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राजनीतिः रोजगार हड़पती तकनीक

देश में तेजी से बढ़ती बेरोजगारी और गरीबी की समस्या औद्योगीकरण की नीतियों से हल नहीं की जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि खेती की दशा को तो सुधारा ही जाए, जनता को खेती के अलावा भी काम दिया जाए और उसकी आय बढ़ाई जाए। उसे कम से कम अन्न और वस्त्र आदि ऐसी आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि में स्वावलंबी बनाया जाए। यह हो सकता है जब देश में उत्पादन बढ़े, उद्योग और व्यवसाय फिर से जीवित हों और उत्पादक जनवर्ग अपने श्रम से उत्पन्न पदार्थ का स्वामी हो।

Author September 11, 2018 1:33 AM
आज स्वीकार किया जा रहा है कि भारत में कपड़ा उत्पादन के लिए मिलों की स्थापना की जाए तो केवल दस लाख व्यक्तियों को ही काम मिलेगा।

निरंकार सिंह

दुनिया भर में तकनीकी विकास के साथ-साथ बेरोजगारी भी बढ़ती जा रही है। तकनीकी विकास से एक तरफ जहां भ्रष्टाचार पर लगाम लगी है, वहीं दूसरी तरफ कंपनियों में छंटनी से लाखों लोगों को बेरोजगार होना पड़ा है। हमारी आबादी जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसके लिए रोजगार के अवसर लगातार घटते जा रहे हैं। कारखानों में कपड़ा बुनने से लेकर कपड़ों की सिलाई तक काम भी अब रोबोट कर रहे हैं। इससे इस क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या घटी है। कुछ रेस्टोरेंटों में बर्गर, पिज्जा, कॉफी बनाने का काम भी रोबोट और मशीनें करने लगी हैं। आज ऐसे कंप्यूटर साफ्टवेयर आ गए हैं जो शोध संबंधी सामग्री का अनुवाद भी कर देते हैं। कोई कानूनी समस्या है तो वे उसके निदान का उपाय भी बताते हैं। किस तरह के वाद में पहले उच्च अदालतों ने क्या-क्या फैसले किए थे, यह सब भी खोज कर पूरा ब्योरा प्रस्तुत कर देते हैं। कृषि के क्षेत्र में पहले टैक्ट्रर, हार्वेस्टरों ने खेतिहर मजदूरों का काम छीन लिया है। कुल मिलाकर सभी क्षेत्रों में नई तकनीकें श्रमिकों के रोजगार को हड़प ले रही हैं।

वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की रिपोर्ट ‘द फ्यूचर ऑफ जाब्स’ के मुताबिक मौजूदा दौर के तकनीकी विकास, रोबोटिक्स और कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) के दबदबे के चलते 2020 तक दुनिया भर में करीब पचास लाख नौकरियां गायब होने वाली हैं। इस रिपोर्ट को तैयार करने वालों ने विश्व की पंद्रह उभरती और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ ही दुनिया भर के करीब पैंसठ फीसद कर्मचारियों का सर्वे भी किया है। ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, चीन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और भारत जैसी इन अर्थव्यवस्थाओं में लगभग इकहत्तर लाख रोजगार कम होने का अनुमान लगाया गया है। लेकिन इन पांच सालों में रोजगार के इक्कीस लाख नए अवसर पैदा भी होंगे। इसलिए ऐसा माना जा रहा है कि लेनी-देनी मिलाकर कुल पचास लाख नौकरियों पर गाज गिर सकती है। इस परिवर्तन के सबसे ज्यादा शिकार होंगे प्रशासनिक और दफ्तरी काम करने वाले कर्मचारी।

बहरहाल एक अच्छी बात यह है कि भारत समेत कुल पांच देश ऐसे बताए गए हैं जहां नए रोजगार बनने की रफ्तार पुराने रोजगार जाने से तेज रह सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश कंपनियां अब बड़ी तादात में नियुक्ति से मुंह फेर लेंगी। अधिकाधिक काम चूंकि कंप्यूटर या रोबोट करेंगे, इसलिए उनका सारा ध्यान कर्मचारियों के विशिष्ट कौशल पर ही रहेगा। भारत में कौशल विकास योजना और बैंकों के मार्फत करोड़ों लोगों को स्वरोजगार भी उपलब्ध कराया है, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में शिक्षित और अशिक्षित युवक बेरोजगार हैं। दुनिया भर की सरकारों के सामने यह एक ऐसी चुनौती है जिससे वे कतरा कर नहीं निकल सकतीं। उन्हें सोचना होगा कि रचनात्मक माहौल बना कर समय के साथ चलने लायक कामकाजी फौज कैसे तैयार की जाए। इसलिए हमें गंभीरतापूर्वक इस बात पर विचार करना होगा कि जिस देश में इतने बड़े पैमाने पर बेरोजगारी हों और देश की अधिसंख्य आबादी गांवों में बसती हो, वहां हमारी विकास योजनाओं की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए? इसका उत्तर महात्मा गांधी ने दिया है।

