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तकनीकी शिक्षा और सिमटती नौकरियां

तकनीकी शिक्षा कहीं न कहीं साहित्य और भाषाई विषयों के शैक्षिक दर्शन की दृष्टि से अलग है। अगर विज्ञान और तकनीक को शिक्षा-दर्शन की नजर से देखने-समझने की कोशिश करें तो दोनों में बुनियादी अंतर दिखाई देता है। तकनीक जहां आंकड़ों, यथार्थ, सत्यता और प्रामाणिकता पर जोर देती है, वहीं साहित्य सृजन की वैयक्तिक भिन्नता पर निर्भर है।

Author May 25, 2017 5:21 AM
पिछले तीन साल में बेरोजगारी की दर बढ़ी है। (फाइल फोटो)

कौशलेंद्र प्रपन्न

तमाम संचार माध्यमों पर बड़ी गंभीरता से यह खबर प्रसारित हो रही है कि सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में विश्व स्तर पर दुबारा मंदी छा रही है। विभिन्न रिपोर्टों और अध्ययनों के मुताबिक भारत में रेलिक्जर, एचसीएल, टेक महिंद्रा आदि कंपनियों ने तेजी से छंटनी शुरू कर दी है। मैकीन्से की जनवरी में आई रिपोर्ट के अनुसार भारत में आईटी सेक्टर ने सैंतीस लाख नौकरियां प्रदान की हैं। लेकिन इस रिपोर्ट में यह भी हिदायत दी गई है कि आने वाले दो-तीन सालों में इनमें से आधी अप्रासंगिक हो जाएंगी। यानी आईटी क्षेत्र के कर्मचारियों को कल नई तकनीक का सामना करना होगा, जिसके लिए वे तैयार नहीं होंगे। इसलिए उनकी नौकरियों पर तलवार लटकी हुई है। माना जा रहा है कि आईटी क्षेत्र में अगले तीन सालों में तकरीबन दस लाख नौकरियों पर गाज गिर सकती है। रेलिक्जर ने तो उच्च पदों पर कार्यरत अधिकारियों से कहा कि अगले छह महीने या साल भर का वेतन लें और कल से नौकरी पर न आएं। हालांकि जिन लोगों के सामने ऐसे प्रस्ताव रखे गए उनका वेतन करोड़ों में था।

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एक दूसरा कारण यह भी है कि रोज नई तकनीक इजाद हो रही है। बहुत तेजी से पुराने सॉफ्टवेयर और मशीनों को नई चुनौती मिल रही है। अगर नई तकनीक और औजारों से परिचित नहीं हैं, तो आप बाजार और कंपनी के लिए किसी काम के नहीं हैं। आपको हर दिन साबित करना होता है कि आप कंपनी के काम के कर्मचारी हैं। सूचना तकनीक क्षेत्र में इन दिनों सबसे बड़ी खबर यही गरम है कि अगर आप अपनी समझ और ज्ञान को वर्तमान सूचना तकनीक और बाजार के अनुरूप नहीं ढालेंगे, तो बाजार अनुपयोगी साबित कर देगा। आपके स्थान पर आपसे कम वेतन में काम करने वालों की भीड़ खड़ी है। दूसरे, कंपनियों में मानव संसाधन को कम किया जा रहा है। कंपनियां एक बार पैसे खर्च कर मशीन लगा कर, पूरे काम को आॅटोमेटेड कर, मानवीय श्रम को खत्म करना चाहती हैं। यह लड़ाई मानवीय श्रम और तकनीक वर्चस्व का है। तकनीकी शिक्षा कहीं न कहीं साहित्य और भाषाई विषयों के शैक्षिक दर्शन की दृष्टि से अलग है। अगर विज्ञान और तकनीक को शिक्षा-दर्शन की नजर से देखने-समझने की कोशिश करें तो दोनों में बुनियादी अंतर दिखाई देता है। तकनीक जहां आंकड़ों, यथार्थ, सत्यता और प्रामाणिकता पर जोर देती है, वहीं साहित्य सृजन की वैयक्तिक भिन्नता पर निर्भर है। विज्ञान और तकनीक का सत्य सार्वभौमिक होता है, जबकि साहित्य का सत्य वैयक्तिक और सामाजिक संदर्भ पर निर्भर करता है। साहित्य का सत्य काल और व्यक्ति सापेक्ष होता है, जबकि तकनीक के लिए सत्य भिन्न है। क्योंकि इन क्षेत्रों में रोज अनुसंधान और प्रयोग हो रहे हैं।

