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राजनीति: मानसून और अर्थव्यवस्था

देश में मानसून अच्छा रहता है तो अर्थव्यवस्था अच्छी रहती है और कमजोर मानसून अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ा देता है। देश में आधे से ज्यादा खेती सिंचाई के लिए बारिश पर ही निर्भर होती है। चावल, मक्का, गन्ना, कपास और सोयाबीन जैसी फसलों के लिए बारिश बेहद जरूरी होती है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान करीब सत्रह फीसद है, लेकिन देश के साठ फीसद से ज्यादा लोग खेती पर आश्रित हैं।

Author Published on: July 13, 2020 4:43 AM
खेत में बुवाई करते किसान।

जयंतीलाल भंडारी
कोविड-19 की चुनौतियों के बीच देश की अर्थव्यवस्था में सुधार से संबंधित जो अध्ययन रिपोर्टों और सर्वेक्षणों के नतीजों में मोटे तौर पर दो बातें उभर कर आई हैं। एक, अप्रैल और मई 2020 में पूर्णबंदी के कारण उद्योग-कारोबार ठप होने से अर्थव्यवस्था में तेज गिरावट आई है। और दूसरा यह है कि जून में उद्योग-धंधों के फिर से शुरू होने से सुधार के संकेत मिलने लगे हैं और सुधार की यह प्रवृत्ति आगे बनी रहेगी।

हाल ही में उद्योग संगठन फिक्की के सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि पूर्णबंदी हटाने के पहले चरण की घोषणा के बाद करीब सत्तावन फीसद उद्योग-कारोबार पचास फीसद या इससे अधिक क्षमता से काम कर रहे हैं और अब इस क्षमता में इजाफा हो सकेगा। सर्वेक्षण में यह बात भी सामने आई है कि उद्योग-कारोबार क्षमता में वृद्धि हेतु आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घोषित योजनाओं के कारगर क्रियान्वयन की अपेक्षा रखते हैं।

यदि हम देश की अर्थव्यवस्था में सुधार आने के संकेतों की ओर देखें, तो पाते हैं कि अप्रैल-मई 2020 की तुलना में जून 2020 में बिजली की मांग और रेल माल ढुलाई में तेजी से सुधार हुआ है। आठ बुनियादी उद्योगों के सूचकांक के आंकड़ों से भी सुधार दिखा है। आईएचएस मार्केट इंडिया मैन्युफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) का परिदृश्य बताता है कि जून 2020 में यह संकेतक 47.2 पर रहा, जबकि मई में यह 30.8 और अप्रैल में 27.4 था।

हालांकि इससे तेजी से उत्पादन विस्तार के संकेत नहीं मिलते हैं, लेकिन सुधार की स्थिति का संकेत जरूर मिलता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत में पीएमआई में सुधार कई देशों की तुलना में बेहतर है। इसी तरह वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह अप्रैल 2020 में महज बत्तीस हजार करोड़ रुपए था, जो मई में बढ़ कर बासठ हजार करोड़ और अब जून में और सुधर कर नब्बे हजार करोड़ रुपए के स्तर को पार कर गया है।

शहरी अर्थव्यवस्था की तुलना में देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार ज्यादा तेजी से हो रहा है। इसकी वजह कृषि है। देश में रबी की बंपर पैदावार के बाद फसलों के लिए किसानों को लाभप्रद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिला है। सरकार द्वारा किसानों को दी गई पीएम किसान सम्मान निधि, गरीबों के जनधन खातों में नकदी डालने जैसे कदमों से किसानों के पास पैसा पहुंचा है। इसका परिणाम ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग प्रवृत्ति बढ़ने के रूप में सामने आया है। ग्रामीण क्षेत्रों में उर्वरक, बीज, कृषि रसायन, ट्रैक्टर एवं कृषि उपकरण जैसी कृषि क्षेत्र से जुड़ी हुई वस्तुओं के साथ-साथ उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में भी तेजी से वृद्धि दिखाई दे रही है।

यदि हम आंकड़ों की भाषा में बात करें तो मार्च 2020 में पूर्णबंदी के बाद से जून अंत तक किसानों के पास करीब 1.33 लाख करोड़ रुपए पहुंच चुके हैं। इसी अवधि में मनरेगा के तहत करीब 17, 600 करोड़ रुपए का भुगतान हो चुका है। लेखा महानियंत्रक (सीजीए) के मुताबिक अप्रैल-मई 2020 के दौरान कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय का संयुक्त व्यय 91,355 करोड़ रुपए रहा, जो अप्रैल-मई 2019 की अवधि के दौरान 44,054 करोड़ रुपए ही था। निसंदेह ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधार की डगर पर आगे बढ़ी हैं।

