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विवेक शुक्ला का लेख : ओलंपिक से पहले की कुश्ती

भारतीय कुश्ती संघ को लगता है कि सही तरह से फैसले करने नहीं आते। उसने अंत तक यह साफ नहीं किया कि रियो में चौहत्तर किलो भार वर्ग में बेजिंग ओलंपिक के कांस्य और लंदन ओलंपिक के रजत पदक विजेता सुशील कुमार जाएंगे या फिर नरसिंह यादव।
Author नई दिल्ली | June 9, 2016 03:03 am
वर्ष 2008 बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक और चार साल बाद लंदन खेलों में रजत पदक जीतने वाले सुशील कुमार।

सुशील कुमार लगातार दो ओलंपिक खेलों में क्रमश: कांस्य और सिल्वर मेडल जीत चुके थे। उम्मीद थी कि दिल्ली का यह बेहतरीन पहलवान इस बार रियो ओलंपिक खेलों में अपने पहले जीते हुए पदकों के रंग को बदलेगा। यानी देश को स्वर्ण पदक दिलाएगा। मगर अब वह सपना बिखर गया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने उसे महान खिलाड़ी बताते हुए भी उसकी नरसिंह यादव के साथ कुश्ती की मांग को खारिज कर दिया है। यानी अब रियो ओलंपिक खेलों के कुश्ती के चौहत्तर किलोग्राम वजन के मुकाबलों में भारत का महान खिलाड़ी भाग नहीं लेगा।

करीब तीन महीने पहले दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में लगभग एक हजार बैठकें मारने के बाद सुशील कुमार तौलिए से अपने शरीर से पसीना पोंछते हुए कह रहा था, ‘भाई साहब, रियो में गोल्ड मेडल किसी को लेने नहीं दूंगा। गोल्ड मुझे ही मिलेगा।’ वह विश्वास से लबरेज था। लेकिन अफसोस कि रियो ओलंपिक में भाग लिए बगैर ही उसके गोल्ड जीतने के इरादे को पटखनी दे दी गई।

सुशील कुमार कोई सामान्य खिलाड़ी नहीं है। उसे आप भारत के महानतम खिलाड़ियों में से एक मान सकते हैं। ओलंपिक खेलों की व्यक्तिगत स्पर्धाओं में दो पदक जीतने वाला सुशील कुमार इकलौता भारतीय खिलाड़ी है। ओलंपिक खेलों के कुश्ती मुकाबलों में सत्तर से ज्यादा देशों के पहलवान जोर आजमाइश करते हैं और वहां पर मेडल हासिल करना कोई बच्चों का खेल नहीं है।

सुशील कुमार एक छोटी-सी मांग तो कर रहा था कि उसके और नरसिंह यादव के बीच मुकाबला करवा दिया जाए। उसमें जो जीते, उसे ही रियो में भेज दिया जाए। क्या यह कोई बहुत बड़ी मांग थी? जो खिलाड़ी भारत को दो ओलंपिक खेलों में पदक जितवा चुका है, उसकी यह मांग क्या इतनी गैर-वाजिब मानी जा सकती है?

सुशील कुमार कहता रहा कि सरकार ने उसके प्रशिक्षण पर भारी-भरकम पैसा खर्च किया है और भारतीय कुश्ती महासंघ ने भी उसे अभ्यास जारी रखने के लिए कहा था। सुशील ने बार-बार यही कहा कि अगर कुश्ती संघ ने पहले ही फैसला कर लिया होता कि कोटा हासिल करने वाला खिलाड़ी ही रियो खेलों में जाएगा, तो कुश्ती संघ को उसे साफ-साफ बता देना चाहिए था। तब वह मान लेता कि उसके लिए रियो जाने की कोई संभावना नहीं है।

भारतीय कुश्ती संघ ने सुशील कुमार की नरसिंह के साथ दो-दो हाथ करने की मांग को नहीं माना। जरा अंदाजा लगाइए कि जिसने देश के लिए दो बार ओलंपिक पदक जीते, यह ठंडा व्यवहार उसके साथ हुआ। अगर संघ अपने पक्ष पर अडिग ही था तो उसने सुशील कुमार के प्रशिक्षण पर करोड़ों रुपए क्यों खर्च किए? इस सवाल का जवाब अब कभी नहीं मिलेगा।

