ताज़ा खबर
 

राजनीति: अफगानिस्तान में गहराता संकट

अफगानिस्तान में लोकतंत्र को मजबूत करना बेहद जरूरी है, जबकि हकीकत यह है कि तालिबान पूरे देश में मध्ययुगीन धार्मिक और तानशाही शासन को स्थापित करना चाहता है। लोकतंत्र की स्थापना का सपना तालिबान के प्रभावी रहते कैसे साकार होगा, यह समस्या बरकरार है।

Author Published on: March 19, 2020 12:11 AM
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अब्दुल गनी और अन्य नेता (फाइल फोटो)

ब्रह्मदीप अलूने
मध्य एशिया और पश्चिम एशिया को भारतीय उपमहाद्वीप से जोड़ने वाले देश अफगानिस्तान में स्थिरता कायम करने की राजनीतिक कोशिशें अंतर्विरोधों के चलते एक बार फिर खटाई में पड़ गई हैं। दरअसल तालिबान की धमकियों से बेहाल अफगानिस्तान को अब समानांतर सरकार की नई चुनौती से जूझना पड़ रहा है। यह समूचा संकट न केवल अफगानिस्तान में शांति स्थापना की कोशिशों को खत्म कर सकता है, बल्कि तालिबान के सर्वोच्च सत्ता पर काबिज होने की आशंका भी सही साबित हो सकती है। हाल में अफगान राष्ट्रपति अब्दुल गनी के शपथग्रहण समारोह से कुछ ही दूरी पर उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने भी राष्ट्रपति पद की शपथ लेकर देश की सर्वोच्च सत्ता पर अपना दावा जताया है।

राष्ट्रपति अब्दुल गनी और अब्दुल्ला अब्दुल्ला दोनों ही अफगानिस्तान में बेहद प्रभावशाली नेता माने जाते हैं। पिछले साल 28 सितंबर को राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में इन दोनों उम्मीदवारों ने भाग्य आजमाया था। इन चुनावों में अफगानिस्तान के मौजूदा राष्ट्रपति अशरफ गनी को 50.64 फीसद मत मिले और उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला को 39.52 फीसद। अफगानिस्तान में सरकार बनाने के लिए प्रत्याशी को पचास फीसद से ज्यादा वोट हासिल करना जरूरी है, जबकि राष्ट्रपति अशरफ गनी ने 50.64 फीसद वोट हासिल कर मामूली अंतर से देश की सर्वोच्च सत्ता पर अपना दावा सुनिश्चित कर लिया। इसके बाद इन नतीजों को अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए चुनावी नतीजों को खारिज कर दिया था।

चुनावी नतीजों को लेकर ये दोनों नेता 2014 के चुनाव में भी आमने सामने थे। तब अशरफ गनी और अब्दुल्ला अब्दुल्ला दोनों ने धांधली के आरोप लगाए थे। उस दौरान अमेरिका के हस्तक्षेप के बाद दोनों को सत्ता में हिस्सेदारी मिली थी। अशरफ गनी राष्ट्रपति बने थे और अब्दुल्ला अब्दुल्ला को मुख्य कार्यकारी बनाया गया था। लेकिन इसके बाद से ही दोनों के रिश्तों में अनिश्चितता और अविश्वास गहराता गया, जिसके कारण अफगानिस्तान में शांति स्थापना की कोशिशें सिरे नहीं चढ़ पाईं। हालांकि पिछले साल हुए राष्ट्रपति चुनाव में मतदान भी सबसे कम हुआ था और महज 10.82 लाख मतों की ही गिनती हुई थी, करीब दस लाख मतों को अवैध बता दिया गया था।

अफगानिस्तान की कुल आबादी तीन करोड़ सत्तर लाख है और नब्बे लाख साठ हजार पंजीकृत मतदाता हैं। चुनाव के लिए चार हजार नौ सौ बयालीस मतदान केंद्र बनाए गए थे। कम मतदान की एक वजह असुरक्षा थी, तालिबान ने मतदान केंद्रों पर हमले की धमकी दी थी। देश के कई हिस्सों में अभी भी तालिबान का नियंत्रण है। तालिबान के कब्जे वाले क्षेत्रों में अफगानिस्तान की सरकार का या तो दखल नहीं है या फिर बेहद सीमित दखल है। इसलिए ऐसे इलाकों में मतदान होना आसान नहीं था।

अमेरिका अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया को लेकर लगातार कोशिशें तो कर रहा है, लेकिन उसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं है। इस साल कतर में अमेरिका और तालिबान के बीच हुआ शांति समझौता कितना कारगर होगा, इस पर भी अभी संदेह बना हुआ है। समझौते के अनुसार अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की समय सीमा तय की गई है, लेकिन इसे अफगानिस्तान में शांति स्थापना का अंतिम विकल्प भी नहीं माना जा सकता। अमेरिकी विदेश मंत्री तो यह साफ कर चुके हैं कि यह समझौता पूरी तरह से तभी लागू होगा, जब तालिबान शांति के लिए कदम उठाएगा।

इसके लिए तालिबान को आतंकी संगठन अलकायदा और दूसरे विदेशी आतंकी संगठनों से अपने सभी रिश्ते तोड़ने होंगे। यह समझौता इस क्षेत्र में एक प्रयोग है। वहीं, अफगानी राष्ट्रपति अब्दुल गनी तालिबान को लेकर अभी भी बेहद सख्त नजर आ रहे हैं। उन्होंने तालिबान के कुख्यात कैदियों को फिलहाल रिहा न करने का दृढ़ संकल्प दोहराया है।

