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राजनीतिः ट्रंप का अमेरिकी राष्ट्रवाद

इस समय पाक-अमेरिकन मतदाता ट्रंप के बारे में क्या सोचते हैं? बराक हुसैन ओबामा ऐसे राष्ट्रपति प्रत्याशी रहे थे, जिनके कारण मुसलमान देशों से अमेरिका में बस गए मतदाता भावनात्मक रूप से जुड़ गए थे। इसके बरक्स ट्रंप के बयानों से अमेरिका के मुसलिम मतदाता रिपब्लिकन के खिलाफ गोलबंद होंगे, इसकी संभावना बढ़ी है।

Author March 24, 2016 3:57 AM
डोनाल्ड ट्रंप ने चीन पर बोला हमला, कहा-अपने देश का और बलात्कार नहीं करने देंगे।

पुष्परंजन

डोनाल्ड ट्रंप ऐसे नृप नहीं हो सकते, जिनके सत्ता में आने से हानि-लाभ की चिंता न की जाए। उनके आने से फर्क तो पड़ेगा। ट्रंप ने अब तक बयानों के जो प्रक्षेपास्त्र दागे हैं, उन्होंने भारतवंशी दक्षिणपंथी ताकतों को सोचने पर विवश किया है कि अगर यह व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति बना तो पाकिस्तान की खैर नहीं। और उनकी भी खैर नहीं, जो इस्लाम के नाम पर दक्षिण एशिया में राजनीति की रोटी सेंक रहे हैं। 24 सितंबर, 2015 के एक रेडियो प्रसारण में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि पाकिस्तान, उत्तर कोरिया से भी बड़ा पागल देश है, और उसे ठीक करना है। शायद यह दुनिया का सबसे खतरनाक देश है, जिसके पास परमाणु हथियार होना एक गंभीर समस्या है। डोनाल्ड ट्रंप ने छह माह पहले के उस रेडियो प्रसारण में कहा था कि पाकिस्तान को ‘कंट्रोल’ करने के लिए भारत से नजदीकियां बढ़ाना जरूरी है।

इसका मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान विरोधी कठोर हिंदूवादी ताकतों को ट्रंप में अपना अक्स दिख रहा है। ट्रंप पर पूरी दुनिया का ध्यान उनके विध्वंसक बयानों के कारण गया है। 13 मार्च को ट्रंप ने एक बार फिर घृणा फैलाने वाला बयान दिया कि 27 फीसद मुसलमान ‘मिलिटेंट’ हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि जिस दिन से राष्ट्रपति पद का नामांकन मैंने भरा है, ‘अवैध अप्रवासी’ भागने लगे हैं। नवंबर, 2015 से ही ट्रंप अप्रवासी विरोधी आग उगल रहे हैं। ट्रंप, अमेरिका में रह रहे मुसलमानों का डाटा बेस चाहते हैं, ताकि उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। ट्रंप ने राजनीतिक बकैती करके रिपब्लिकन पार्टी का चेहरा इस्लाम विरोधी बना दिया है, बल्कि यों कहें कि अमेरिका में एक नए किस्म के राष्ट्रवाद का प्रादुर्भाव हो रहा है, जिससे श्वेत मतदाता भी आकर्षित हो रहे हैं।

रिपब्लिकन पार्टी के इस राष्ट्रवाद में मार्टिन लूथर किंग की सोच को जगह कितनी मिलती है, यह भी विमर्श का विषय है। अमेरिकन सिविल राइट्स के प्रणेता मार्टिन लूथर किंग के पोस्टर का इस्तेमाल 2006 तक रिपब्लिकन पार्टी करती रही है। अमेरिकी राजनीति के इतिहास में अश्वेतों के अधिकारों की लड़ाई सबसे अधिक शिद्दत से रिपब्लिकन पार्टी लड़ती रही है। लेकिन बराक हुसैन ओबामा के 2004 से सक्रिय होने, और 20 जनवरी, 2009 को अमेरिका के चौवालीसवें राष्ट्रपति बनने के बाद डेमोके्रट्स ने अश्वेतों की चोबदारी रिपब्लिकन पार्टी से छीन ली थी। उनसे पहले रिपब्लिकन पार्टी के नेता और अमेरिका के तैंतालीसवें राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश इराक युद्ध के कारण राष्ट्रवादी तत्त्वों के चहेते बने हुए थे।

