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तीस्ता की लड़ाई

संघ परिवार और भाजपा सरकार के अनेक कारनामों में से एक जुझारू सांप्रदायिकता विरोधी कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को बदनाम कर उन्हें लगातार परेशान करने का सिलसिला है। गुजरात सरकार ने तीस्ता सीतलवाड़ और उनके सबरंग प्रकाशन पर गलत ढंग से विदेशी मुद्रा लेने और सार्वजनिक काम के लिए इकट्ठा किए गए चंदे का निजी खर्च […]

Author Updated: July 30, 2015 4:58 PM

संघ परिवार और भाजपा सरकार के अनेक कारनामों में से एक जुझारू सांप्रदायिकता विरोधी कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को बदनाम कर उन्हें लगातार परेशान करने का सिलसिला है। गुजरात सरकार ने तीस्ता सीतलवाड़ और उनके सबरंग प्रकाशन पर गलत ढंग से विदेशी मुद्रा लेने और सार्वजनिक काम के लिए इकट्ठा किए गए चंदे का निजी खर्च के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है।

राज्य सरकार ने ऐन उस वक्त केंद्रीय गृह मंत्रालय को सीबीआइ द्वारा जांच के लिए कहा, जब गुजरात जनसंहार के कुछ दोषियों के खिलाफ तीस्ता और उसके सहयोगियों की अगुआई में अदालत में लाए मामलों की सुनवाई अंतिम चरण में आ पहुंची है। सीबीआइ में गुजरात से पुलिस अफसरों को ऊंचे पदों पर लाया गया है, इसलिए अचरज नहीं कि त्वरित कार्रवाई हुई और उनके घरों पर सीबीआइ के छापे पड़े। गुजरात पुलिस ने मीडिया को बताया कि कैसे मदिरा, फास्ट फूड आदि पर पैसे खर्च किए गए हैं।

तीस्ता और उनके पति जावेद आनंद पर लगाए ये आक्षेप बहुत पुराने हैं और निष्पक्ष जांच से कुछ निकलने का होता तो साल भर पहले ही सामने आ गया होता। तीस्ता और जावेद सीबीआइ और अन्य एजेंसियों को सारे कागजात दे चुके हैं, जिनमें विदेशी मुद्रा लेने के सारे विवरण हैं। विदेशी संस्था से पैसे लेने के लिए विदेशी मुद्रा पंजीकरण नियम (एफसीआरए) के मुताबिक नाम दर्ज कराना पड़ता है। तीस्ता और जावेद का कहना है कि एफसीआरए नियमों के मुताबिक अगर यह पैसा सलाहकार के काम के लिए मिला है, तो इसमें अनुमति की जरूरत नहीं पड़ती। इसी बात को लेकर विवाद है- जिसकी निष्पत्ति अदालत में चल रही सुनवाई से हो सकती है। अभी तक कहीं इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि उनके अपराध की पुष्टि हो गई है।

गुजरात पुलिस के बयानों पर यकीन करना मुश्किल है, क्योंकि पिछले दशकों में कई ऐसे मामले आए हैं, जहां उसकी भूमिका पर सवाल उठे हैं। कभी राज्य पुलिस का उच्चतम अधिकारी रह चुका शख्स अभी तक जेल में है, और एकाधिक ऊंचे पदों पर रह चुके अधिकारियों को जबरन निलंबित किया गया है। तीस्ता ने अपने तर्इं दस साल के खर्चे का पूरा हिसाब दिखाया है, जिसमें दस साल में उनकी सैंतालीस लाख से जरा कम और जावेद की सवा अड़तीस लाख से जरा ज्यादा की तनख्वाह या मानदेय के अलावा हर खर्च की नामी अकाउंटेंट डीएम साठे समूह द्वारा बाकायदा आॅडिटिंग हुई है। तीस्ता और सहयोगियों द्वारा आयोजित गतिविधियों में देश के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी शामिल रहे हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश वीआर कृष्ण अय्यर और पीबी सावंत जैसी विभूतियां शामिल रही हैं।