बेशक, देश के लिए अफसोसनाक स्थिति है कि जब ओलंपिक खेलों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है तो भारत का स्वर्ण पदक का सबसे बड़ा दावेदार कोर्ट से लेकर प्रधानमंत्री के दरबार में न्याय की गुहार लगा रहा था। क्या सचिन तेंदुलकर या लिएंडर पेस के साथ उनके खेलों से जुड़े संघ इस तरह का व्यवहार कर सकते हैं? कतई नहीं। क्या सुशील कुमार किसी भी लिहाज से सचिन तेंदुलकर या पेस से कमतर खिलाड़ी है? नहीं। फिर उसके साथ नाइंसाफी क्यों? आप उसकी नरसिंह यादव से कुश्ती की मांग को तो मान सकते थे।

भारतीय कुश्ती संघ को लगता है कि सही तरह से फैसले करने नहीं आते। उसने अंत तक यह साफ नहीं किया कि रियो में चौहत्तर किलो भार वर्ग में बेजिंग ओलंपिक के कांस्य और लंदन ओलंपिक के रजत पदक विजेता सुशील कुमार जाएंगे या फिर नरसिंह यादव। और अंत में मामले का निपटान अदालत में जाकर ही हो पाया। हां, कोर्ट में कुश्ती महासंघ साफ तौर पर नरसिंह के साथ आ गया।

सुशील कुमार ने अपने हक के लिए हर चंद कोशिशें की। लेकिन उन्हें कहीं से लाभ नहीं हुआ। और आखिर में सुशील कुमार को दिल्ली हाईकोर्ट ने कह दिया कि वह भारतीय कुश्ती महासंघ के फैसले में दखल नहीं देगा। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि सुशील महान खिलाड़ी है, लेकिन महासंघ के इस तर्क को खारिज नहीं किया जा सकता कि नरसिंह यादव बेहतर फॉर्म में हैं और उन्हें ओलंपिक में भेजने का फैसला सही है।

सुशील कुमार बार-बार आरोप लगाते रहे कि नरसिंह यादव का चुनाव करने के लिए कुश्ती महासंघ ने उनके साथ भेदभाव किया। अदालत में कुश्ती महासंघ ने सुशील पर गंभीर आरोप लगाए। उसने कहा कि सुशील कुमार भारत सरकार के खर्चे पर जॉर्जिया गए थे प्रशिक्षण के लिए। लेकिन सुशील ने भारतीय खिलाड़ियों के साथ अभ्यास नहीं किया। वे वहां जॉर्जिया के खिलाड़ियों के साथ अभ्यास कर रहे थे जो नियमों के खिलाफ है। सुशील की तरफ से इस आरोप का कभी कोई जवाब नहीं मिला। अपने ऊपर लगने वाले तमाम आरोपों को झेलते हुए सुशील बार-बार कहते रहे कि ओलंपिक खेलों में उनके कामयाब होने की संभावना ज्यादा है। वे अकेले भारतीय रेसलर हैं, जिसने ओलंपिक खेलों में भारत के लिए दो पदक जीते हैं। नरसिंह के पास वह अनुभव नहीं है जो उनके पास है, इसलिए अगर रियो ओलंपिक में उन्हें भेजा जाता है तो भारत के जीतने की संभावना बढ़ जाएगी। पर कुश्ती महासंघ नरसिंह यादव के हक में खड़ा रहा। उसने कहा कि 2015 से सुशील कुमार ने किसी ट्रायल में भाग ही नहीं लिया। सुशील कुमार की तैयारी नरसिंह यादव से बेहतर नहीं है। नरसिंह यादव सितंबर, 2015 से तैयारी कर रहा है।

मूल रूप से हरियाणा का जिंदल साउथ वेस्ट कॉरपोरेट समूह नरसिंह यादव की ट्रेनिंग का खर्चा उठा रहा है। यादव ने पिछले साल लास वेगास में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता था और इसी के साथ उन्होंने रियो का टिकट कटवा लिया था। यादव शानदार पहलवान है। उसे बढ़िया कारीगर माना जाता है। पर यहां पर मामला कुश्ती से फैसले के इर्द-गिर्द घूम रहा था। बेशक कुश्ती हो जाती तो बात खत्म हो जाती। सारे विवाद पर विराम लग जाता। लेकिन चयन के नियमों में कुछ भी स्पष्ट दिशा-निर्देश न होने के कारण कुश्ती के संसार में कड़वाहट पैदा हो गई।