लेकिन रिपब्लिकन पार्टी के इस नव-राष्ट्रवाद के पीछे क्या अमेरिका की यहूदी लॉबी काम कर रही है? इजराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू कभी बराक ओबामा के हम प्याला हम निवाला हुआ करते थे। दोस्ती इतनी परवान चढ़ी थी कि दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद ओबामा जब मार्च, 2013 में तेल अबीब गए, तो उनका स्वागत एक शहंशाह की तरह हुआ। वही नेतन्याहू ओबामा की लाइन के विरुद्ध तीन मार्च 2015 को अमेरिकी संसद के साझा सत्र को संबोधित कर रहे थे। नेतन्याहू, अमेरिकी संसद में ईरान के विरुद्ध एक बार फिर कड़े प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे थे, जो ओबामा को मंजूर नहीं था। उस समय ओबामा का तर्क था कि ‘जब फाइव प्लस वन’ समूह (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, और साथ में जर्मनी) जेनेवा करार के तहत बातचीत कर रहा है, तो प्रतिबंध लगा कर हम उन प्रयासों को पटरी से क्यों उतारें।
ओबामा को नेतन्याहू से खुन्नस दो बातों को लेकर है। एक, वह ईरान के मामले में वाइट हाउस की सलाह नहीं सुन रहे थे। दूसरा, ओबामा को ‘बाइपास’ करते हुए अमेरिकी संसद के निचले सदन ‘प्रतिनिधि सभा’ के सभापति जॉन बोयनर का उन्होंने इस्तेमाल किया था। अमेरिकी संसद में ईरान के विरुद्ध प्रस्ताव, ओबामा की प्रतिद्वंद्वी रिपब्लिकन पार्टी ने रखा था। नेतन्याहू ने ईरान के विरुद्ध प्रस्ताव को वाशिंगटन स्थित अमेरिकन इजराइल पब्लिक अफेयर्स कमेटी (एआइपीएसी) में भी भुनाया था। ‘एआइपीएसी’ यहूदियों की एक ताकतवर लॉबी है, जो अमेरिका से इजराइल तक हथियार, परमाणु उद्योग और सत्ता के गलियारों को प्रभावित करती है।

नेतन्याहू को चौथी बार इजराइल की ‘अल्ट्रा राष्ट्रवादी’ विचारधारा का जनादेश मिला है, जो न फिलस्तीनी अल्पसंख्यकों को इजराइल में आशियाना या आबोदाना देने का पक्षधर है, न ही अधिकृत इलाकों में रहने वाले फिलस्तीनियों को समान अधिकार देना स्वीकार करता है। यही वह विचारधारा है, जिसका विस्तार अमेरिकी चुनाव में इस्लाम विरोध के रूप में दिखने लगा है।

मगर इसका मतलब यह नहीं कि ट्रंप के मुकाबले रिपब्लिकन पार्टी की प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन कमजोर पड़ रही हैं। वाश्ािंगटन पोस्ट-एबीसी न्यूज ने मार्च महीने की शुरुआत में एक सर्वे द्वारा इसकी जानकारी दी थी कि पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन को पचास से इकतालीस प्रतिशत रजिस्टर्ड वोटर पसंद कर रहे हैं। उनके मुकाबले ट्रंप उनचास से चालीस फीसद श्वेत मतदाताओं के बीच लोकप्रिय हैं। जबकि हिलेरी को तिहत्तर से उन्नीस तक अश्वेत मतदाता पसंद कर रहे हैं।

दो चुनावों से सत्तारूढ़ डेमोके्रट की ताकत अफ्रीकी, मैक्सिको, लातिनी अमेरिकी देशों के ‘हिस्पानिक-लैटिनो’ मतदाता हैं। अमेरिका में ‘हिस्पानिक-लैटिनो’ आबादी साढ़े पांच करोड़ के आसपास है। उनमें वोट देने लायक नौ प्रतिशत मतदाता हैं। 2008 में बराक ओबामा को सड़सठ फीसद हिस्पानिक-लैटिनो मतदाताओं ने समर्थन दिया था। चार साल बाद, 2012 में लगभग इतनी ही संख्या में हिस्पानिक-लैटिनो वोटरों ने डेमोके्रट का समर्थन किया था। यानी ओबामा की पकड़ हिस्पानिक-लैटिनो वोटरों पर रही है। बाकी बचे बीस फीसद हिस्पानिक-लैटिनो मतदाता रिपब्लिकन को पसंद कर रहे हैं।

ट्रंप ने अप्रवासी नीति में जो सख्ती दिखाने की बात कही है, उससे हिस्पानिक मतदाताओं का वोट प्रतिशत रिपब्लिकन के वास्ते बढ़ जाएगा, उसकी उम्मीद कम की जानी चाहिए। नवेदा, न्यू मैक्सिको और बहुत हद तक कोलाराडो, ‘हिस्पानिक-लैटिनो’ मतदाताओं के गढ़ हैं, जो वोट प्रतिशत को प्रभावित करते हैं।

