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तकनीकी शिक्षा की गिरती साख

कुछ समय पहले विद्यार्थी इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए कॉलेजों के पीछे भागते थे, लेकिन अब कॉलेज प्रवेश देने के लिए विद्यार्थियों के पीछे भागने लगे हैं।

Author नई दिल्ली | May 23, 2016 4:26 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

पूरे देश में कुकुरमुत्तों की तरह उगे निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों मे तकनीकी शिक्षा का बुरा हाल है। हाल ही में एक जांच में उत्तर प्रदेश के 608 इंजीनियिरिंग व मैनेजमेंट कॉलेजों में लगभग बीस हजार शिक्षक फर्जी पाए गए हैं। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय में लगभग इकतालीस हजार शिक्षण नियुक्त हैं। एक जांच में पता चला कि इनमें से लगभग बीस हजार शिक्षक फर्जी हैं। यह सही है कि विश्वविद्यालय इस दिशा में आवश्यक कदम उठा रहा है, लेकिन असली सवाल यह है कि तकनीकी शिक्षा की गिरती साख को बचाने के प्रयास क्यों नहीं हो रहे हैं। हमें रुक कर सोचना होगा कि इंजीनियर तैयार करने की हड़बड़ी में कहीं हम बेरोजगारी की समस्या को बढ़ा तो नहीं रहे हैं?

हालांकि अब इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम से विद्यार्थियों का मोहभंग होने लगा है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए संपन्न हुई राज्य प्रवेश परीक्षा में बीटेक पाठ्यक्रम के लिए 1.42 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए। यह आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले काफी कम है। साल-दर-साल इस परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों की संख्या कम होती जा रही है। पिछले दिनों अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीइ) के पास देश भर के अनेक तकनीकी शिक्षण संस्थानों ने आवेदन किया था कि उन्हें ये संस्थान बंद करने की इजाजत दी जाए।

उत्तर प्रदेश तो एक उदाहरण भर है, इस समय अनेक राज्यों में इन संस्थानों को प्रबंधन और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों के लिए छात्र नहीं मिल पा रहे हैं। इस समय देश में पैंतीस सौ से अधिक प्रबंधन संस्थान और चार हजार से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पिछले कुछ सालों से इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेंट कॉलेजों की सीटें नहीं भर रही हैं और ये संस्थान अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहे हैं। ऐसे में यह विचार करना जरूरी है कि इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेंट की डिग्रियों से छात्रों का मोहभंग क्यों हुआ है?

अगर प्रतियोगिता के माध्यम से इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त करने की बात छोड़ दें तो सन 2000 तक छात्र दक्षिण के निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों में इंजीनियरिंग पढ़ने जाते थे। उस समय इंजीनियरिंग में प्रवेश कराने वाले दलालों ने भारी मुनाफा कमाया। 1997 में दक्षिण की तर्ज पर ही देश के विभिन्न राज्यों में निजी इंजीनियरिंग कॉलेज खुलने शुरू हुए। हालांकि उस समय इनकी संख्या अधिक नहीं थी। सन 2001 के आसपास निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या बढ़ने लगी। 2006 से 2010 तक देश में कुकुरमुत्तों की तरह निजी इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेंट कॉलेज खुले। ये कॉलेज कब शिक्षा की दुकान बन गए पता ही नहीं चला। पहले से ही यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि अगर इन निजी कॉलेजों का पनपना इसी तरह जारी रहा तो भविष्य में इन कॉलेजों को छात्र मिलने मुश्किल हो जाएंगे। यह आशंका सही साबित हुई।

