सजा सुनाई। शुरू में तीस्ता की सरपरस्ती की बदौलत न्याय के रास्ते पर डटी रही जाहिरा शेख ने अंत में तीस्ता पर ही उसे बरगलाने का दोष तक मढ़ डाला।

सर्वशक्तिमान सुप्रीम कोर्ट और तीस्ता जैसे साधन-संपन्न एनजीओ के संरक्षण और चर्चित मानवाधिकारवादी हस्तियों समेत राष्ट्रीय मीडिया के समर्थन के बावजूद जाहिरा शेख न्याय के मैदान में नहीं टिक पाई। इसे अकेले जाहिरा शेख के भटक जाने का मामला मानना घोर नादानी होगी। सांप्रदायिक राजनीति के जुनूनी धरातल पर जाहिरा शेखों के साथ जो होता रहा है और उनके पक्षकार कानून या मानवता के लिहाज से उनके लिए जो करते रहे हैं- दोनों के बीच गहरी खाई है।

उस दौर में राष्ट्रीय मीडिया ने गुजरात जनसंहार की तुलना नाजी प्रयोगों से की और सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी दी कि ‘आज के नीरो कहीं और देख रहे थे और शायद इस पर विचार कर रहे थे कि अपराध करने वालों को कैसे सुरक्षित रखा जाए या कैसे बचाया जाए।’ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जोर दिया कि मामले की जांच सीबीआइ को सौंपी जाए- ‘आपराधिक न्याय प्रशासन का यह प्रमुख सिद्धांत है कि आरोपियों के खिलाफ जांच की जिम्मेदारी खुद आरोपियों को नहीं सौंपी जानी चाहिए।’

तीस्ता सीतलवाड ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कहा- ‘मैंने अब तक जिन भी पीड़ितों से बात की है वे सभी आतंकित हैं और मुझे नहीं लगता कि उन्हें गुजरात राज्य के वर्तमान अभियोग तंत्र से कभी भी न्याय मिलेगा।’ इस तरह, कानून के कवच-कुंडल पहना कर जाहिरा को सांप्रदायिक चक्रव्यूह में उतार दिया गया और अंतत: उसे ही दोषी पाया गया कि वह, ताकि न्याय-व्यवस्था का झंडा ऊंचा रहे, इस चक्रव्यूह को तोड़ क्यों नहीं पाई?

जब चक्रव्यूह रचा जा रहा था तो ये पक्षकार किस भूमिका में थे? गुजरात में कानून व्यवस्था के एक भी पद पर कोई मुसलमान नहीं रहने दिया गया था और राष्ट्रीय मीडिया तक के लिए यह कभी खबर नहीं बनी। गोधरा के डाकबंगले में एक हिंदू पुलिस इंस्पेक्टर ने मुझसे डींग मारी कि उसकी मां मरती मर जाए मगर वह उसे किसी मुसलमान डॉक्टर के पास दिखाने नहीं ले जाएगा- वह पांच साल से किसी मुसलमान के घर नहीं गया था और न कोई मुसलमान उसके घर आया था। तत्कालीन गुजरात प्रशासन की नसों में अरसे से डाला जा रहा सांप्रदायिकता का विष उसे खोखला कर चुका था, बेशक इसकी झलक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की तत्कालीन क्षोभ-भरी टिप्पणियों में भी नहीं मिलेगी।

हत्या के अभियुक्तों के बरी होने पर, सुप्रीम कोर्ट में तीस्ता की मार्फत दाखिल हलफनामे में, जिसकी वैधता को उसने बाद में स्वयं चुनौती भी दी, जाहिरा शेख ने कहा- मुझे अदालत पहुंचने और कानूनी सहायता के लिए मानवाधिकार संगठनों और राहत कमेटी का इंतजार था, लेकिन कोई भी मेरी सहायता को नहीं आया। …उनका कहना था कि क्योंकि यह बड़ा मामला है, क्या मैं वकील नियुक्त करने और कानूनी सहायता के लिए चार लाख खर्च करने में सक्षम हूं।… एक तरफ मेरा परिवार था, दूसरी तरफ मेरी गवाही। मुझे इन दोनों में से एक का चुनाव करना था। मुझे अपने परिवार को चुनना था और बयान से मुकरना था…मैं अपराधियों को सजा दिलाने के लिए इस मुकदमे को दोबारा शुरू करना चाहती हूं…।

दरअसल, यह एक ऐसी औरत का बयान है जिसे किसी पर भरोसा नहीं हो सकता था। ऐसी कलंकित घटना की चश्मदीद गवाह औरत कि जिससे अपराध-दंड-न्याय व्यवस्था बेखबर रही, जबकि उसके परिवार वालों को कत्ल किया जाता रहा और संपत्ति जलाई जाती रही और औरतों को बलात्कार में घसीटा जाता रहा। अब वह बस अपने बचे-खुचे परिवार की सुरक्षा चाहती है और जली बेकरी और कत्ल हुए परिवारजनों के एवज में इतना मुआवजा कि जीवन की नई शुरुआत कर सके। कई बार इधर-उधर लुढ़कने के बाद अंतत: उसने तय किया कि सुप्रीम कोर्ट से सुरक्षा की उम्मीद के बजाय मोदी का रहमोकरम ज्यादा भरोसेमंद है, और तीस्ता की मदद से ज्यादा उसे कातिल गिरोह से मिलने वाली रकम मुफीद आएगी।

आज का तीस्ता गिरफ्तारी प्रकरण भी जाहिरा शेख वाले न्यायिक मुकाम पर खड़ा है। कभी जाहिरा शेख को जहां पहुंचाया गया था, तीस्ता को पहुंचाने की तैयारी है!

 

विकास नारायण राय

 

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