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राजनीति: इनकी सुध कौन लेगा

देह व्यापार एक सामाजिक व्याधि है, जिसका दोषी यौनकर्मी महिलाओं को ही ठहराना पूर्णतया अनुचित है। यह क्रय और विक्रय की वह प्रक्रिया है, जिसमें पुरुषों की भी समान भूमिका होती है। तो फिर यह घृणा सिर्फ स्त्री के हिस्से क्यों। अगर सामाजिक व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति को जीविकोपार्जन के संसाधन उपलब्ध कराने में सफल हो, तो क्यों महिलाएं अपने देह का व्यापार करेंगी।

समाज की हर सुविधा से वंचित वर्ग की सुध सु्प्रीम कोर्ट ने ली।

दुनिया के तमाम बड़े देशों के नेता आर्थिक मंदी की बात कर रहे हैं। देश का हर तबका इसकी चपेट में आ रहा है और विश्व भर की सरकारें अपने नागरिकों को इससे उबारने में सहायता भी कर रहीं हैं। आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आर्थिक सहायता से लेकर राशन तक उपलब्ध कराने के प्रयास हो रहे हैं। पर भारत ही नहीं, विश्व के अनेक देशों में एक वर्ग ऐसा भी है, जिसके प्रति किसी की सहानुभूति नहीं है।

उस वर्ग की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि उसके पास अपनी पहचान का सबूत नहीं है। मानवाधिकारों की बात करने वाले भी उनकी चर्चा करने से हिचकते हैं। पर राहत का विषय है कि देश की उच्चतम अदालत ने उनकी पीड़ा को समझा है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि पहचान प्रमाण-पत्र पर जोर दिए बगैर यौनकर्मियों को मासिक सूखा राशन वितरण और नकद हस्तांतरण किया जाए। न्यायालय ने यह आदेश एक जनहित याचिका पर दिया, जिसमें महामारी के कारण यौनकर्मियों को हो रही
कठिनाइयों को उजागर किया गया था।

आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और तेलंगाना में 1.2 लाख यौनकर्मियों के बीच किए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि महामारी की वजह से इनमें से छियानबे प्रतिशत अपनी आमदनी का जरिया खो चुकी हैं। बड़ी संख्या में यौनकर्मियों को आधार और राशन कार्ड जैसे पहचान-पत्र न होने के कारण राहत कार्यक्रमों से बाहर रखा गया है। इन्हें पहचान दस्तावेज उपलब्ध कराना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। यह कोताही उस आदेश की अवहेलना है, जो उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को पहले दिया था।

यौनकर्मियों के पुनर्वास और सशक्तिकरण की जांच करते हुए अदालत ने 2011 में नियुक्त पैनल की सिफारिशों के आधार पर सरकार को आदेश दिया था कि वे यौनकर्मियों को राशन कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र और बैंक खातों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करें। भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन का अनुमान है कि देश में लगभग नौ लाख से अधिक यौनकर्मी हैं।

इस व्यवसाय में संलग्न अधिकांश महिलाएं वे हैं, जिन्हें समाज की विपरीत परिस्थितियों ने इस दलदल में धकेला है, बावजूद इसके उनकी पीड़ा को समझने के बजाय हम उन्हें ही दोषी मानते हैं। हैरानी की बात है कि जिस व्यवसाय को इतनी घृणा से देखा जाता है उसे समाप्त करने के प्रयास शून्य हैं, क्योंकि इसमें यौनकर्मियों से कहीं अधिक लिप्तता उन लोगों की है, जो मानव तस्करी के ठेकेदार हैं।

देह व्यापार का मकड़जाल इतना गहरा है कि वास्तविक गुनहगार, जो मानव तस्करी कर महिलाओं को इस ओर धकेल देते हैं, वे मुक्त वातावरण में सांस लेते हैं, पर यौनकर्मी नारकीय जीवन जीने को विवश होती हैं। कलंक और घृणा के बीच उनका जीवन मुक्ति की राह चाह कर भी नहीं ढूंढ़ पाता है। ये महिलाएं आम महिलाओं की भांति अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं कर पातीं, क्योंकि उनके भीतर यह भय सदा व्याप्त रहता है कि उनकी पहचान जाहिर न हो। क्या समाज की नैतिकता का ह्रास देह व्यापार के फलने-फूलने का कारण नहीं है?