इसके अलावा इस बार मानसून अच्छा रहने की संकेत हैं। भारतीय मौसम विभाग और अन्य वैश्विक मौसम एजेंसियों के द्वारा वर्ष 2020 में बहुत अच्छे मानसून के अनुमान देते हुए कहा है कि मानसून के महीनों में देश में छियानवे से सौ फीसद के बीच बारिश हो सकती है। इससे कृषि क्षेत्र में पैदावर अच्छी रहेगी और अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिलेगा।

हमारे देश में अच्छा मानसून आर्थिक-सामाजिक खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। देश में मानसून अच्छा रहता है तो अर्थव्यवस्था अच्छी रहती है और कमजोर मानसून अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ा देता है। देश में आधे से ज्यादा खेती सिंचाई के लिए बारिश पर ही निर्भर होती है।

चावल, मक्का, गन्ना, कपास और सोयाबीन जैसी फसलों के लिए बारिश बेहद जरूरी होती है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान करीब सत्रह फीसद है, लेकिन देश के साठ फीसद से ज्यादा लोग खेती पर आश्रित हैं। खेती ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है और इसमें कृषि की हिस्सेदारी करीब पचास फीसद है।

अच्छे मानसून और कोविड-19 के बीच किसानों और ग्रामीण भारत के लिए दिए गए आर्थिक प्रोत्साहनों के साथ-साथ खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) किसानों के लिए लाभप्रद होंगे। पिछले दिनों सरकार ने सत्रह खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में दो से साढ़े सात फीसद के दायरे में बढ़ोतरी की घोषणा की है।

खासतौर से खरीफ की मुख्य फसल धान के लिए 2.89 से 2.92 फीसद, दलहनों के लिए 2.07 से 5.26 फीसद और बाजरे के लिए 7.5 फीसद एमएसपी में बढ़ोतरी की गई है। नई एमएसपी बढ़ोतरी में किसानों को फसल लागत से पचास फीसद अधिक दाम देने की नीति का पालन किया गया है। नई कीमतें उत्पादन लागत से पचास से तिरासी फीसद अधिक होंगी।

ऐसे में अर्थव्यवस्था की खुशहाली के लिए अच्छे मानसून का लाभ लेने के साथ-साथ कई बातों पर विशेष ध्यान देना होगा। सरकार द्वारा कृषि उपज का अच्छा विपणन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इससे ग्रामीण इलाकों में मांग में वृद्धि की जा सकेगी। ग्रामीण मांग बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में तेजी आएगी। किसानों को खरीफ सीजन के लिए मद्देनजर कृषि उत्पादन के लिए जरूरी सामान खरीदने के लिए पर्याप्त नकदी उपलब्ध करानी होगी।

पीएम गरीब कल्याण रोजगार अभियान के माध्यम से गांवों में लौटे श्रमिकों के लिए रोजगार मुहैया कराने के लिए अतिरिक्त कोष का आबंटन किया जाना होगा। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत उन्नत कृषि, शीत भंडार गृह, पशुपालन, डेयरी उत्पादन और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों से संबंधित जो घोषणाएं की हैं, उन्हें जल्द ही कारगर तरीके से लागू किया जाना चाहिए। खासतौर से देश में पहली बार कृषि सुधार के जो तीन ऐतिहासिक निर्णय लिए गए हैं, उनके क्रियान्वयन को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

गौरतलब है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन करने के फैसले से अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज की कीमतें प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति को छोड़ कर भंडारण सीमा से स्वतंत्र हो जाएंगी। ऐसे में जब किसान अपने छोटे-छोटे खेतों से निकली फसल को तकनीक व वितरण नेटवर्क के सहारे देश और दुनिया भर में कहीं भी बेचने की स्थिति में होंगे, तो इससे उन्हें उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा।

कृषि सुधार का एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि जहां एक ओर बंपर फसल होने पर भी फसल की बबार्दी या फसल की कम कीमत मिलने की आशंका नहीं होगी, वहीं दूसरी ओर फसल के निर्यात की संभावना भी बढ़ेगी। इसी तरह किसानों को अनुबंध पर खेती की अनुमति मिलने से किसान बड़े खुदरा कारोबारियों, थोक विक्रेताओं और निर्यातकों के साथ समन्वय करके अधिकतम और लाभप्रद फसल उत्पादित करते हुए दिखाई दे सकेंगे।

यह उम्मीद की जानी चाहिए कि इस साल अच्छे मानसून और कोविड-19 के बीच सरकार ने अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत जो कदम उठाए हैं, वे अर्थव्यवस्था को गति देने में कारगर साबित होंगे। बस जरूरत इस बात की कि प्राथमिकताओं के साथ इन पर ईमानदारी से अमल हो।

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