इंसाफ और अमन के लिए इकट््ठे हुए मुंबई के जिस सचेत नागरिक समूह की पहल से ये गतिविधियां शुरू हुई थीं, उनमें विजय तेंदुलकर जैसे जाने-माने साहित्य-संस्कृतिकर्मी रहे हैं। तो क्या वे सभी लोग देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं? इनमें से किसी ने भी तीस्ता पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया है। सबरंग की तरह अमन और इंसाफ पसंद नागरिक गुट के खर्चों का भी नामी आॅडिटर्स हरिभक्ति कंपनी द्वारा हर साल हिसाब रखा गया है। दोनों आॅडिटरों ने पुलिस की अपराध शाखा को सूचना दी है कि कहीं कोई गड़बड़ नहीं हुई है।

उन्हें जो विदेशी राशि मिली, उससे कई गुना (बिना अतिशयोक्ति के, कम से कम हजार गुना) ज्यादा संघ परिवार के संगठनों को विदेशों से पैसा मिला है। क्या ऐसे संगठनों पर सीबीआइ के छापे पड़े हैं? कभी किसी राज्य की पुलिस या खुफिया संस्थाओं ने इन संगठनों को देश की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं कहा, जबकि सांप्रदायिक हिंसा में पीड़ित लोगों के लिए की गई पहल और इस पर जागरूकता फैलाने को देश के लिए खतरनाक कहा जा रहा है। संभव है कि बही-खाते में पाई-पाई का हिसाब न मिलता हो। पर उन्हें अपराधी मानना और जैसा कि सीबीआइ के किसी अधिकारी ने कहा है कि वे देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, बिना किसी प्रमाण के ऐसी बातें कहते रहना हमारे समय में फासीवाद के बढ़ते शिकंजे की पहचान है।

देश की कई संस्थाएं और संस्थान देशी-विदेशी संस्थाओं से सहायता लेने की कोशिश करते रहते हैं। तो क्या उन संस्थाओं में काम कर रहे हर किसी के घर पर सीबीआइ का छापा पड़ेगा? देश में शायद ही ऐसी कोई कंपनी होगी, जो पूरी तरह कानूनी ढंग से विदेशी मुद्रा में लेनदेन करती है। बात यह नहीं है कि उन सबकी तरह तीस्ता को भी छोड़ दिया जाए। सवाल है कि ढंग से अदालती कार्रवाई कर दोषियों को सजा दी जा सकती है।

गुलबर्गा सोसायटी, जहां 2002 में एहसान जाफरी समेत उनहत्तर लोगों का कत्ल हुआ था, वहां स्मारक बनाने के लिए सबरंग निधि ने 4.6 लाख रुपए इकट््ठे किए थे। तीस्ता पर इल्जाम है कि इन पैसों का गलत उपयोग हुआ। सच यह है कि जमीन की कीमतें हद से ज्यादा बढ़ जाने की वजह से स्मारक बन नहीं पाया और सारे पैसे निधि के बैंक खाते में जमा हैं।

अगर सचमुच कोई घोटाला है, तो जांच कर दोषियों को सजा दी जाए, पर हर दिन सीबीआइ द्वारा बुलाया जाना और एक ही सवाल बार-बार पूछे जाने का मतलब क्या है? तीस्ता के खिलाफ तैयार किया जा रहा माहौल एक षड्यंत्र है, ताकि गुजरात में हुई हत्याओं के जिन मामलों, खासकर गुलबर्गा सोसायटी के मामलों को वे अदालत में ले आई हैं, उनसे जुड़े गवाहों और न्यायाधीशों में ऐसा खौफ पैदा कर दिया जाए कि ये मामले कभी सही परिणति तक न पहुंच पाएं और पीड़ितों को न्याय न मिल पाए। संयुक्त राष्ट्र के भूतपूर्व मानवाधिकार मामलों के कमिश्नर जज नवी पिल्लै ने चिंता प्रकट की है कि सरकारें मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को राष्ट्रविरोधी करार देती हैं। अगर विदेशी पैसे की समस्या है, तो इसका हल यही है कि मानवाधिकार संस्थाओं को सरकार द्वारा आर्थिक मदद मुहैया कराई जाए।

भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से संघ परिवार के कई गलत कारनामों के बावजूद देश में संघ और सरकार के समर्थकों की कमी नहीं है। वे सभी इस वक्त तीस्ता को बदनाम करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। देश की आम जनता के खिलाफ काम कर रही सरकार को विकास का रहनुमा कहने वाले इन लोगों को पता है कि अस्सी साल पहले जर्मनी में हिटलर की सरकार ने जितनी तेजी से तकनीकी तरक्की की थी, उसकी तुलना में यह सरकार बहुत पीछे है। एक जमाने में सारी जर्मन कौम को हिटलर पसंद था। उनकी संतानें आज तक इस बात को समझ नहीं पा रही हैं कि ऐसा कैसे हुआ।

कई लोग तीस्ता पर लगे इल्जामों का जिक्र करते हुए दुहाई देते हैं कि सवाल उठाना ही लोकतंत्र की निशानी है। बात सही है। पर कौन नहीं जानता कि सवाल उठाने की वजह से ही तीस्ता को तंग किया जा रहा है।

निरपेक्षता का दावा करना, खासकर ऐसे विवादों में जहां एक पार्टी खुलेआम सांप्रदायिक हो और जिसके बारे में स्पष्ट हो कि वे हिंसा की राजनीति करते हैं और निर्दोषों का कत्ल कराते रहे हों, ऐसा दावा एक राजनीतिक पक्षधरता है। मौजूदा सरकार और संघ परिवार के अधीन हर एजेंसी की पहली रणनीति हिटलर के सूचना अधिकारी गोएबल्स की तरह जोर-शोर से झूठी बातें फैला कर झूठ को सच में बदलने की कोशिश होती है। यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि तीस्ता के खिलाफ इल्जाम उस गुजरात पुलिस ने लगाए हैं, जो बुरी तरह बदनाम है। संभव है कि गुजरात पुलिस की सारी बातें सच हों, पर जब तक वे प्रमाणित न हों, उन्हें सच मान लेना और दूसरे पक्ष को निश्चित रूप से दोषी ठहराना लोकतांत्रिक नहीं कहला सकता।

जिस तरह सीबीआइ और एनआइए आदि जांच संस्थाओं का इस्तेमाल सत्तासीन राजनीतिक दल के हितों की रक्षा के लिए होने लगा है, अगर तीस्ता को जेल हो जाती है, तो भी सवाल रह जाएंगे, पर अदालत की राय आने के पहले गुजरात पुलिस के बयानों के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया जाना बीमार मानसिकता ही दर्शाता है। तीस्ता ने बार-बार इन आरोपों का खंडन करते हुए लोगों तक जानकारी पहुंचाने की कोशिश की है। यह जानकारी भी सार्वजनिक है। हम किस जानकारी को क्यों याद रखते हैं, और किसे भूल जाते हैं, यह हमारी राजनीतिक पक्षधरता को दिखाता है। जब पढ़े-लिखे लोग इस तरह शासक वर्गों के समर्थन में आग्रह के साथ खड़े होने लगते हैं, तो यह फासीवाद को जन्म देता है।

कई लोगों को चिढ़ होती है कि 1984 या 2002 की घटनाओं पर कब तक बात होती रहेगी। अव्वल तो न्याय की गुहार तब तक उठती रहेगी जब तक न्याय नहीं मिलता है, पर ज्यादा गंभीर बात यह है कि इतिहास को, खासकर निर्दोषों के साथ हुए जुल्मों को इसलिए बार-बार याद करना पड़ता है कि वैसी स्थितियां दुबारा न आ पाएं। अतीत के अन्यायों को छिपाना देश का गौरव नहीं बढ़ाता। उन्हें याद कर यह सुनिश्चित करना कि भविष्य में फिर कभी जुल्म न ढाए जाएं, सभ्यता और गर्व की बात है। अगर हमें अपने अंदर पूरी तरह इंसानियत को बसाना है, तो दूसरों के दर्द को समझना पड़ेगा और इंसानियत पर कहर ढाने वालों को सजा देने के लिए आवाज उठानी पड़ेगी, चाहे वे कितने भी ताकतवर क्यों न हों। तीस्ता की लड़ाई इसी संघर्ष का हिस्सा है।

लाल्टू

 

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