दरअसल, देश के विकास की ग्राम स्वराज्य की अपनी परिकल्पना में गांधी जी ने गरीबी और बेरोजगारी को दूर करने का जो खाका तैयार किया था, उसकी उपेक्षा करके हमने बहुत बड़ी गलती की है। जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे नेताओं ने गांधी जी के मार्ग को दकियानूसी माना और आधुनिक विकास के औद्योगीकरण के रास्ते पर चले। इसका परिणाम सबके सामने है। इसलिए अब कई लोग यह महसूस करते हैं कि हमने गांधी जी के रास्ते को छोड़ कर बहुत बड़ी गलती की है। अत: अब सब लोग गांधी जी की विचारधारा से मिलता-जुलता विचार रखने लगे हैं। जैसे कि कृषि हमारी विकास योजना का मुख्य आधार बनना चाहिए। इसकी बुनियाद पर ही गृह उद्योगों और ग्रामोद्योग की एक रूपरेखा गांवों के विकास के लिए बनानी चाहिए। उसमें बिजली, परिवहन और बाजार आदि की सुविधाएं भी उपलब्ध करायी जानी चाहिए।

देश में तेजी से बढ़ती बेरोजगारी और गरीबी की समस्या औद्योगीकरण की नीतियों से हल नहीं की जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि खेती की दशा को तो सुधारा ही जाए, जनता को खेती के अलावा भी काम दिया जाए और उसकी आय बढ़ाई जाए। उसे कम से कम अन्न और वस्त्र आदि ऐसी आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि में स्वावलंबी बनाया जाए। यह हो सकता है जब देश में उत्पादन बढ़े, उद्योग और व्यवसाय फिर से जीवित हों और उत्पादक जनवर्ग अपने श्रम से उत्पन्न पदार्थ का स्वामी हो। इस लक्ष्य की पूर्ति के दो मार्ग संभव हैं। एक तो यह कि देश में नए कल-कारखाने स्थापित किए जाएं, नई पद्धति से उत्पादन और उद्योग की व्यवस्था की जाए और दूसरा मार्ग उत्पादन की वह पुरानी पद्धति है, कुटीर व्यवसायों और उद्योगों का प्रकार है, जो लगभग दो शताब्दी पूर्व तक भारत के आर्थिक संगठन का मेरूदंड बना हुआ था। यदि थोड़ी देर के लिए यह मान लिया जाए कि भारत में उत्पादन की नई पद्धति और नए कारखानों की स्थापना से देश के करोड़ों लोगों की बेरोजगारी का परिमार्जन किया जा सकता है, तो भी जब हम भारत की विशेष परिस्थिति और आवश्यकता पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि न तो उन उपाय को काम में लाना संभव है और न उससे हमारी वे समस्याएं सुलझेंगी जो मुंह बाये सामने खड़ी हैं।

सवाल यह भी है कि औद्योगीकरण की नीतियों पर चलकर क्या हम अपने लगभग पच्चीस करोड़ बेरोजगार नौजवानों को कल-कारखानों में काम दे सकते हैं? क्या इतनी पूंजी हमारे पास है कि हम इतनी बड़ी संख्या में कारखाने लगा सकते हैं? यदि यह मान लिया जाए कि यह हो भी सकता है तो इतने कल कारखानों में उत्पादित माल की खपत कहां होगी? इसलिए भारत की विशेष परिस्थिति विशेष आवश्यकता की ओर संकेत करती है जिसकी पूर्ति का उपाय भी दूसरा होगा। गांधी जी इस बात को पहले ही समझ गए थे कि भारत की असली समस्या करोड़ों बेरोजगारों को काम देने की है और इसका समाधान बड़े-बड़े कल कारखाने नहीं कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने कहा था कि ‘कल कारखाने उस समय कुछ लाभ पहुंचा सकते हैं, जब आवश्यक और अपेक्षित उत्पादन के लिए उत्पादकों की संख्या कम हो। पर जहां, उत्पादकों ओर काम करने वालों की संख्या काम से अधिक है, वहां कारखाने न केवल अहितकर, बल्कि अभिशाप सिद्ध होते हैं।’ इस समस्या को सुलझाने की एकमात्र संभव दिशा वह है जिधर चर्खा और खादी संकेत करती हैं।

आज स्वीकार किया जा रहा है कि भारत में कपड़ा उत्पादन के लिए मिलों की स्थापना की जाए तो केवल दस लाख व्यक्तियों को ही काम मिलेगा। मिलों की स्थापना में जहां उसे हजारों अरब रुपए की पूंजी लगानी पड़ेगी वहां केवल कुछ सौ करोड़ की पूंजी से सारे भारत को वस्त्र और साढ़े पांच करोड़ से अधिक नर-नारियों को काम दिया जा सकता है। याद रहे, साढ़े पांच करोड़ केवल बुनकर होंगे। कत्तिन, बढ़ई, लोहार और अन्य कारीगरों की संख्या इनके अलावा होगी जिन्हें काम मिल जाएगा। यह केवल वस्त्र के व्यवसाय में हो जाता है। केवल एक दिशा करोड़ों नर-नारियों को काम देकर भूमि के बोझ को हलका कर देती है। इस योजना में भारत जैसे गरीब देश को न पूंजी की खोज करनी है और न विदेशी कंपनियों के हस्तक्षेप का भय है। जगत की कोई शक्ति नहीं है कि भारत की आर्थिक समस्या के समाधान और आर्थिक जीवन के पुनरुद्धार में बाधक हो सके। इसलिए गांधी के बताए ग्राम स्वराज्य के रास्ते पर ही चल कर हम अपने देश के करोड़ों लोगों को रोजगार मुहैया करा सकते हैं। देश की तकदीर बदलने का यही एकमात्र संभव उपाय है।

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