तकनीक और साहित्य के शिक्षा-शिक्षण शास्त्र में भी बुनियादी अंतर देखा जा सकता है। जहां विज्ञान और तकनीक में पूर्व निर्धारित तथ्यों को स्वीकार करने पर जोर दिया जाता है, वहीं साहित्य शिक्षण में सृजनात्मकता के विविध आयामों पर ध्यान दिया जाता है। समाज में साहित्य के प्रति जिस प्रकार की धारणा होती है, तकनीक के प्रति वही दृष्टिकोण नहीं अपनाया जाता। तकनीक यूजर फ्रेंडली होती है, वहीं साहित्य पाठक फ्रेंडली नहीं होता। लेखक जो लिखना चाहता है वही लिखता है। पाठक उसे अपने अनुभव से जोड़ कर अर्थ ग्रहण करता है। उपभोक्ता पुस्तिका को पढ़ कर औजार को चलाना सीखा जा सकता है, लेकिन साहित्य किसी मार्गदर्शिका से समझने वाली चीज नहीं है। साहित्य को हर पाठक अपने अनुभव जगत से जोड़ कर उसके संदर्भगत अर्थ ग्रहण करता है।
क्या स्कूली स्तर पर बच्चों और शिक्षकों में तकनीक को लेकर किसी किस्म का भय है या जिस रुचि और चाव से कविताएं, कहानियां पढ़ते हैं उसी लगन से तकनीक को स्वीकार कर पाते हैं? तकनीक और विज्ञान को बेहद प्रामाणिक, सत्यापित और स्थापित ज्ञान के तौर पर पढ़ाया जाता है, वहीं साहित्य को काल्पनिक और अयथार्थ ज्ञान के तौर पर बरता जाता है। यही कारण है कि साहित्य और तकनीक के छात्रों के सामाजिक नजरिए में एक बुनियादी अंतर देखा जा सकता है।
जहां साहित्य का अध्येता समाज और परिवेश को साहित्य की दृष्टि से सत्यम् शिवम् और सुंदरम् ही देखता-महसूस करता है, बल्कि वह समाज से साहित्य के अनुसार ही व्यवहार की भी अपेक्षा करता है। वहीं तकनीक के विद्यार्थी समाज और सामाजिक रिश्तों, मान्यताओं आदि को बाजार और अर्थ के मापदंडों पर परखने की कोशिश करते हैं। यह दृष्टि भेद न केवल स्कूल स्तर पर, बल्कि ताजिंदगी देखा जा सकता है। साहित्य का पाठक समाज और सामाजिक मूल्यों को संवेदना के धरातल पर परखता है, तो तकनीक, विज्ञान या मैनेजमेंट का छात्र पाठ्यक्रम, शिक्षा और जीवन को बाजार मूल्यों, यथार्थ और वैश्विक चुनौतियों की कसौटी पर कसता है। अगर इन शैक्षिक और सामाजिक बुनावटों को समझ लिया तो तकनीक के शैक्षिक दर्शन और भय की परतों को खोला जा सकता है।
पूरे देश में इस समय दो स्तरीय उच्च और माध्यमिक शिक्षा की दुनिया रची जा रही है। एक ओर निजी कंपनियों के मुनाफे से चलने वाले शैक्षिक संस्थान हैं, तो दूसरी ओर सरकार की योजनाआें और सदिच्छाओं पर चल रहे हैं। दोनों शैक्षिक संस्थानों के पाठ्यक्रमों पर नजर डालें तो एक बहुत बड़ा अंतर नजर आएगा। निजी शैक्षिक संस्थानों में व्यापार होटल, सूचना तकनीक, बाजार आदि से संबंधित पाठ्यक्रम होते हैं, जहां मानवीय संकाय के विषयों, मसलन भाषा, दर्शन, शिक्षा, मनोविज्ञान, समाज विज्ञान आदि को कोई स्थान नहीं दिया जाता। सरकारी स्तर पर इस खाई को पाटने का प्रयास भी नहीं होता। कई पाठ्यक्रम भुगतान आधारित होते हैं, कुछ की फीस अभिभावकों से ली जाती है, तो ऐसे में बाजार सामने आता है और कर्ज लेकर बच्चे पढ़ाई करते हैं। उस पर तुर्रा यह कि वे सपने बहुत बड़ी नौकरी के पाल लेते हैं।

कैंपस प्लेसमेंट में जिस तरह से कंपनियों और निजी शैक्षिक संस्थानों की आपसी सांठ गांठ होती है, उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब सूचना तकनीक और अन्य व्यावसायिक विषयों में स्नातक और परास्नातक पाठ्यक्रम पूरा कर बच्चे नौकरी के लिए भटकते हैं, तब उन्हें वास्तविक दुनिया और विषय की प्रासंगिकता का अहसास होता है। लाखों रुपए खर्च कर बच्चे इंजीनियरिंग की राह पर तो चल पड़ते हैं, लेकिन जब बाजार की मांगों के अनुरूप नहीं काम कर पाते तो उस बच्चे के साथ-साथ संस्थान की नाक भी नीची होती है। सूचना तकनीक हो या अन्य तकनीकी पाठ्यक्रम, इन्हें पढ़ने वाले बच्चे बहुत जल्दी कमाने की होड़ में लग जाते हैं। हालांकि यह दबाव कई बार अभिभावकों का भी होता है और समााज का भी। लेकिन इस प्रक्रिया में बच्चा अपनी समझ और ज्ञान के निर्माण में जल्दबाजी की वजह से विषय की बारीकियों को नहीं पकड़ पाता। इसी का परिणाम होता है कि जब ऐसे बच्चे बाजार में जाते हैं तो उनकी पढ़ाई और मांग के बीच एक गहरी खाई नजर आती है। खासकर समाज में कुछ पेशे ऐसे हैं, जिनमें पढ़ना बेहद जरूरी माना जाता है। अगर आप पढ़ते नहीं हैं तो अपने पेशे में हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं। डॉक्टर, टीचर, वकील, इंजीनियर आदि अपने क्षेत्र में होने वाले नए-नए अनुसंधानों आदि से वाकिफ नहीं होंगे, तो वे अपनी पेशेगत मांग में पीछे रह जाएंगे। यही डर आज आईटी क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि कुछ ही सालों बाद आज की तकनीक बदल जाएगी। अगर कर्मी खुद को नहीं बदल पाए तो उनके हाथ से नौकरी फिसल जाएगी।

 

 

 

 

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