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धुंधली पड़तीं शांति की उम्मीदें

आने वाले वर्षों में भी अफगानिस्तान को संघर्ष के दौर से गुजरना होगा। अफगान शांति वार्ता में शामिल पक्षों के अपने-अपने हित हैं। अमेरिका, चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान जैसे देशों के हित अफगानिस्तान में हैं। ऐसे में कौन अफगानिस्तान को छोड़ना चाहेगा?

Talibanकतर की राजधानी दोहा में तालिबान के साथ चल रही शांति वार्ता की सफलता संदेह के घेरे में। फाइल फोटो।

कतर की राजधानी दोहा में तालिबान के साथ चल रही शांति वार्ता की सफलता संदेह के घेरे में है। इस बात की उम्मीद कम ही है कि वार्ता किसी नए मुकाम पर पहुंचेगी और शांति का रास्ता बनेगा। इस साल फरवरी महीने में ही तालिबान के हमले में ढाई सौ से ज्यादा अफगान सैनिकों और सत्तर नागरिकों की मौत हो चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन अफगानिस्तान की जमीनी स्थिति का जायजा ले रहे है।

निश्चित तौर पर ट्रंप प्रशासन की अफगान नीति में बदलाव लाने की संभावना है। ऐसा इसलिए भी है कि लंबे समय से अमेरिका अपने को अफगानिस्तान में फंसा हुआ पा रहा है। बाइडेन प्रशासन तालिबान और अमेरिकी प्रशासन के बीच हुए अफगानिस्तान शांति समझौते पर पुनर्विचार भी कर सकता है। तालिबान के साथ हुए शांति समझौते को लेकर बाइडेन को कोई खास उम्मीदें नजर नहीं आ रहीं। मुश्किल यह भी है कि शांतिवार्ता में शामिल दोनों पक्षों के बीच भारी अविश्वास बना हुआ है।

बाइडेन प्रशासन ने संकेत दे दिए हैं कि इस साल मई के बाद भी अफगानिस्तान में अमेरिकी फौज की मौजूदगी रहेगी। ट्रंप प्रशासन और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते के वक्त वादा किया गया था कि मई 2021 तक पूरी तरह से अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान छोड़ देंगे। हालांकि इस समय अफगानिस्तान में सिर्फ ढाई हजार अमेरिकी सैनिक ही मौजूद हैं, जो पिछले दो दशक में सबसे कम है। इसी बीच ऐसी खबरें भी आर्इं कि बाइडेन प्रशासन अफगानिस्तान शांति वार्ता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अमेरिकी शांति दूत जलमॉय खलीलजाद की भूमिका से भी प्रसन्न नहीं है।

खलीलजाद ने अफगानिस्तान और अमेरिका के बीच हुई शांति वार्ता में खासी जल्दीबाजी दिखाई थी। तालिबान से शांति वार्ता के वक्त खलीलजाद ने कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों को नजरअंदाज किया था, जिनमें मानवाधिकार और महिला अधिकार जैसे मुद्दे शामिल थे, जिन्हें पिछले कुछ सालों के दौरान अफगानिस्तान में बहाल किया गया है। खलीलजाद ने तालिबान से बातचीत के दौरान अशरफ गनी की चुनी हुई सरकार को भी नजरअंदाज किया। खलीलजाद और तालिबान के बीच हुई बातचीत को काबुल की अफगान सरकार में मौजूद उजबेक, ताजिक और हजारा जनजातियों के प्रतिनिधियों ने हमेशा शक के दृष्टि से देखा। इन सबसे संदेह गहराना स्वाभाविक था।

दरअसल, शांति समझौते के बाद भी तालिबान के भीषण हमले जारी हैं। बेशक तालिबान ने वादे के मुताबिक अफगानिस्तान की धरती पर मौजूद विदेशी सैनिकों पर बड़ा हमला नहीं किया हो, लेकिन अफगान सेना पर तो बड़े हमले होते ही रहे। पुलिस और नागरिकों को भी निशाना बनाया जाता रहा है। इन हमलों के बीच ही अशरफ गनी सरकार पर ट्रंप प्रशासन ने तालिबान से बातचीत के लिए दबाव बनाए रखा था।

इधर तालिबान भी लगातार अपनी शर्तों को मानवाने के लिए दबाव डालता रहा और अमेरिका पर भी गंभीर आरोप लगाता रहा। तालिबान के अनुसार शांति समझौते के बाद भी उसके अड्डों पर ड्रोन हमले किए गए। पर अफगान जनता और सुरक्षा बलों पर तालिबान के हमलों में भी कमी नहीं आई। पिछले साल तीन हजार से ज्यादा अफगहान नागरिक तालिबान के हमलों मारे गए थे।

अफगान शांति वार्ता की प्रक्रिया की सफलता पाकिस्तान और ईरान के रवैये पर भी निर्भर करती है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का घोर ईरान विरोधी रवैया अफगानिस्तान शांति वार्ता पर पहले ही सवालिया निशान खड़ा कर चुका है। ईरान अफगानिस्तान का पड़ोसी है। पिछले तीन दशकों में अफगानिस्तान में ईरान की सक्रियता बहुत ज्यादा रही है। लगभग यही स्थिति पाकिस्तान की है।