तालिबान को लेकर अफगान सरकार की कठोर नीति के चलते देश में शांति स्थापित कैसे होगी, यह बड़ी चुनौती है। अमेरिकी सेना अपने सहयोगियों के साथ लगभग दो दशकों से अफगानिस्तान से तालिबान को जड़ से खत्म करने का प्रयास करती रही, लेकिन इसके बाद भी इस देश के एक तिहाई हिस्से से ज्यादा पर तालिबान का कब्जा है। तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है और इसके व्यापक प्रमाण भी मिले हैं। साल 2011 में भी अमेरिका ने गोपनीय दस्तावेजों में ग्वांतानामो बे के सात सौ कैदियों की पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कई संदर्भों का जिक्र किया था। इससे यह साफ हुआ था कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ अफगानिस्तान में अमेरिकी गठबंधन सेनाओं से लड़ रहे विद्रोहियों, यहां तक कि अलकायदा को समर्थन देती है और उन्हें संरक्षण प्रदान करती है।

यही नहीं, इन दस्तावेजों में आइएसआइ को आतंकवादी संगठन करार देते हुए माना है कि यह अलकायदा और तालिबान के समान ही एक चुनौती है। गौरतलब है कि अस्सी के दशक की शुरुआत में आइएसआइ ने पूरी दुनिया से जिहादियों को इकट्ठा करना, उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देना और अत्याधुनिक हथियारों से लैस कर अफगानिस्तान भेजने का सिलसिला शुरू किया था। बदलते दौर में भी यही भाड़े के जिहादी आज पूरे मुसलिम जगत, खासकर दक्षिण और मध्य एशिया में आतंकवादी गतिविधियों की कमान संभाले हुए हैं।

अफगानिस्तान में तालिबान के साथ ही एक बड़ी चुनौती कुख्यात आतंकी संगठन आइएसआइएस की भी है। इस्लामिक स्टेट ने अरब जगत से बाहर अपने पैर पसारने की कोशिशों के तहत बहुत कम समय में अफगानिस्तान के कम से कम पांच प्रांतों हेलमंद, जाबुल, फराह, लोगार और नंगरहार में अपनी मौजूदगी का अहसास कराया है। इस्लामिक स्टेट अफगान तालिबान लड़ाकों को खदेड़ना चाहता है और यह भी चाहता है कि तालिबान-अलकायदा गठबंधन में शामिल लड़ाके उसका हाथ थाम लें। लेकिन स्थानीय समर्थन और राजनीतिक बल हासिल करने की इस कवायद में इस्लामिक स्टेट को तालिबान से जबरदस्त संघर्ष करना पड़ रहा है।

अफगानिस्तान में शांति स्थापना के लिए तालिबान के साथ बातचीत की कोशिशों में रूस भी शामिल रहा है। अफगानिस्तान में रूस की बढ़ती भूमिका को लेकर अमेरिका आशंकित है और उसे यह मंजूर भी नहीं। इस बीच पाकिस्तान, चीन, ईरान और रूस के पनपते कूटनीतिक संबंधों को लेकर अमेरिका सावधान है, इसीलिए उसने अफगानिस्तान को लेकर मास्को द्वारा शुरू की गई शांति वार्ता में अपनी भागीदारी नहीं की थी। दूसरी ओर अमेरिका की अफगान नीति में भारत उसका प्रमुख भागीदार है, जो पाकिस्तान को हमेशा नागवार गुजरता है।

आतंकवाद से बेहाल अफगानिस्तान में बेरोजगारी लगभग पच्चीस फीसद है और लगभग पचपन फीसद अफगान गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं। स्पष्ट है कि अफगानिस्तान में विकास की वैश्विक कोशिशें धराशायी हो रही हैं और अस्थिरता बढ़ती जा रही है। इसके पहले 2012 में टोक्यो वार्ता के बाद अफगानिस्तान को व्यापक सहायता मिली। इस सहायता के कारण गृहयुद्ध से जूझते इस देश मे शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हुईं, बल्कि ढांचागत सुविधाओं का भी विकास हुआ। बेहतर सड़कों का जाल बिछाया गया और बिजली की व्यवस्था भी दुरुस्त की गई। भारत ने अफगानिस्तान के स्थायी विकास के लिए व्यापक अभियान चलाया और कृषि, उत्खनन, स्वास्थ्य क्षेत्र, प्रौद्योगिकी और प्रशिक्षण में व्यापक सहयोग किया। लेकिन राजनीतिक स्थिरता जब तक यहां कायम नहीं हो जाती, तब तक इस देश का विकास सुनिश्चित नहीं हो सकता।

अफगानिस्तान में लोकतंत्र को मजबूत करना बेहद जरूरी है, जबकि हकीकत यह है कि तालिबान पूरे देश में मध्ययुगीन धार्मिक और तानशाही शासन को स्थापित करना चाहता है। लोकतंत्र की स्थापना का सपना तालिबान के प्रभावी रहते कैसे साकार होगा, यह समस्या बरकरार है। तालिबान एक ऐसी अबूझ पहेली है, जिससे पार पाने में दुनिया की आधुनिकतम सेना अभी तक नाकाम रही है। ऐसे में अफगानिस्तान की सरकारी सेना तालिबान का सामना कैसे कर पाएगी, यह बड़ा सवाल है। बहरहाल दुनिया के हस्तक्षेप और महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के चलते बदहाल अफगानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता का बना रहना आतंकवाद को मजबूत कर सकता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App। जनसत्‍ता टेलीग्राम पर भी है, जुड़ने के ल‍िए क्‍ल‍िक करें।

Next Stories
1 राजनीति: ज्ञान-विज्ञान की जननी संस्कृत
2 राजनीति: विनाश से बचने के विकल्प हैं गांधी
3 राजनीति: कर सुधारों की चुनौती