X

राजनीतिः फिर उठी खालिस्तान की चिंगारी

कनाडा भी पृथकतावादी खालिस्तान नेताओं और समर्थकों के लिए लंबे समय से सुरक्षित ठिकाना रहा है। यह देश विदेशी अल्पसंख्यकों की पहली पसंद है और इसे सिखों का दूसरा घर भी कहा जाता है। भारत में सिख आबादी दो करोड़ से ज्यादा है और इसके बाद सबसे ज्यादा तकरीबन तेरह लाख सिख कनाडा में ही रहते हैं। सिखों के बीच अपनी पैठ और स्वीकार्यता बनाए रखने के लिए खालिस्तान समर्थक नेता युवाओं को उन्माद की ओर धकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं।

ब्रह्मदीप अलूने

आतंकवाद और अलगाववाद को जिंदा बनाए रखने के लिए कुछ आधार, विचारधारा और कुछ काल्पनिक लक्ष्य जरूरी होते हैं, जिनके जरिए समाज के कुछ लोगों को दिग्भ्रमित किया जा सके और उनमें उन्माद पैदा कर उन्हें हिंसा की आग में धकेला जा सके। दरअसल, खालिस्तानी चरमपंथी भारत से भले ही खदेड़ दिए गए हों, लेकिन उनकी अलगाववादी सोच या विचारधारा कमजोर नहीं पड़ी है, ऐसा लगता है। दुनिया के कई देशों में भारत विरोध और खालिस्तान के समर्थन में चुनिंदा समूहों की लामबंदी बदस्तूर जारी है। इस विरोध में वैचारिक अलगाव है, भारतीय एकता और अखंडता को प्रभावित करने के वैश्विक सरोकार भी हैं, वैश्विक आतंकी संगठनों के साझा प्रयास भी हैं, धार्मिक अलगाव को बढ़ावा देने की कोशिशें भी हैं और राजनीतिक स्वीकार्यता बनाए रखने की कुत्सित प्रतिबद्धता भी इसमें साफ झलक रही है।

पिछले दिनों अमेरिका के कैलिफोर्निया के एक गुरद्वारे में खालिस्तान समर्थकों ने दिल्ली सिख गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्य मंजीत सिंह जीके के साथ बदसलूकी की थी और उनके मुंह पर कालिख पोत दी थी। अमेरिका और ब्रिटेन में सिख समुदाय की बड़ी आबादी है और यह समुदाय व्यावसायिक पहचान बनाने में भी कामयाब रहा है। खालिस्तान समर्थक सिख समुदाय के युवाओं में भारत विरोध का जहर घोलने के लिए कुप्रचार करते रहते हैं। उनकी ताजा कोशिशों को इसी रूप में देखा जा सकता है। अलग खालिस्तान राष्ट्र की मांग को लेकर पृथकतावादी अमेरिका और कनाडा से भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देते रहे हैं। यह कई दशकों से बदस्तूर जारी है। साल 2002 में कौंसिल ऑफ खालिस्तान के स्वयंभू राष्ट्रपति गुरमीत सिंह औलख ने वाशिंगटन में पृथकतावादियों की एक बैठक कर पंजाब में आतंकवाद की हिमायत की थी। कई आतंकी सरगनाओं के बीच औलख ने सिख, मुसलमान और ईसाई युवाओं से हिंदुओं के खिलाफ हथियार उठाने का आह्वान किया था और निकट भविष्य में खालिस्तान की योजना साकार करने का दावा भी किया था।

कनाडा भी पृथकतावादी खालिस्तान नेताओं और समर्थकों के लिए लंबे समय से सुरक्षित ठिकाना रहा है। यह देश विदेशी अल्पसंख्यकों की पहली पसंद है और इसे सिखों का दूसरा घर भी कहा जाता है। भारत में सिख आबादी दो करोड़ से ज्यादा है और इसके बाद सबसे ज्यादा तकरीबन तेरह लाख सिख कनाडा में ही रहते हैं। सिखों के बीच अपनी पैठ और स्वीकार्यता बनाए रखने के लिए खालिस्तान समर्थक नेता युवाओं को उन्माद की ओर धकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं। इस समय कनाडा में लिबरल पार्टी की सत्ता है और देश के रक्षा मंत्री हरजीत सज्जन हैं। उनके पिता खालिस्तान के कथित समर्थक वर्ल्ड सिख ऑर्गनाइजेशन के सदस्य थे।

भारत में अस्सी-नब्बे के दशक में खालिस्तान की मांग को लेकर हिंसक आतंकी दौर चला था और इसका नतीजा राष्ट्रीय अलगाव और धार्मिक विद्वेष के रूप में देखने को मिला। भारत की एकता और अखंडता को प्रभावित करने के लिए पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान ने इसे न सिर्फ खूब हवा दी, बल्कि सारी ताकत भी लगाई। लगभग दो दशकों तक पाकिस्तान पंजाब को खालिस्तान के नाम पर आतंक की आग में झोंकने में लगा रहा, लेकिन भारत को तोड़ने का उसका ख्वाब परवान नहीं चढ़ सका। इस समय पंजाब देश के संपन्न और शांत राज्यों में है। लेकिन दूसरी ओर पंजाब में अशांति फैलाने की कोशिशों को लेकर पाकिस्तान की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है।