ट्रंप प्रशासन अफगान शांति वार्ता में पाकिस्तान का सहयोग तो ले रहा था, लेकिन ईरान को पूरी तरह से नजरअंदाज कर रहा था। जबकि पिछले एक दशक में तालिबान के वरिष्ठ नेताओं के ईरान के साथ मधुर संबंध विकसित चुके हैं। इसका प्रमाण हाल में नजर भी आया। बीते दिनों तालिबान का एक प्रतिनिधिमंडल दोहा शांति वार्ता के बीच तेहरान गया था और ईरान सरकार से बातचीत की थी।

तेहरान में ही तालिबानी प्रतिनिधिमंडल ने मीडिया से बातचीत में कह दिया था कि अमेरिका और तालिबान के बीच हुए शांति समझौते के मुताबिक अफगानिस्तान की अशरफ गनी की सरकार को हटाया जाएगा और एक इस्लामिक सरकार का गठन होगा। तालिबान द्वारा तेहरान से इस तरह का संदेश देना ही यह बता रहा था कि ईरान अफगानिस्तान में आज भी महत्त्वपूर्ण है।

हालांकि अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी की प्रतिक्रिया भी लगातार आती रही है। उन्होंने साफ शब्दों में तालिबान को जवाब दिया है कि अफगानिस्तान की अगली सरकार अफगान संविधान के हिसाब से ही गठित होगी। किसी भी अंतरिम या इस्लामिक सरकार के गठन की अफगानिस्तान में कोई संभावना नहीं है। बीते कुछ दिनों में अशरफ गनी ने दोहा शांति वार्ता से अलग रणनीति बनानी शुरू कर दी है। वे अफगानिस्तान के प्रमुख नेताओं से अलग-अलग बातचीत कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें खुद अब दोहा शांति वार्ता की सफलता पर संदेह नजर आ रहा है।

निश्चित तौर पर तालिबान अफगानिस्तान के आधे राज्यों के ग्रामीण इलाकों में अपना नियंत्रण स्थापित किए हुए है। लेकिन उसे पता है कि काबुल पर तालिबान का एकछत्र नियंत्रण मुश्किल है। इसे हजारा, ताजिक और उजबेक जनजातियां नहीं होने देंगी। इसलिए पाकिस्तान भी बीच का रास्ता निकाल तालिबान को काबुल की सरकार में घुसपैठ करवाने की कोशिश में है।

यही कारण है कि पाकिस्तान दोहा में चल रही बातचीत को सफल बनाना चाहता है। पाकिस्तान की कोशिश है कि पाकिस्तान के देवबंदी मदरसों से प्रशिक्षित तालिबान कमांडरों की भागीदारी काबुल में तय हो, ताकि अफगानिस्तान में पाकिस्तान की पकड़ मजबूत हो। वार्ता को सफल बनाने के लिए पाकिस्तान पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और वर्तमान राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ लगातार संपर्क में है।

इस बात की पूरी संभावना है कि बाइडेन प्रशासन मानवाधिकारों और महिला अधिकारों को लेकर पूर्ववर्ती ट्रंप प्रशासन की तरह तालिबान के सामने समपर्ण नहीं करेगा। बाइडेन पर अपनी ही पार्टी का भी दबाव है। ट्रंप प्रशासन ने तालिबान से समझौता करते वक्त मानवाधिकार और महिला अधिकार जैसे मुद्दों को नजरअंदाज किया था। हालांकि अफगान सरकार के प्रतिनिधिमंडल और तालिबान के बीच जब दोहा में शांति वार्ता शुरू हुई तो उम्मीद की गई थी कि तालिबान का रवैया महिला अधिकारों के प्रति बदलेगा।

लेकिन बातचीत के दौरान स्पष्ट हो गया है कि तालिबान अफगानिस्तान में इस्लामिक सरकार गठन करना चाहता है और महिलाओं को अधिकार देने को तालिबान राजी नहीं है। काफी संघर्ष के बाद अफगान महिलाओं ने पिछले कुछ सालों में कई अधिकार हासिल किए हैं। सरकारी नौकरियों में महिलाएं हैं। अफगानिस्तान की न्यायपालिका में भी महिला जज हैं।

राजनीति में भी महिलाएं हैं। संसद में भी उनका अच्छा प्रतिनिधित्व है। पर तालिबान इन अधिकारों को जारी रखने के लिए फिलहाल तैयार नहीं है। लेकिन बाइडेन प्रशासन अफगान महिलाओं को मिले अधिकारों को खत्म नहीं होने देगा। अफगान महिला संगठन भी इस समय अपने अधिकारों को लेकर मुखर हैं। अफगान महिला संगठनों की नाराजगी यह भी है कि पिछले डेढ़ दशक में तालिबान से औपचारिक और अनौपचारिक तौर पर सड़सठ बार हुई बातचीत में सिर्फ पंद्रह बार महिलाओं को शामिल किया गया।

अफगान महिलाओं का तर्क है कि दुनिया के तमाम इस्लामिक देशों में महिलाएं संसद में हैं, मंत्री हैं तो अफगानिस्तान में महिला विरोध का तालिबान का आधार क्या है? ऐसे में अफगानिस्तान में फिलहाल पूर्ण शांति की उम्मीदें धुंधली पड़ जाती है। आने वाले वर्षों में भी अफगानिस्तान को संघर्ष के दौर से गुजरना होगा। अफगान शांति वार्ता में शामिल पक्षों के अपने-अपने हित हैं। अमेरिका, चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान जैसे देशों के हित अफगानिस्तान में हैं। ऐसे में कौन अफगानिस्तान को छोड़ना चाहेगा?

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