नरसिंह यादव कहते रहे कि रियो जाने का हक उनका है, क्योंकि उन्होंने ही चौहत्तर किलो ग्राम वर्ग के मुकाबलों के लिए क्वालिफाई किया है। इससे पहले भी वही खिलाड़ी ओलंपिक में जाते रहे हैं, जिन्होंने उसके लिए क्वालिफाई किया है। यादव के समर्थन में आगे आने वाले कह रहे थे कि सुशील कुमार ने छियासठ किलोग्राम भार वर्ग में पदक जीते हैं, जबकि चौहत्तर किलोग्राम भार वर्ग में यादव ने पदक जीते हैं, इसलिए वही सर्वश्रेष्ठ है। यादव के पक्ष में रखे जा रहे तर्क खारिज नहीं किए जा सकते थे। लेकिन क्या यादव की ओलंपिक खेलों में उपलब्धियां सुशील कुमार के बराबर हैं? कतई नहीं। वे भी सुशील कुमार को महान खिलाड़ी कह रहे हैं। तो फिर सुशील-नरसिंह के बीच मुकाबला किसने नहीं होने दिया?

दरअसल, इस सारे मसले पर भारतीय कुश्ती महासंघ की काहिली साफ दिख रही है। जब रियो के लिए यादव ने अपना टिकट कटवा लिया था तो उसने सारी स्थिति देश के सामने साफ क्यों नहीं की। नरसिंह यादव पिछले साल विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक के अलावा 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। उन्होंने साल 2014 के इंचियोन एशियाई खेलों में चौहत्तर किलोग्राम भार वर्ग में कांस्य पदक जीता था। सुशील कुमार कंधे की चोट के कारण उसमें भाग नहीं ले पाए थे।

सुशील कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में गुहार लगाई। हालांकि सुशील कुमार को भले ही कोई पहलवान मैट पर हरा न पाया हो, पर वह लचर व्यवस्था के आगे हार गया। उसे मोदी से मिलने तक का वक्त नहीं मिला। हालांकि मोदी ने क्रिकेटर हरभजन सिंह से उनकी शादी का कार्ड लेने के लिए वक्त निकाल लिया था, पर उनके पास भी सुशील के लिए वक्त नहीं था।

सुशील चाहें तो अब इस बात से संतोष कर सकते हैं कि कोर्ट ने कहा है कि सुशील कुमार भारतीय कुश्ती महासंघ के लिए सम्मानित व्यक्ति होने चाहिए। यानी उनकी क्षमताओं को लेकर कुश्ती महासंघ से लेकर कोर्ट ने कोई सवाल खड़े नहीं किए।

और इस विवाद में लगता है कुछ बिंदुओं के जवाब कभी नहीं मिल पाएंगे। जैसे कि सुशील कुमार कहते रहे कि वे नरसिंह यादव से रियो ओलंपिक में जाने से पहले एक मुकाबला चाहते हैं। उधर नरसिंह यादव और महासंघ ने कहा कि सुशील ने दो-तीन बार नरसिंह यादव से किसी भी तरह के मुकाबले को टाला है। जाहिर है, इस बारे में कभी तस्वीर साफ नहीं हो पाएगी।

सुशील को लेकर खतरे की घंटी तभी बज गई थी जब खेल मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने रियो ओलंपिक के चयन में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। उन्होंने साफ कह दिया था कि यह मसला महासंघ को सुलझाना है। महासंघ स्वायत्त संस्था है, वही अंतिम फैसला करे कि रियो सुशील जाएं या नरसिंह।

चलिए, अब सुशील कुमार तो रियो नहीं जाएंगे, तो माना जा सकता है कि वे भी बाकी देशवासियों की तरह नरसिंह यादव की रियो खेलो में सफलता की कामना करेंगे। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा भी है कि वे जब नरसिंह यादव से मिलेंगे तो उन्हें गले लगा लेंगे। उनके मन में नरसिंह को लेकर किसी तरह का नकारात्मक भाव नहीं है।

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