इस समय ओबामा जैसा अश्वेत प्रत्याशी अमेरिकी चुनाव में नहीं खड़ा है, उस लिहाज से ‘हिस्पानिक-लैटिनो’ मतदाताओं में से कुछ के समक्ष यह धर्मसंकट रहेगा कि दो श्वेत प्रत्याशियों (हिलेरी और ट्रंप) में से किसे प्राथमिकता दें। यों भी बराक ओबामा, अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति हैं, जिन्हें दो चुनावों में लगातार जीत हासिल हुई थी। अमेरिका में अब तक जितने भी श्वेत शासनाध्यक्ष चुने गए, उनमें डेमोके्रट की संख्या अधिक रही है। ट्रंप के कारण इस चुनाव में राष्ट्रीय सुरक्षा, गन कंट्रोल, स्वास्थ्य, बेरोजगारी जैसा एजेंडा पीछे रह गया, ‘उग्र राष्ट्रवाद’ बहस के आगे-आगे चल रहा है। इसका मुख्य कारण ‘ब्लू वाल’ में सेंध लगाना है।

अमेरिकी राजनीति में ‘ब्लू वाल’ की अवधारणा ‘अटलांटिक मीडिया’ के पत्रकार रोनाल्ड ब्राउनश्टाइन ने विकसित की थी, जिसका आशय कोलंबिया डीसी के साथ वे अठारह राज्य हैं, जहां पर 1992 से हुए छह चुनावों में डेमोक्रेट को फतह हासिल होती रही है। इन अठारह राज्यों में मिशिगन, पेन्सेल्विनिया, विस्किोन्सिन, मिन्नसोटा, ओहियो, फ्लोरिडा, वर्जीनिया, न्यू हैंपशायर और लोवा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जहां के वोटर आखिरी वक्त चुनाव का पासा पलट देते हैं।

डेमोक्रेट के रणनीतिकार स्टीव श्मिट भी स्वीकार करते हैं कि ट्रंप ऐन वक्त कौन-सी चाल चलेंगे, कहना मुश्किल है। श्मिट कहते हैं, ‘ट्रंप, न्यूट्रॉन बम हैं!’ दरअसल, ट्रंप को डेमोक्रेट ‘घर का भेदी’ मानते हैं। होटल कारोबारी डोनाल्ड ट्रंप 1987 तक डेमोक्रेट समर्थक थे। उन्होंने क्लिंटन फाउंडेशन को दो किस्तों में साढ़े तीन लाख डॉलर दिए थे। 2008 में ट्रंप ने लिखा, ‘हिलेरी क्लिंटन एक महान राष्ट्रपति, या उपराष्ट्रपति बन सकती हैं।’ हांलांकि इस टिप्पणी से साल भर पहले डोनाल्ड ट्रंप पार्टी छोड़ चुके थे। 1987 से 1999 तक ट्रंप ‘रिपब्लिकन’ बने रहे। 1999 से 2001 तक ट्रंप ‘रिफार्म पार्टी’ में सक्रिय हो गए। 2001 से 2009 तक वे फिर ‘डेमोक्रेट’ बन गए। 2009 से 2011 ट्रंप ‘रिपब्लिकन’ में वापस हो गए। 2011-12 के बीच ट्रंप ‘इंडिपेंडेंट’ रहे, और 2012 के बाद से डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ‘रिपब्लिकन’ की सेवा में लग गए। ट्रंप जैसा ‘आया राम-गया राम’ नेता आज की तारीख में राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार है, इसे अमेरिकी राजनीति का दुर्भाग्य ही कहेंगे।

बड़ा सवाल यह है कि इस समय पाक-अमेरिकन मतदाता ट्रंप के बारे में क्या सोचते हैं? बराक हुसैन ओबामा ऐसे राष्ट्रपति प्रत्याशी रहे थे, जिनके कारण मुसलमान देशों से अमेरिका में बस गए मतदाता भावनात्मक रूप से जुड़ गए थे। इसके बरक्स ट्रंप के बयानों से अमेरिका के मुसलिम मतदाता रिपब्लिकन के खिलाफ गोलबंद होंगे, इसकी संभावना बढ़ी है। ‘पीइडब्ल्यू रिसर्च सेंटर’ के अनुसार, अमेरिका में तकरीबन तैंतीस लाख मुसलमान हैं, जो 1950 में दोगुने हो जाएंगे। ईसाइयों के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक समूह है, जो अमेरिका की राजनीति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।

इस समूह को सबसे बड़ी चिंता अमेरिका की पाक नीति को लेकर रही है। ‘पाक-पैक यूएसए’, ‘पाकिस्तान एक्सपैट कम्युनिटी’ जैसे फोरम के जरिए पाक-अमेरिकन जिस तरह के संवाद कर रहे हैं, उससे उनकी चिंता का अनुमान लगाया जा सकता है। वे इस बात के फिक्रमंद हैं कि ट्रंप अगर सत्ता में आए, तो पाकिस्तान को मिलने वाले फंड में भारी कटौती होगी। पाक वोटरों की दूसरी चिंता अमेरिका के भारत के और करीब जाने को लेकर है, जो शायद दक्षिण एशिया की भू-सामरिक दिशा को बदल दे!

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