आज इन कॉलेजों को अपनी सीटें भरने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। छात्र न मिलने के कारण अनेक कॉलेज तो बंद होने के कगार पर हैं। छात्र न मिलने का एक बड़ा कारण जरूरत से ज्यादा कॉलेजों का खुलना तो है ही, इन डिग्रियों से मोहभंग के कुछ अन्य कारण भी हैं। अच्छी जगह से डिग्री लेने की चाहत और कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आज अभिभावकों और छात्रों को इंजीनियरिंग व मैनेजमेंट की डिग्री एक मजाक लगने लगी है। अधिकतर निजी कॉलेजों से ये डिग्रियां लेने के बाद छात्रों को नौकरी प्राप्त करने के लिए पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। किसी तरह नौकरी मिल भी जाती है तो वहां भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता है। लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी जब छात्रों को डिग्री के अनुसार वेतन नहीं मिलता, तो वे अपने आपको ठगा हुआ महसूस करते हैं। यही कारण है कि अभिभावकों और छात्रों का इन डिग्रियों से मोहभंग हुआ है और वे दूसरी डिग्रियों की तरफ रुख करने लगे हैं।

जब कुकुरमुत्तों की तरह कॉलेज खुलेंगे तो इन कॉलेजों को छात्र मिलने में दिक्कत होगी ही। दरअसल, इस दौर में शिक्षा की यह प्रक्रिया पूरी तरह से एक व्यवसाय में तब्दील हो चुकी है। इस व्यवसाय में सरकार, संबंधित विश्वविद्यालय और एआइसीटीइ, सभी शामिल हैं। ऐसी स्थिति में अभिभावकों और छात्रों की अपनी मजबूरियां हैं तो कॉलेजों के मालिकों की अपनी। इन कॉलेजों को आॅल इंडिया कौंसिल फॉर टेक्नीकल एजुकेशन यानी एआइसीटीइ नामक संस्था मान्यता देती है। साथ ही ये संबंधित प्राविधिक विश्विविद्यालयों से संबद्धता प्राप्त करते हैं। सवाल है कि इस सारे माहौल को देखते हुए भी ये दोनों संस्थाएं नए कॉलेजों पर मुहर क्यों लगा रही हैं?

पिछले दिनों एआइसीटीइ के भीतर भ्रष्टाचार होने की खबरें आई थीं। ऐसे में यह आशा कैसे की जा सकती है कि इंजीनियरिंग कॉलेजों का सही तरह से मूल्यांकन हो पाएगा? विडंबना यह है कि कई बार एआइसीटीइ से जुड़े कुछ लोग निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों के हितों के अनुरूप कार्य करते हैं तो कई बार इन कॉलेजों से पैसे उगाहने के लिए जान-बूझ कर उनमें कमियां निकाल दी जाती हैं।

अधिकतर राज्यों में यही हाल है। शिक्षा के निजीकरण ने सरकारी मशीनरी को खाने-कमाने की मशीन बना दिया है। इस मुद्दे पर सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कॉलेजों के मालिकों को तो सभी दोष दे देते हंै लेकिन सरकारी मशीनरी को कोई दोष नहीं देता है। सवाल है कि सरकार, प्राविधिक विश्वविद्यालय और एआइसीटीइ छात्रों को केवल डिग्रियां बांटना चाहते हैं या फिर उन्हें एक सफल इंजीनियर व प्रबंधक बनाना चाहते हैं? इन तीनों संस्थाओं के मौजूदा रवैये से तो यही लगता है कि हम डिग्रीधारी युवकों की एक फौज खड़ी करना चाहते हैं। नहीं तो क्या कारण है कि लगातार खुलते जा रहे निजी इंजीनियरिंग व प्रबंधन कॉलेजों पर रोक नहीं लगाई जा रही है। छा़़़त्र न मिलने के कारण जब ये कॉलेज बंद होना शुरू होंगे, शायद तभी हमारी आंखें खुलेंगी।

इंजीनियरिंग कॉलेजों के बीच प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई है कि अपने अस्तित्व के लिए इन्हें विज्ञापन के नए-नए तरीके खोजने पड़ रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व मैं उत्तर प्रदेश के एक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज के सामने से गुजरा। कॉलेज के बाहर भीड़ देख कर पता चला कि यहां इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश के लिए काउंसलिंग चल रही है। कॉलेज से कुछ दूरी पर मेले जैसा दृश्य था। इस मेले में अनेक निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों ने अपने स्टॉल लगाए हुए थे। कॉलेजों के प्रतिनिधि काउंसलिंग में आने वाले विद्यार्थियों को अपने-अपने कॉलेज की विशेषताएं बताते हुए उन्हें मनाने में लगे हुए थे।