पाकिस्तान आतंकवाद फैलाने के लिए अपनी जमीन का बेजा इस्तेमाल करने से कभी परहेज नहीं करता। वह विदेशों में रहने वाले खालिस्तान समर्थकों को भारत विरोध के लिए उकसाने की नीति पर चलता रहा है। लाहौर में सिख अतिवादी संगठन ‘बब्बर खालसा इंटरनेशनल’ का सरगना वधवा सिंह बब्बर लंबे समय तक पाकिस्तान की खुफियां एजंसी आइएसआइ की सरपरस्ती में रहा था। इस दौरान उसने लश्कर-ए-तैयबा के साथ मिल कर सिख आतंकवाद को फिर से जिंदा करने की कोशिशें भी की। पाकिस्तान में सिख अतिवादियों को जेहादी भाई कहा जाता है और उन्हें तमाम सुख-सुविधाओं के साथ पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों, आइएसआइ और कुख्यात आतंकी संगठन के आकाओं से मिलने की खुली छूट भी मिली होती है। आइएसआइ खालिस्तान के नाम पर सिख युवाओं को भड़का कर स्लीपर सेल बनाने को आमादा है। इंटरनेट पर सिख आतंकवादियों की शहादत जैसा महिमामंडन और एनजीओ द्वारा पैसा भेज कर आइएसआइ खालिस्तान के दानव को पुन: जीवित करना चाहती है।

पाकिस्तानी प्रभाव से दिग्भ्रमित खालिस्तान के चरमपंथी दुनिया भर में सिख होमलैंड के पक्ष में प्रदर्शन करते रहे हैं। कनाडा में काम करने वाली पृथकतावादी ताकतें ऐसे प्रयास कर रही हैं कि वे 2020 तक कनाडा में खालिस्तान समर्थन सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र पंजाब के पक्ष में एक जनमत संग्रह कराएं। भारत के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दुनिया भर में भारतीय समुदाय अपनी आजादी का जश्न उत्साहपूर्वक मनाते हैं। लेकिन दूसरी ओर, खालिस्तानी समर्थक इस मौके पर भारत विरोध का झंडा बुलंद करते हैं। इस बार लंदन में भी खालिस्तान समर्थकों ने जनमत संग्रह के लिए प्रदर्शन किए। खालिस्तान समर्थकों ने ‘2020 के जनमत संग्रह के लिए लंदन घोषणापत्र’ को लेकर एक रैली की और भारत विरोधी नारे भी लगाए। इस प्रकार खालिस्तान समर्थक गुट- सिख फॉर जस्टिस विदेशी धरती पर गैर-लोकतांत्रिक तरीके से जनमतसंग्रह की मांग कर भारत की एकता और अखंडता को लगातार चुनौती दे रहा है।

कनाडा में तो चरमपंथी सत्ता पर भी हावी हैं। इस साल कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो की भारत यात्रा पर भी खालिस्तान का साया मंडराता रहा। कनाडा में खालिस्तान के समर्थकों को गले लगाने के लिए बदनाम ट्रुडो भारत में भी अपने दामन को बचा नहीं पाए थे। भारत यात्रा के दौरान रात्रि भोज की उनकी सूची में सिख अलगाववादी नेता जसपाल अटवाल का नाम आने से भारत ने कड़ा विरोध जताया था। ट्रुडो पर ऐसे भी आरोप हैं कि उन्होंने कनाडा में आयोजित ‘खालसा डे परेड’ में हिस्सा लिया था। इस परेड में ऑपरेशन ब्लू स्टार में मारे गए जरनैल सिंह भिंडरांवाले को एक नायक की तरह दिखाया गया था।

भारत में खालिस्तान आंदोलन भले ही अब शांत हो, लेकिन अमेरिका, कनाडा सहित यूरोप के कुछ देशों में इसकी आग अभी बुझी नहीं है और यही भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। भारत की बड़ी सिख आबादी के कनाडा में रहने से यह आंदोलन अपने प्रारंभिक दौर से कनाडा में भी प्रभावी रहा और इस देश में सिखों के हथियारबंद गिरोह की शुरुआत 1981 में हुई थी। कनाडा के सिख खालिस्तानी आतंकवादी गुट बब्बर खालसा इंटरनेशनल को 1985 में एअर इंडिया के विमान में विस्फोट सहित भारत में हुए कुछ बड़े आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार माना जाता है। कनिष्क विमान हमले में 329 लोग मारे गए थे। उसके बाद इस संगठन ने पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या समेत कई राजनेताओं और निर्दोष लोगों को निशाना बनाया। इसके समर्थक उत्तरी अमेरिका, यूरोप, दक्षिण एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक फैले हैं।

वर्ष 1999 में संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवाद पर हुई चर्चा के बाद यह घोषणा की थी कि वह किसी भी राष्ट्र में आतंक फैलाने के लिए वर्ग विशेष व विशेष व्यक्ति के विरुद्ध राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करने के मकसद से फैलाई जाने वाली हिंसा को आतंकवाद की श्रेणी में रखता है, भले ही उसे राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, जातिगत या अन्य किसी भी आधार पर तार्किक ठहराने की कोशिश क्यों न की जाए। संयुक्त राष्ट्र की इस घोषणा के मुताबिक ही खालिस्तान समर्थकों पर कार्रवाई हो, भारत सरकार को संबंधित देशों पर इसके लिए दबाव बनाना चाहिए। इसके साथ ही खालिस्तान समर्थकों को लेकर वीजा नीति में सख्ती लागू करने की दिशा में भी विदेश मंत्रालय को विचार करने की जरूरत है, तभी हम पृथकतावादी ताकतों को पंजाब से दूर रख पाएंगे।

Outbrain
Show comments