भारत ही नहीं, विश्व के तमाम देशों में यौनकर्मियों को लेकर संकीर्ण मानसिकता व्याप्त है। उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देश भी इनके अधिकारों के संरक्षण के प्रति निराशाजनक रवैया रखते हैं। अमेरिका ने आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को मदद पहुंचाने के लिए मदद की पेशकश की है, जिसमें वे लोग ऋण ले सकते हैं जो छोटे-मोटे कारोबार में संलग्न हैं, पर इसमें वह तबका शामिल नहीं है, जिन्हें कथित सभ्य समाज यौनकर्मी कहता है। हफ पोस्ट के मुताबिक अमेरिकी सरकार यौन व्यवसाय से जुड़े किसी भी व्यक्ति को कोई ऋण नहीं देगी।

ब्रिटेन में यौन कर्मियों ने सरकार से आर्थिक सहायता की मांग की, क्योंकि अधिकतर यौनकर्मी महिलाएं एकल माएं भी हैं और आर्थिक मंदी के इस दौर में प्रश्न सिर्फ उनके नहीं, उनके बच्चों के जीवन का भी है। लंदन में इंग्लिश कलेक्टिव आॅफ प्रॉस्टिट्यूट ने हजारों यौनकर्मियों को कर्मचारियों की तरह फायदा देने की मांग की है, पर क्या यह संभव है। प्रश्न है कि जो लोग इस क्षेत्र से जुड़े हैं अब उनकी मदद कौन करेगा।

देह व्यापार की समस्या दुनिया भर में एक जैसी है। बांग्लादेश में यों तो इस व्यवसाय को कानूनी मान्यता है, पर वहां भी उनकी स्थिति खराब हैं। द गार्डियन में पिछले दिनों प्रकाशित एक लेख में कहा गया कि लॉकडाउन की वजह से बांग्लादेश में एक लाख से ज्यादा महिलाएं बेघर हो गईं और भुखमरी के कगार पर पहुंच गईं। वहां की सरकार ने इनके लिए योजना बनाई है, पर वास्तविकता यह है कि वह इन महिलाओं तक पहुंच नहीं पा रही। सवाल है कि क्या वे हमारी दुनिया का हिस्सा नहीं हैं, क्या देह व्यापार में उतर जाने के बाद उनका मानवीय हक छीन लिया जाना ही सभ्य समाज का अधिकार है।

2010 में यौनकर्मियों की स्थिति सुधारने संबंधी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1976 में संशोधन की सिफारिशें देने के लिए एक समिति गठित की थी, ताकि यौनकर्मी संविधान के अनुच्छेद 21 के प्रावधानों के तहत गरिमा के साथ जीवन यापन कर सकें। गरिमा के साथ जीवन जीना तो दूर, महिला यौनकर्मी अपने रोजमर्रा के जीवन के संघर्ष को ही नियति मान चुकी हैं।

पर इस निराशा भरे वातावरण में एक राहत की बात यह है कि मुंबई के कमाठीपुरा इलाके में रहने वाली यौनकर्मियों की बदतर स्थिति को न केवल समझा गया, बल्कि मानवोचित दृष्टिकोण रखते हुए महिला और बाल विकास के प्रभारी ने जुलाई माह में एक पत्र लिखकर कहा कि इन महिलाओं को कोविड-19 के दौरान आवश्यक सेवा मुहैया कराई जाए। पत्र में यह भी उल्लेख था कि लॉकडाउन की वजह से उन्हें काम भी नहीं मिल रहा, जिससे उनके और उनके परिवार वालों के सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है, उनके लिए जिंदा रहना मुश्किल होता जा रहा है। यह पत्र स्वयं में अलग इसलिए है कि शायद पहली बार किसी ने उनके कामों को मान्यता दी है और साथ ही उनके प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण रखा है।

हैरानी की बात है कि ‘मॉडलिंग द इफेक्ट आफ इंस्टीट्यूट क्लोजर आफ रेड लाइट एरियाज आन कोविड-19 ट्रांसमिशन इन इंडिया’ अध्ययन में यह तो इंगित किया गया कि राष्ट्रव्यापी बंद के बाद भी अगर रेड लाइट एरिया को बंद रखा जाता है, तो भारतीयों को कोरोना वायरस होने का कम जोखिम रहेगा, पर किसी भी संस्था ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि इन क्षेत्रों में संलग्न महिलाएं अपना जीवन यापन कैसे करेंगीं?

देह व्यापार एक सामाजिक व्याधि है, जिसका दोषी यौनकर्मी महिलाओं को ही ठहराना पूर्णतया अनुचित है। यह क्रय और विक्रय की वह प्रक्रिया है, जिसमें पुरुषों की भी समान भूमिका होती है। तो फिर यह घृणा सिर्फ स्त्री के हिस्से क्यों। अगर सामाजिक व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति को जीविकोपार्जन के संसाधन उपलब्ध कराने में सफल हो, तो क्यों महिलाएं अपने देह का व्यापार करेंगी। पर समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि वह समस्त समस्याओं का जिम्मेदार उसे ठहराता है, जो सबसे कमजोर हो और कमजोर की विवशता यह है कि वह चाह कर भी प्रतिकार नहीं कर पाता, क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज उससे उसके जीवन जीने का अधिकार भी छीन सकता है। मानवीय दृष्टिकोण रखने वाली हर सरकार का प्रथम दायित्व है कि वह समाज में सबसे तिरस्कृत वर्ग को आश्रय दे और सम्मानित जीवन की राह पर लौटने का मार्ग प्रशस्त करे।

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