प्रत्येक कॉलेज का प्रतिनिधि बढ़ा-चढ़ा कर अपने कॉलेज की विशेषताएं बता रहा था। अगर कोई विद्यार्थी उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में नहीं आता था तो उसे फीस कम करने का प्रलोभन दिया जाता था। अगर इस तरकीब से काम न चलता तो विद्यार्थियों को मुफ्त होस्टल जैसी सुविधा का प्रलोभन भी दिया जाता था। कुछ कॉलेज तो इक्कीस हजार में इंजीनियरिंग में प्रवेश पाएं जैसे विज्ञापनों के सहारे विद्यार्थियों को लुभाने में लगे थे। कुछ समय पहले विद्यार्थी इंजीनियरिंग में प्रवेश लेने के लिए कॉलेजों के पीछे भागते थे, लेकिन अब कॉलेज प्रवेश देने के लिए विद्यार्थियों के पीछे भागने लगे हैं। यह प्रतिस्पर्धा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए नहीं बल्कि विद्यार्थियों को हड़पने के लिए है। यह हाल केवल इंजीनियरिंग पाठयक्रमों का नहीं है; निजी क्षेत्र में खुले एमबीए और एमसीए जैसे अन्य पेशेवर पाठयक्रम भी इसी ढर्रे पर चल रहे हैं, जहां मुख्य मकसद मुनाफा बटोरना हो गया है।

निजी क्षेत्र में अधिक कॉलेज होने के फलस्वरूप विद्यार्थी न मिलने के कारण ये संस्थान अपने यहां पहले से अध्ययनरत विद्यार्थियों से ही सारा मुनाफा निकालने के चक्कर में रहते हैं। ऐसे में विद्यार्थियों का शोषण और बढ़ जाता है। अगर कोई विद्यार्थी किसी विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठता है तो इन पाठ्यक्रमों को संचालित करने वाले निजी कॉलेज ‘जुगाड़ संस्कृति’ के माध्यम से विश्वविद्यालय से विद्यार्थी का पता मालूम कर लेते हैं। और फिर शुरू होता है उस विद्यार्थी से संपर्क साधने का सिलसिला। विद्यार्थी से संपर्क साधने की इस मुहिम के तहत उसे प्रवेश देने के लिए प्रलोभनयुक्त पत्र भेजा जाता है, उसके मोबाइल पर एसएमएस भेजे जाते हैं और मोबाइल के जरिए विद्यार्थी से वार्तालाप भी किया जाता है। यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक कि विद्यार्थी झल्ला कर उसे परेशान न करने की चेतावनी न दे दे।

मुझे याद आ रहे हैं कुछ समय पहले के वे दिन, जब किसी कस्बे या शहर से इंजीनियरिंग में किसी विद्यार्थी का चयन हो जाता था तो उस कस्बे या शहर में हल्ला मच जाता था। ऐसे विद्यार्थियों को एक अलग ही सम्मान प्राप्त होता था। लेकिन निजीकरण के बाद इंजीनियरिंग जैसे पाठ्यक्रमों की साख को बट्टा लग गया है। हालांकि प्रथम श्रेणी के संस्थान अब भी अपनी प्रतिष्ठा बचाए हुए हैं लेकिन अधिकतर संस्थान सम्मानजनक स्थान बनाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं। दुख और आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे पाठ्यक्रमों के लिए लगभग सभी प्रकाशक कुंजी जैसी पुस्तकें प्रकाशित कर रहे हैं और अधिकतर विद्यार्थी इन्हीं पुस्तकों को पढ़ कर पाठ्यक्रम पूरा कर रहे हैं। इस वातावरण में शिक्षा की गुणवत्ता की तरफ किसी का ध्यान नहीं है।

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